देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर आसीन ज्ञानेश कुमार को लेकर इस समय सियासी हलकों में तीखी बहस छिड़ी हुई है। विपक्षी दल लामबंद होकर उनके पद छोड़ने का दबाव बना रहे हैं और संसद के भीतर महाभियोग की पहल करने की तैयारी में जुटे हैं। हालांकि भारतीय संवैधानिक ढांचे के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को पदमुक्त करने का रास्ता बेहद जटिल है। देश की शीर्ष अदालत या सरकार के समर्थन के बिना विपक्षी खेमा उन्हें सीधे नहीं हटा सकता। इस संवैधानिक पद से किसी को हटाने का एकमात्र कानूनी जरिया संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाना ही है।
संसद में महाभियोग की प्रक्रिया पूरी करने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई सांसदों के समर्थन की अनिवार्य शर्त होती है। मौजूदा संख्याबल को देखते हुए विपक्षी पार्टियां अकेले दम पर ऐसा कोई प्रस्ताव पारित करवाने की स्थिति में नहीं हैं। जब तक स्वयं आयुक्त अपनी मर्जी से पद छोड़ने का फैसला न करें, तब तक उन्हें हटाया जाना लगभग नामुमकिन है। ऐसे राजनीतिक माहौल में यह जानना बेहद अहम हो जाता है कि उनका सेवाकाल कब समाप्त होगा और उनके एजेंडे में कौन-से महत्वपूर्ण चुनावी इम्तिहान शामिल हैं।
जनवरी 2029 तक रहेगा कार्यकाल
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार ज्ञानेश कुमार का मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यकाल जनवरी 2029 तक प्रभावी रहने वाला है। इसका सीधा अर्थ यह है कि वर्ष 2029 के लोकसभा चुनावों की आधिकारिक रूपरेखा तय होने से चंद महीने पूर्व ही वे सेवानिवृत्त हो जाएंगे। यदि केंद्र सरकार उनके सेवाकाल में विस्तार की मंजूरी देती है, तभी वे उस वर्ष के राष्ट्रीय आम चुनाव की निगरानी कर सकेंगे। उन्होंने 19 फरवरी 2025 को इस शीर्ष संवैधानिक पद की बागडोर संभाली थी।
प्रशासनिक सेवा के क्षेत्र में उनका लंबा अनुभव रहा है। जनवरी 2024 में वे नागरिक सेवाओं से सेवानिवृत्त हुए थे, जिसके दो माह से भी कम अंतराल में उन्हें चुनाव आयुक्त की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी। उनकी यह प्रारंभिक नियुक्ति वर्ष 2024 के आम चुनाव की आधिकारिक घोषणा से ठीक एक दिन पहले अमल में लाई गई थी। इसके पश्चात फरवरी 2025 में उन्हें पदोन्नत कर आयोग का सर्वोच्च दायित्व सौंपा गया। उनके नेतृत्व की देखरेख में बिहार, दिल्ली तथा पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव पहले ही संपन्न कराए जा चुके हैं।
22 राज्यों के चुनाव और राष्ट्रपति निर्वाचन की जिम्मेदारी
अपने संपूर्ण कार्यकाल के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त के समक्ष कम से कम 22 राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव कराने की विशाल प्रशासनिक चुनौती रहेगी। इसके अतिरिक्त वर्ष 2027 में होने वाला देश का अगला राष्ट्रपति चुनाव भी उन्हीं की निगरानी में संपन्न कराया जाना है। चुनावी कैलेंडर के मुताबिक विभिन्न राज्यों में मतदान की तिथियां अलग-अलग वर्षों में बंटी हुई हैं।
साल दर साल राज्यों में चुनावी कार्यक्रम
वर्ष 2027 के दौरान सात राज्यों में विधानसभा के गठन हेतु मतदान होना है। इन राज्यों में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब, मणिपुर, गुजरात तथा हिमाचल प्रदेश सम्मिलित हैं। राजनीतिक दृष्टिकोण से उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे बड़े राज्यों के चुनाव राष्ट्रीय स्तर पर काफी संवेदनशील माने जाते हैं।
इसके अगले वर्ष यानी 2028 में कुल नौ राज्यों के चुनावी दंगल प्रस्तावित हैं। इस सूची में मध्य प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय और त्रिपुरा शामिल हैं। एक साथ इतने बड़े भूभाग और अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों वाले राज्यों में निष्पक्ष मतदान कराना आयोग के लिए बड़ा परीक्षण होगा।
अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष यानी 2029 में भी ज्ञानेश कुमार के सामने आठ राज्यों के चुनाव कराने का कार्यक्रम रहेगा। इनमें जम्मू और कश्मीर, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं।
लंबा प्रशासनिक अनुभव और मौजूदा सियासी तनाव
ज्ञानेश कुमार तीन दशक से भी अधिक समय, यानी 36 साल से ज्यादा वक्त तक भारतीय नौकरशाही के अहम पदों पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं। चुनाव आयोग में आने से पूर्व वे राज्य प्रशासन के साथ-साथ केंद्र सरकार के कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों में शीर्ष स्तर पर कार्यरत रहे हैं। वर्तमान दौर में वे एसआईआर से जुड़े मामले को लेकर विपक्षी दलों की कड़ी आलोचना का सामना कर रहे हैं। हालांकि महाभियोग के गणित और संवैधानिक सुरक्षा चक्र के चलते उनके कार्यकाल पर तत्काल कोई कानूनी संकट नजर नहीं आता।





















