फ्लायदुबई के एक यात्री विमान में हवा के बीच कॉकपिट में हुई हिंसक झड़प की घटना ने वैश्विक विमानन सुरक्षा और सैन्य प्रतिक्रिया प्रणालियों पर गंभीर बहस छेड़ दी है। उड़ान के दौरान सह-पायलट ने कथित तौर पर भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार पर अचानक हमला बोल दिया और विमान का नियंत्रण अपने हाथों में लेने की कोशिश की। इस खतरनाक खींचतान के बीच विमान अचानक लगभग 14,000 फीट नीचे गिर गया, जिससे गंभीर संकट पैदा हो गया। उस समय कॉकपिट के भीतर कैप्टन स्मित मच्छार विमान का नियंत्रण दोबारा पाने और सभी यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जूझ रहे थे, जबकि दूसरी तरफ संभावित हवाई खतरे को देखते हुए इजरायल ने अपने विशेष सुरक्षा तंत्र को सक्रिय कर दिया था और लड़ाकू विमानों को कार्रवाई के लिए तैयार कर लिया था।
इस पूरे घटनाक्रम के शांत होने के बाद जहां इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सूझबूझ से जानें बचाने के लिए भारतीय पायलट की सराहना की, वहीं दूसरी तरफ यह तथ्य भी सामने आया कि संकट के उन बेहद नाजुक पलों में इजरायल उसी विमान को मार गिराने की तैयारी कर रहा था। इस गंभीर विरोधाभास ने अंतरराष्ट्रीय विमानन जगत और आम जनता के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि किसी देश की संप्रभु सीमाओं की रक्षा के लिए संदिग्ध नागरिक विमान को नष्ट करने का निर्णय कब, किन परिस्थितियों में और किसके आदेश पर लिया जा सकता है।
इजरायल ने क्यों तैयार किए थे लड़ाकू विमान
इजरायल की इस त्वरित और आक्रामक प्रतिक्रिया की मुख्य वजह 9/11 जैसे भयावह आत्मघाती हमले की आशंका थी। कॉकपिट के भीतर आपातकाल पैदा होने के दौरान जमीनी अधिकारियों ने विमान से लगातार संपर्क साधने की कोशिश की, लेकिन कॉकपिट की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला। विमान में 170 से अधिक यात्री और चालक दल के सदस्य सवार थे, जिनमें से अधिकांश इजरायली नागरिक थे। जब एक वाणिज्यिक विमान अचानक संचार बंद कर दे, तेजी से ऊंचाई खोने लगे और इजरायली सीमा की ओर बढ़ रहा हो, तो सुरक्षा एजेंसियों को यह गंभीर आशंका सताने लगी कि विमान को हथियार बनाकर किसी घनी आबादी वाले शहर या महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रतिष्ठान पर गिराने की साजिश हो सकती है।
इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज़ ने बाद में इस पूरे घटनाक्रम को एक आतंकी हमले के प्रयास के रूप में रेखांकित किया। जैसे ही विमान के अनियंत्रित होने और संचार टूटने के संकेत मिले, इजरायल ने अपना पूर्व-निर्धारित अपहरण रोधी प्रोटोकॉल तुरंत सक्रिय कर दिया। देश के हवाई क्षेत्र को पूरी तरह बंद कर दिया गया, एक समर्पित सैन्य कमांड सेंटर स्थापित किया गया और आसमान में लड़ाकू विमान तैनात कर दिए गए। उस समय जमीनी कमान को यह बिल्कुल पता नहीं था कि कॉकपिट के अंदर भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार अकेले दम पर विमान को बचाने का संघर्ष कर रहे थे। यदि उस उड़ान को पूरी तरह अनियंत्रित या शत्रुतापूर्ण घोषित कर दिया जाता और वह संपर्क साधे बिना इजरायल की ओर बढ़ती रहती, तो प्रोटोकॉल के अनुसार उसे हवा में ही नष्ट करने का विकल्प खुला रखा गया था।
सख्त प्रक्रियाओं से गुजरता है विमान गिराने का निर्णय
किसी भी देश के लिए अपने या विदेशी नागरिकों से भरे यात्री विमान पर मिसाइल दागने का निर्णय लेना सबसे कठिन और चरम कदम होता है। इजरायल का स्थापित अपहरण प्रोटोकॉल इसी सिद्धांत पर काम करता है कि नागरिक विमान को किसी बड़े सामूहिक विनाश का हथियार बनने से रोका जाए, लेकिन यह प्रक्रिया कई चरणों की कड़ी जांच और पुष्टिकरण के बाद ही आगे बढ़ती है।
प्रोटोकॉल का पहला कदम तकनीकी और रेडियो संचार स्थापित करना होता है। हवाई यातायात नियंत्रक और सैन्य ग्राउंड स्टेशन बार-बार कॉकपिट से संपर्क साधते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विमान सामान्य रूप से प्रतिक्रिया दे रहा है या नहीं। यदि रेडियो संचार पूरी तरह विफल हो जाता है, तो दूसरा चरण तुरंत शुरू होता है, जिसके तहत वायुसेना के लड़ाकू जेट विमानों को हवा में भेजा जाता है। ये लड़ाकू विमान संदिग्ध यात्री विमान के अत्यंत करीब पहुंचकर कॉकपिट और केबिन के साथ सीधा दृश्य संपर्क स्थापित करते हैं।
तीसरे चरण में लड़ाकू विमानों के पायलट कॉकपिट की स्थिति का दृश्य मूल्यांकन करते हैं। वे देखते हैं कि क्या अंदर हाथापाई चल रही है, पायलट बंधक हैं, या किसी प्रकार की असामान्य गतिविधि हो रही है। ये सभी प्रत्यक्ष अवलोकन तुरंत संयुक्त कमांड सेंटर को भेजे जाते हैं। यदि इन तमाम चरणों के बाद यह पूरी तरह पुष्ट हो जाए कि विमान पर हमलावरों का कब्जा है और वह किसी रणनीतिक लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, तो अंतिम फैसला वरिष्ठतम राजनीतिक नेतृत्व के पास पहुंचता है। निर्धारित नियमों के मुताबिक किसी यात्री विमान को मार गिराने की अंतिम अनुमति देने का अधिकार केवल इजरायल के प्रधानमंत्री के पास होता है। इसके पीछे का मूल तर्क यही है कि किसी बड़े शहर या हजारों लोगों की जान बचाने के लिए अत्यधिक कठिन परिस्थितियों में भारी मानवीय नुकसान स्वीकार किया जाता है।
नागरिक विमानों और सैन्य कार्रवाई का इतिहास
इतिहास में आज तक ऐसा कोई उदाहरण दर्ज नहीं है जहां किसी वाणिज्यिक यात्री विमान को सिर्फ इसलिए आधिकारिक तौर पर मार गिराया गया हो क्योंकि उसके अपहृत होने की पुष्टि या आशंका थी। हालांकि, 11 सितंबर 2001 को संयुक्त राज्य अमेरिका में हुए आतंकी हमलों ने दुनिया भर की सरकारों के सोचने का नजरिया पूरी तरह बदल दिया। उस घटना के बाद यह स्पष्ट हो गया कि अपहृत विमानों का इस्तेमाल अब सिर्फ फिरौती मांगने या राजनीतिक कैदियों को छुड़ाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्हें मिसाइल की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।
9/11 के बाद दुनिया के तमाम प्रमुख देशों ने संदिग्ध नागरिक विमानों को हवा में रोकने और जरूरत पड़ने पर सैन्य बल का उपयोग करने के अपने नियमों को बेहद कड़ा कर दिया। हालांकि अतीत में सैन्य बलों द्वारा नागरिक विमानों को मार गिराए जाने की कई घटनाएं घटी हैं, लेकिन वे ज्यादातर गलत पहचान, रडार की तकनीकी गलतियों या युद्धक्षेत्र के भ्रम का परिणाम थीं, न कि किसी अपहृत विमान को जानबूझकर खत्म करने का मामला। इजरायल ने हमेशा से अपनी सुरक्षा नीतियों में इस आशंका को शामिल रखा है, लेकिन किसी नागरिक विमान को नष्ट करने की कानूनी और रणनीतिक सीमाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद सख्त हैं।
संभावित कार्रवाई और कूटनीतिक जटिलताएं
यदि फ्लायदुबई के मामले में इजरायल ने अंतिम कदम उठाते हुए विमान को मार गिराया होता, तो इसके बेहद गंभीर कूटनीतिक और भू-राजनीतिक परिणाम सामने आते। कॉकपिट की कमान एक भारतीय नागरिक कैप्टन स्मित मच्छार के हाथ में थी, जबकि इजरायल अपनी सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा प्रोटोकॉल का हवाला देकर इसे उचित ठहराने का प्रयास करता।
ऐसी दुखद स्थिति में नई दिल्ली की ओर से निश्चित रूप से इस बात की कड़ी और गहन जांच की मांग की जाती कि इजरायल ने खतरे का आकलन किस आधार पर किया था और निर्णय प्रक्रिया में क्या खामियां थीं। इजरायल का संभावित बचाव यह होता कि उसने किसी भारतीय नागरिक को निशाना नहीं बनाया बल्कि अपनी जमीन पर होने वाले एक संभावित बड़े आतंकी हमले को रोका। लेकिन पूरी बहस इसी बात पर आकर टिकती कि क्या इजरायली अधिकारियों के पास इस बात के अकाट्य प्रमाण थे कि विमान पूरी तरह शत्रुतापूर्ण नियंत्रण में था। यदि बाद में यह साबित होता कि भारतीय कैप्टन वास्तव में विमान और उसमें सवार 170 से अधिक यात्रियों को बचाने के लिए लड़ रहे थे, तो दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में भारी कड़वाहट आ सकती थी। सौभाग्य से, कैप्टन मच्छार और अन्य लोगों ने स्थिति पर नियंत्रण पा लिया और विमान को सुरक्षित रूप से सऊदी अरब की ओर मोड़ दिया गया।
भारत का अपहरण रोधी सुरक्षा ढांचा
यदि इसी प्रकार का कोई गंभीर संकट भारतीय हवाई क्षेत्र के करीब उत्पन्न होता, तो भारत का दृष्टिकोण भी सुनियोजित और स्पष्ट सुरक्षा प्रक्रियाओं से संचालित होता है। भारत में ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए प्रमुख कानूनी और संचालन ढांचा एंटी-हाईजैकिंग एक्ट, 2016 के साथ-साथ केंद्र सरकार के विमान सुरक्षा नियमों और नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो के मानकों पर आधारित है।
भारत की आधिकारिक सुरक्षा नीति में भी किसी विमान के अपहृत होने की आशंका मात्र से उसे मार गिराने का सीधा आदेश नहीं दिया जाता। भारतीय प्रोटोकॉल का प्राथमिक लक्ष्य विमान में सवार यात्रियों और चालक दल के जीवन की रक्षा करना तथा जमीनी आबादी पर मंडराते खतरे का सटीक आकलन करना होता है। सुरक्षा एजेंसियां सबसे पहले संवाद स्थापित करने, वास्तविक खतरे का स्तर जांचने और स्थिति को शांतिपूर्ण ढंग से नियंत्रित करने के सभी रास्ते तलाशती हैं। अत्यधिक संकट की स्थिति में ही उच्चतम स्तर पर कड़े फैसले लिए जा सकते हैं। अंततः विश्व भर की प्रमुख विमानन सुरक्षा नीतियों का मूल सिद्धांत यही है कि किसी भी नागरिक विमान को सीधे तौर पर निशाना नहीं माना जाता, बल्कि जानमाल की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।



















