टाटा संस की अर्जी रिजर्व बैंक ने की खारिज, अब शेयर बाजार में दस्तक देने के अलावा नहीं बचा कोई रास्ताबेंगलुरु की लापता छात्रा को खोजने में मददगार बना सरकारी योजना का ओटीपी, सहेली की तलाश में जुटी सीआईडीबाढ़ प्रभावित नेपाल के लिए मसीहा बनी अंबाला की मेडिकल टीम, मुफ्त इलाज पाकर भावुक हुए पीड़ितवृषभ राशिफल 13 सितंबर: इस एक आदत से आज चमकेगा भाग्य, जानें अपना पूरा दैनिक भविष्यफलरसोई की काली और चिकनी छन्नी को चमकाने के 4 आसान घरेलू नुस्खे, ऐसे करें साफपश्चिम बंगाल में असली तृणमूल कांग्रेस पर संग्राम, ऋतब्रत बनर्जी ने चुनाव आयोग के सामने 'जोड़ाफूल' चुनाव चिह्न पर जताया दावाकॉर्नेल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ने जताई गहरी चिंता, गणित के क्षेत्र में एआई की तेज तरक्की से वैज्ञानिक सहमेदिल्ली में अफगानिस्तान के खिलाफ इतिहास रच सकते हैं वैभव सूर्यवंशी, वीरेंद्र सहवाग का यह बड़ा रिकॉर्ड निशाने परग्रैंड थेफ्ट ऑटो VI की रिलीज से पहले क्यों भड़क उठा है दक्षिणपंथी धड़ा? जानें सोशल मीडिया पर जारी इस विवाद की असल वजहमूलांक 8 के जातक: शनि की कृपा से जीवन में अपार सफलता पाने वाले लोगों के छिपे हुए गुण
विदिशा में किसान ने अपनी पालतू बकरी के लिए आयोजित की भव्य तेरहवीं, प्रयागराज में किया अस्थि विसर्जनमध्य प्रदेश
16 अग॰ 2026, 12:38 am (28 दिन पहले)· 2

विदिशा में किसान ने अपनी पालतू बकरी के लिए आयोजित की भव्य तेरहवीं, प्रयागराज में किया अस्थि विसर्जन

विदिशा जिले के सिरोंज में किसान नवल सिंह मालवीय ने अपनी 20 साल पुरानी पालतू बकरी 'कटोरी उर्फ चमेली' के निधन पर सभी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ अंतिम संस्कार संपन्न किया। प्रयागराज में गंगा विसर्जन के पश्चात 15 अगस्त को 500 लोगों के लिए तेरहवीं का भोज भी आयोजित किया गया।

मध्य प्रदेश के विदिशा जिले अंतर्गत सिरोंज क्षेत्र से इंसान और मूक पशु के बीच आत्मीय रिश्ते की एक बेहद भावुक मिसाल सामने आई है। यहां के भवानी नगर मोहल्ले में रहने वाले एक किसान परिवार ने अपनी पालतू बकरी के निधन के उपरांत पारंपरिक विधि-विधान से उसका अंतिम संस्कार संपन्न कराया। इतना ही नहीं, परिवार ने बकरी की अस्थियों को पवित्र गंगा नदी में विसर्जित किया और शोक पत्रिका छपवाकर गांव तथा रिश्तेदारों को एकत्रित कर तेरहवीं का विशाल भोज भी आयोजित किया। इस अनूठे आयोजन की पूरे इलाके में व्यापक चर्चा हो रही है।

20 वर्षों का अटूट रिश्ता और पारिवारिक सदस्य जैसा दर्जा

सिरोंज के भवानी नगर निवासी किसान नवल सिंह मालवीय ने एक बकरी पाल रखी थी, जिसका नाम उन्होंने 'कटोरी उर्फ चमेली' रखा था। नवल सिंह ने इस बकरी को लगातार 20 वर्षों तक अपने घर में रखा। उनका कहना है कि उन्होंने बकरी को कभी केवल एक जानवर नहीं समझा, बल्कि अपने बच्चे की तरह उसका पालन-पोषण किया। वह घर के भीतर पलंग पर सोती थी और पूरे परिवार के साथ घुला-मिला करती थी। जब बीते 3 अगस्त को इस बकरी की मृत्यु हुई, तो पूरा परिवार गहरे शोक में डूब गया। किसान के अनुसार, उसके जाने से ऐसा महसूस हुआ जैसे परिवार का ही कोई अभिन्न सदस्य उन्हें छोड़कर चला गया हो।

ये भी पढ़ें

प्रशासनिक अनुमति से दाह संस्कार और प्रयागराज में गंगा विसर्जन

बकरी के निधन के पश्चात नवल सिंह मालवीय ने स्थानीय प्रशासन से आवश्यक अनुमति प्राप्त की और उसके शव का बाकायदा दाह संस्कार किया। अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी होने के बाद किसान ने उसकी अस्थियों को सहेजा। इसके बाद वे स्वयं अस्थि कलश लेकर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज पहुंचे, जहां उन्होंने पूरे धार्मिक विधि-विधान के साथ अस्थियों को गंगा नदी में विसर्जित किया। इंसान की भांति किसी पालतू जानवर के लिए इन सभी पारंपरिक उत्तर-कार्यों का निर्वहन करना स्थानीय लोगों के लिए कौतूहल और प्रेरणा का विषय बन गया।

शोक पत्रिका का वितरण और 500 अतिथियों के लिए तेरहवीं का भोज

गंगा जी में अस्थि विसर्जन की प्रक्रिया संपन्न करने के बाद मालवीय परिवार ने 15 अगस्त को बकरी की तेरहवीं का कार्यक्रम तय किया। इसके लिए परिवार ने बाकायदा एक औपचारिक शोक संदेश पत्रिका मुद्रित करवाई। यह कार्ड आसपास के पड़ोसियों, परिचितों तथा दूर-दराज रहने वाले रिश्तेदारों को भेजकर आमंत्रित किया गया। तेरहवीं के दिन आयोजित इस विशेष भोज में लगभग 500 लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था की गई थी, जहां पधारे लोगों ने सामूहिक रूप से अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं।

मानवीय संवेदना और पशु प्रेम की अनोखी मिसाल

आज के दौर में जब कई बार वृद्ध परिजनों को भी उपेक्षा का सामना करना पड़ता है, ऐसे समय में एक किसान द्वारा अपनी पालतू बकरी के लिए प्रकट किया गया यह अगाध प्रेम समाज को गहराई से प्रभावित कर रहा है। नवल सिंह मालवीय द्वारा अपनी बेजुबान साथी को दी गई यह सम्मानजनक विदाई लोगों के बीच कौतूहल के साथ-साथ मानवीय संवेदनशीलता के एक उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में देखी जा रही है।

सवाल-जवाब

नवल सिंह मालवीय की पालतू बकरी का नाम क्या था?
किसान नवल सिंह मालवीय की पालतू बकरी का नाम 'कटोरी उर्फ चमेली' था।
नवल सिंह ने अपनी पालतू बकरी को कितने समय तक पाला था?
उन्होंने अपनी पालतू बकरी को 20 वर्षों तक अपने घर में बेटी की तरह पाला था।
बकरी का निधन कब हुआ था?
बकरी का निधन 3 अगस्त को हुआ था।
अंतिम संस्कार के बाद अस्थियों का विसर्जन कहां किया गया?
प्रशासनिक अनुमति से दाह संस्कार के पश्चात बकरी की अस्थियों को प्रयागराज ले जाकर गंगा नदी में विसर्जित किया गया।
तेरहवीं का आयोजन कब हुआ और इसमें कितने लोग शामिल हुए?
बकरी की तेरहवीं 15 अगस्त को आयोजित की गई, जिसके लिए औपचारिक शोक संदेश कार्ड बांटकर लगभग 500 लोगों को भोजन कराया गया।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Divya Reddy@divya-reddy·27 दिन पहले

यह घटना मानवीय संवेदनाओं और पशु प्रेम का अनोखा उदाहरण है, जो समाज में पशु कल्याण और करुणा के प्रति बढ़ती जागरूकता को रेखांकित करती है। हालांकि मुख्यधारा की शिक्षा नीति और स्कूलों में अभी भी औपचारिक रूप से पशु अधिकार या उनके साथ सह-अस्तित्व को पाठ्यक्रम में प्राथमिकता नहीं दी जाती, पर ऐसी सामाजिक घटनाएं विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तकों से परे व्यावहारिक सहानुभूति का पाठ पढ़ाने में मददगार साबित हो सकती हैं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·27 दिन पहले

यह घटना भले ही मानवीय संवेदनाओं की अनूठी मिसाल लगे, किंतु यह हमारे ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में पशुओं के कल्याण, पशु-चिकित्सा पहुंच और पालतू जीवों के अधिकारों से जुड़े नीतिगत विमर्श को एक नया आयाम देती है। जब एक किसान अपने मूक साथी के साथ ऐसा आत्मीय जुड़ाव प्रदर्शित करता है, तब यह इस बात की ओर भी संकेत करता है कि प्रशासनिक स्तर पर भी पशु संरक्षण और उनके गरिमापूर्ण जीवन-यापन के लिए सामुदायिक जागरूकता अभियानों को मज़बूत किए जाने की आवश्यकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·27 दिन पहले

यह मार्मिक प्रसंग पशुधन बीमा, आधुनिक पशु-चिकित्सा और देखभाल के आर्थिक पहलुओं को रेखांकित करता है। जब ग्रामीण भारत में पालतू पशुओं के साथ भावनात्मक जुड़ाव इस स्तर पर पहुँचता है, तब डिजिटल ट्रैकिंग, स्वास्थ्य बीमा और पशु-कल्याण की अनौपचारिक व्यवस्थाओं को एक औपचारिक वित्तीय और प्रशासनिक ढांचा देने का समय आ गया है।

Rohan Verma@rohan-verma·27 दिन पहले

यह खबर केवल एक अनोखी मानवीय भावना का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह पशु कल्याण और ग्रामीण समाज में बदलती संवेदनाओं के बीच एक दिलचस्प सामाजिक अध्ययन का विषय है। 20 वर्षों का यह लंबा जुड़ाव और प्रशासनिक अनुमति से लेकर अंतिम संस्कार तक की प्रक्रिया यह दर्शाती है कि मूक प्राणियों के प्रति व्यक्तिगत लगाव अब व्यक्तिगत दायरे से निकलकर सामुदायिक चर्चा और कौतूहल का केंद्र बन रहा है। इस तरह की घटनाएं भविष्य में पशु-मानव संबंधों और उनके अधिकारों पर होने वाली बहसों को एक नया आयाम दे सकती हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·27 दिन पहले

एक क्राइम संवाददाता के तौर पर मैं देखता हूँ कि जहाँ एक ओर पशु क्रूरता और निवारण कानूनों के तहत केवल शिकायतों पर कानूनी अमलीजामा पहनाया जाता है, वहीं दूसरी ओर विदिशा की यह घटना समाज में पशुओं के प्रति उपजी संवेदनशीलता का एक अनूठा पहलू सामने रखती है। हालाँकि इस मामले में दाह संस्कार के लिए प्रशासनिक अनुमति ली गई, लेकिन क्या भविष्य में पालतू जीवों के अंतिम संस्कारों, उनके अधिकारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े नियमों के तहत कोई स्पष्ट कानूनी दिशा-निर्देश तय करने की आवश्यकता पड़ सकती है? यह सवाल अब प्रशासनिक और विधिक हलकों में विचारणीय हो सकता है।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR