राजस्थान के भरतपुर जिले में बागवानी करने वाले किसानों के सामने मौजूदा मौसम एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। जिले के वैर और भुसावर इलाकों में बेर की पैदावार बड़े पैमाने पर की जाती है, जहां के फल अपनी खास मिठास के कारण व्यापक पहचान रखते हैं। वर्तमान दौर में इन बागों में लगे पेड़ों पर फूल खिलने का क्रम जारी है, जो आगे चलकर फल के विकास की बुनियादी नींव तैयार करता है। हालांकि, पौधों के जीवन चक्र का यह चरण जितना अहम है, उतना ही संवेदनशील भी माना जाता है। बदलते मौसमी मिजाज के बीच फल मक्खी का प्रकोप और फफूंद से पनपने वाली बीमारियों का खतरा गहराने लगा है, जिससे बागवानों के माथे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा रही हैं।
फूल आने के दौर में क्यों बढ़ जाता है कीटों का आक्रमण
कृषि क्षेत्र के जानकारों का स्पष्ट मानना है कि फूल खिलने की यही वह अवधि होती है जब फसल पर बाहरी कीटों और रोगों के हमले की आशंका सबसे तीव्र हो जाती है। कृषि विभाग के विशेषज्ञ डॉ उदयभान सिंह ने जोर देकर कहा है कि बागवानों को इस नाजुक मोड़ पर पारंपरिक ढर्रे से हटकर वैज्ञानिक पद्धतियों के सहारे बागों की सघन निगरानी करनी होगी। उपज को नुकसान पहुंचाने वाले जीवों में फल मक्खी सबसे अधिक संहारक साबित होती है। यह कीट शुरुआती दौर के नन्हें और कोमल फलों की त्वचा में छेद करके अपने अंडे भीतर रोपित कर देता है।
इन अंडों से जब लार्वा बाहर आता है, तो वह फल के भीतरी गूदे को धीरे-धीरे चट करने लगता है। इसका सीधा नतीजा यह निकलता है कि फल अंदर से सड़कर पूरी तरह बेजान हो जाता है और पकने की अवस्था में पहुंचने से पहले ही पेड़ की टहनियों से टूटकर जमीन पर आ गिरता है। इसके अतिरिक्त, वातावरण के तापमान में आने वाला अचानक उतार-चढ़ाव और क्यारियों में अत्यधिक नमी का जमाव फफूंद जनित संक्रमणों को आमंत्रित करता है, जिससे पूरी फसल असमय बर्बाद हो सकती है।
कृषि विभाग की ओर से जरूरी सुरक्षा परामर्श
फसल को होने वाले नुकसान और किसानों को संभावित वित्तीय आघात से बचाने के उद्देश्य से कृषि विभाग ने विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। विभाग ने समस्त बेर उत्पादकों को निर्देशित किया है कि वे प्रतिदिन अपने बगीचों में जाकर पेड़ों, खिले हुए फूलों और प्रारंभिक कलियों की बारीकी से जांच-पड़ताल करें। निरीक्षण के दौरान यदि किसी पौधे में बीमारी अथवा कीड़े के शुरुआती लक्षण भी दिखाई पड़ें, तो जरा भी लापरवाही बरते बिना तुरंत अपने नजदीकी कृषि अधिकारियों या तकनीकी जानकारों से संपर्क साधना चाहिए।
किसानों को यह भी कड़ा निर्देश दिया गया है कि वे बाजार से बिना सोचे-समझे रासायनिक दवाएं लाकर अपनी मर्जी से छिड़काव न करें। फसल पर केवल उन्हीं कीटनाशकों और फफूंदनाशक दवाओं का प्रयोग होना चाहिए जिनकी सिफारिश कृषि विशेषज्ञों द्वारा आधिकारिक रूप से की गई हो। घोल तैयार करते समय रसायनों की निर्धारित मात्रा का सख्ती से पालन करना अनिवार्य है। तय अनुपात से अधिक या कम दवा डालने से न केवल पौधों की प्राकृतिक वृद्धि बाधित होती है, बल्कि बेर के स्वाद और गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।
बगीचे की साफ-सफाई और खरपतवार प्रबंधन पर जोर
कीटों के प्रकोप को शुरुआती स्तर पर थामने के लिए बाग की स्वच्छता को सबसे कारगर ढाल माना जाता है। विशेषज्ञों ने स्पष्ट हिदायत दी है कि जो फल रोगग्रस्त होकर या किसी अन्य कारण से जमीन पर गिर चुके हों, उन्हें तुरंत बीनकर नष्ट कर देना चाहिए अथवा मिट्टी में गहरा गड्ढा खोदकर दबा देना चाहिए। जमीन की सतह पर पड़े सड़े-गले फल मक्खियों और फफूंद के पनपने के लिए प्राथमिक प्रजनन स्थल का काम करते हैं।
इसके साथ ही, पेड़ों के इर्द-गिर्द उग आई जंगली घास, अवांछित झाड़ियों और खरपतवार को फौरन उखाड़ फेंकना बेहद जरूरी है। वैर और भुसावर क्षेत्र के ग्रामीण परिवारों की आजीविका बहुत हद तक बेर के व्यापार और उसकी वार्षिक आमदनी पर ही टिकी हुई है। ऐसे में समय रहते अपनाई गई तकनीकी समझ, समयबद्ध सतर्कता और बगीचे का सुव्यवस्थित रखरखाव किसानों को भारी आर्थिक नुकसान से बचाकर उनके लाभ को सुनिश्चित कर सकता है।























