देश के कानूनी क्षितिज पर शीर्ष अदालत की गरिमा और राजनीतिक आंदोलनों के तौर-तरीकों को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। विपक्षी गठबंधन के घटक दलों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की चौखट तक विरोध मार्च निकालने के फैसले को लेकर कानूनी जगत के वरिष्ठ चेहरे तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। देश के पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने इस पूरे घटनाक्रम पर सख्त रुख अपनाते हुए दो टूक राय रखी है। उनका मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक विवादों को सुलझाने के लिए तयशुदा संवैधानिक फोरम मौजूद हैं, ऐसे में ज्यूडिशियरी के परिसर तक पैदल मार्च निकालने की जिद बेहद गैर-जिम्मेदाराना और अवांछित कदम है।
राजधानी दिल्ली में 12 अक्टूबर के प्रस्तावित मार्च की सरगर्मियों के बीच सार्वजनिक जीवन पर भी इसका सीधा असर देखने को मिला। सुरक्षा इंतजामात और संभावित अव्यवस्था की आशंका के मद्देनजर दिल्ली मेट्रो रेल निगम ने राजीव चौक समेत छह प्रमुख स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वारों को अस्थायी रूप से बंद करने का फैसला लिया। इस बीच यह तथ्य भी सामने आया कि विपक्षी नेताओं ने भारत के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत से व्यक्तिगत भेंट के लिए समय की मांग की थी। हालांकि, सीजेआई सचिवालय की ओर से इस मुलाकात को लेकर असमर्थता जाहिर कर दी गई। इसके बावजूद विपक्षी दलों का रुख नहीं बदला और वे तय कार्यक्रम के मुताबिक अदालत की ओर कूच करने के फैसले पर अडिग रहे।
संवैधानिक संस्थाओं को सियासी खींचतान से अलग रखने की नसीहत
हरीश साल्वे ने आईएएनएस से बातचीत के दौरान विपक्षी दलों के इस रवैये को सिरे से खारिज किया। उन्होंने साफ शब्दों में चेताया कि जब राजनीतिक दल अपनी लड़ाई अदालतों के आंगन में घसीटने लगते हैं, तो इससे पूरी व्यवस्था को नुकसान पहुंचता है। साल्वे ने आरोप लगाया कि मौजूदा विपक्षी रणनीति का मकसद न्यायपालिका को एक राजनीतिक हथियार में तब्दील करना है, जो किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकता।
वरिष्ठ अधिवक्ता के अनुसार, जब कोई दल संवैधानिक मर्यादाओं की परवाह किए बिना अपनी मनमर्जी थोपने की कोशिश करता है, तो ऐसा संदेश जाता है मानो उसका लोकतांत्रिक नियमों पर से भरोसा ही उठ चुका हो। यह पूरी खींचतान उस वक्त तेज हुई जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कथित वोट चोरी के आरोपों को आधार बनाकर शीर्ष अदालत तक मार्च निकालने का आह्वान किया था। इस योजना के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को प्रमुख मुद्दा बनाया गया था, जिसमें नागरिक संगठनों और आम लोगों से भी शामिल होने की अपील की गई थी।
सीजेआई से मुलाकात की मांग और विधिक प्रक्रिया का सम्मान
प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत द्वारा विपक्षी प्रतिनिधिमंडल से मिलने से इनकार किए जाने के संदर्भ में साल्वे ने विधिक गरिमा की याद दिलाई। उन्होंने रेखांकित किया कि सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश किसी ज्ञापन को स्वीकार करने वाला कोई प्रशासनिक दफ्तर नहीं हैं। यदि किसी पक्ष को चुनाव आयोग या किसी अधिकारी के आचरण से गंभीर शिकायत है, तो उसका एकमात्र वैध तरीका औपचारिक याचिका दायर करना है।
साल्वे ने इस बात पर विशेष बल दिया कि अदालतें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक असहमति जैसे गंभीर पहलुओं पर निरंतर संतुलित तरीके से विचार करती हैं। किसी न्यायिक व्यवस्था में जजों के आदेशों से असंतुष्ट होना एक स्वाभाविक अधिकार हो सकता है, लेकिन जब कोई फैसला अपने पक्ष में न आए तो पूरी की पूरी न्यायिक प्रणाली पर लांछन लगाना पूरी तरह अनुचित है। असहमति दर्ज कराने का अधिकार और संस्था पर अविश्वास जताना, ये दोनों एकदम अलग बातें हैं।
निर्वाचन आयोग से जुड़े विवाद और संवैधानिक प्रक्रिया
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने या उनके खिलाफ सीधे दंडात्मक कदम उठाने की विपक्षी मांगों पर साल्वे ने संविधान के अनुच्छेदों का हवाला दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय के पास सीधे किसी चुनाव आयुक्त को पदमुक्त करने का कोई जादुई अधिकार नहीं है, बल्कि इसके लिए संसद और संविधान द्वारा निर्धारित एक बेहद जटिल और औपचारिक प्रक्रिया तय की गई है।
उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है, जहां आयोग को अपना पक्ष और प्रासंगिक दस्तावेज पेश करने का पूरा अधिकार मिलेगा। साल्वे ने कहा कि तथ्यों की पड़ताल के बिना किसी नतीजे पर कूदना जल्दबाजी होगी। इसके साथ ही उन्होंने दिल्ली के आम नागरिकों, व्यापारियों और कामकाजी वर्ग को रोजाना होने वाली दिक्कतों का हवाला देते हुए पूछा कि क्या अपने राजनीतिक मंसूबों के लिए पूरी राजधानी की रफ्तार थामना जायज है।
विरोध प्रदर्शन का दायरा और विधिक सीमाओं की मर्यादा
आंदोलन करने के अधिकार की सीमाओं पर चर्चा करते हुए पूर्व सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को प्रदर्शन की छूट अवश्य देता है, लेकिन यह अधिकार कानून से ऊपर नहीं हो सकता। पुलिस प्रशासन के नियमों, सार्वजनिक शांति और लागू प्रतिबंधों का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक और दल का प्राथमिक दायित्व है। यदि प्रशासन किसी स्थान पर जुटने की इजाजत नहीं देता, तो उस पाबंदी को तोड़ने के बजाय कानून के दायरे में रहकर अदालत में चुनौती दी जानी चाहिए।
साल्वे ने कांग्रेस पार्टी की आंतरिक रणनीति पर भी अचरज जताया। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस दल के शीर्ष नेतृत्व में देश के नामी और अनुभवी वकीलों की पूरी फौज मौजूद है, वह इस तरह की अराजक रणनीति पर कैसे आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि पार्टी को सार्वजनिक रूप से यह साफ करना चाहिए कि क्या यह पूरा कदम उसके वरिष्ठ कानूनी विचारकों की राय पर उठाया गया है या यह केवल एक हताश राजनीतिक प्रयोग है।
बाहरी हस्तक्षेप की आशंका और राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता
बातचीत के अंतिम हिस्से में हरीश साल्वे ने एक और गंभीर पहलू की ओर इशारा किया। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि देश में होने वाले कुछ बड़े विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी ताकतों का वित्तीय और रणनीतिक समर्थन हो सकता है। अपने इस संदेह के संदर्भ में उन्होंने नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश में हाल के वर्षों में उपजे राजनीतिक संकटों का उदाहरण दिया।
साल्वे ने जोर देकर कहा कि देश में इस तरह के आंदोलन किसी व्यापक जनभावना का प्रकटीकरण नहीं लगते, बल्कि इनमें प्रायोजित तत्वों की भूमिका संदिग्ध प्रतीत होती है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में केंद्र सरकार को ऐसे सभी प्रदर्शनों की विदेशी फंडिंग और बाहरी सांठगांठ की तह तक निष्पक्ष जांच करानी चाहिए, ताकि लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख को किसी भी बाहरी दबाव से बचाया जा सके।




















