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पश्चिम बंगाल की मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के निर्देश वाली जनहित याचिका कलकत्ता हाईकोर्ट में खारिजभारत
18 अग॰ 2026, 7:36 pm (25 दिन पहले)· 2

पश्चिम बंगाल की मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के निर्देश वाली जनहित याचिका कलकत्ता हाईकोर्ट में खारिज

कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के मौखिक पुलिस निर्देशों से जुड़ी जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि याचिका में लगाए गए आरोप अस्पष्ट हैं और उनके समर्थन में कोई ठोस सबूत या आधिकारिक दस्तावेज पेश नहीं किया गया है।

कोलकाता में एक कानूनी मामले के तहत कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल की मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने को लेकर दायर की गई जनहित याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत की इस कार्रवाई के पीछे यह मुख्य वजह रही कि याचिका में जो दावे किए गए थे, वे पूरी तरह से अस्पष्ट थे और उनके समर्थन में किसी भी तरह की ठोस सामग्री या पुख्ता सबूत अदालत के सामने पेश नहीं किए जा सके।

पीठ के सामने हुई सुनवाई और दलीलें

इस पूरे मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति अतारूप बनर्जी की पीठ ने मिलकर की। याचिकाकर्ता की तरफ से अदालत में यह गंभीर दावा रखा गया था कि पुलिस अधिकारी अलग-अलग मस्जिद कमेटियों के साथ बैठकें कर रहे हैं और उन पर मौखिक रूप से लाउडस्पीकर हटाने का दबाव बना रहे हैं। हालांकि, जब इस मामले पर राज्य सरकार का पक्ष सामने आया, तो सरकार ने अदालत के समक्ष स्पष्ट रूप से यह बात रखी कि पुलिस विभाग की तरफ से ऐसा कोई भी निर्देश जारी नहीं किया गया है और न ही इस प्रकार की कोई कार्रवाई अमल में लाई गई है।

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याचिकाकर्ता के वकील का पक्ष

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की तरफ से पैरवी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंदोपाध्याय ने अदालत को बताया कि मस्जिदों के प्रतिनिधियों को मौखिक तौर पर निर्देश दिए जा रहे हैं। उनका यह भी तर्क था कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार एक तय डेसिबल सीमा के भीतर ही लाउडस्पीकर के इस्तेमाल की कानूनी अनुमति दी गई है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि जनहित याचिका की सुनवाई को किसी आम सिविल या आपराधिक मुकदमे की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, एक जनहित याचिका में शुरुआत के स्तर पर ही हर तथ्य को उस तरह से साबित करने की आवश्यकता नहीं होती जैसी सामान्य मुकदमों में होती है, क्योंकि इसका असल मकसद किसी जनहित से जुड़े मुद्दे को अदालत के सामने लाना होता है।

अदालत के सवाल और राज्य सरकार का जवाब

मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने राज्य सरकार से यह सवाल पूछा कि क्या पुलिस अधिकारियों और मस्जिद प्रतिनिधियों के बीच इस तरह की कोई बैठकें आयोजित हुई थीं। इस पर जवाब देते हुए राज्य के एडवोकेट जनरल ने अदालत में ऐसी किसी भी बैठक के होने से साफ इनकार किया। राज्य सरकार की तरफ से यह दलील दी गई कि याचिका में यह कहीं भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि आखिर वह कौन सा पुलिस अधिकारी था जिसने ऐसा कथित निर्देश दिया था। इसके अलावा, इस दावे के समर्थन में कोई भी आधिकारिक दस्तावेज या सबूत पेश नहीं किया गया। राज्य ने यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता मुख्य रूप से मीडिया की रिपोर्टों और इमामों तथा मस्जिद प्रतिनिधियों से मिली अनौपचारिक जानकारियों पर ही पूरी तरह निर्भर हैं, जबकि जिन मस्जिदों के बारे में कथित कार्रवाई की बात कही जा रही है, उनमें से किसी भी कमेटी ने खुद आगे आकर अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया।

याचिका खारिज होने का मुख्य आधार

राज्य की इन आपत्तियों का खंडन करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंदोपाध्याय ने फिर से यह बात उठाई कि जनहित याचिका को सामान्य मुकदमों के नियमों से नहीं परखा जाना चाहिए और हर घटना के लिए शुरुआती दौर में ही पूरा सबूत मांगना सही नहीं है। उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि राज्य बार-बार यह क्यों कह रहा है कि इमाम या मस्जिद कमेटी के सदस्य खुद अदालत क्यों नहीं आए। हालांकि, दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची कि याचिका को आगे बढ़ाने के लिए कोई मजबूत आधार नहीं बनता है। पीठ ने माना कि पुलिस द्वारा लाउडस्पीकर हटाने के मौखिक आदेश दिए जाने के आरोपों को साबित करने के लिए याचिका में पर्याप्त और ठोस सामग्री का अभाव है। इसी वजह से कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस जनहित याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

सवाल-जवाब

कलकत्ता हाईकोर्ट ने किस मामले में जनहित याचिका खारिज की?
हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल की मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के कथित मौखिक पुलिस निर्देशों के खिलाफ दायर जनहित याचिका को खारिज किया।
इस मामले की सुनवाई किस पीठ ने की?
इस मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति अतारूप बनर्जी की पीठ ने की।
राज्य सरकार ने अदालत में क्या पक्ष रखा?
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि पुलिस की तरफ से मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने का कोई भी निर्देश नहीं दिया गया है।
याचिका खारिज किए जाने का मुख्य कारण क्या था?
अदालत ने पाया कि याचिका में लगाए गए आरोप अस्पष्ट थे और उनके समर्थन में कोई ठोस सामग्री या आधिकारिक दस्तावेज पेश नहीं किया गया था।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·25 दिन पहले

कलकत्ता हाईकोर्ट का यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों की अनिवार्यता और जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग को रोकने की दिशा में एक स्पष्ट संदेश देता है। जब मौखिक दावों और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर नीतिगत या प्रशासनिक मामलों में हस्तक्षेप की मांग की जाती है, तो न्यायपालिका द्वारा ठोस दस्तावेजों की मांग करना शासन और कानून के शासन की दृष्टि से आवश्यक हो जाता है। इस मामले में राज्य सरकार द्वारा मौखिक निर्देशों से इंकार और प्रभावित समितियों के स्वयं सामने न आने से याचिका का आधार कमजोर हुआ, जो यह दर्शाता है कि प्रशासनिक मामलों में केवल अनुमानों के आधार पर जनहित याचिकाएं टिक नहीं सकतीं।

Ravikash Gupta@ravikash·25 दिन पहले

यह फैसला इस बात पर भी रोशनी डालता है कि प्रशासनिक और कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर बिना पुख्ता दस्तावेजों के न्यायिक तंत्र का रुख करने से अदालती समय का अनपेक्षित उपयोग होता है। भविष्य में इस तरह की जनहित याचिकाओं पर न्यायपालिका की ओर से और अधिक सख्त और स्पष्ट दिशानिर्देश आने की संभावना है, ताकि मौखिक दावों के बजाय तथ्यात्मक प्रमाणों की महत्ता को प्राथमिकता दी जा सके।

Rohan Verma@rohan-verma·25 दिन पहले

यह फैसला स्पष्ट करता है कि अदालतें केवल मौखिक दावों, मीडिया रिपोर्टों या अस्पष्ट जानकारियों के आधार पर जनहित याचिकाओं को आगे नहीं बढ़ाएंगी। जब तक प्रभावित पक्ष खुद या ठोस सबूतों के साथ सामने नहीं आते, तब तक ऐसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की गुंजाइश सीमित रहती है। भविष्य में इस तरह के मामलों में याचिकाकर्ताओं को अदालत के कड़े प्रमाणिक मानकों का सामना करना होगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·25 दिन पहले

यह फैसला इस बात का कानूनी उदाहरण है कि जनहित याचिकाओं में केवल मौखिक बयानों और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर पुलिस व्यवस्था या प्रशासनिक आदेशों को चुनौती नहीं दी जा सकती। अदालत ने यह साफ कर दिया है कि न्यायिक समीक्षा के लिए प्रथम दृष्टया ठोस सबूत और प्रभावित पक्ष की प्रत्यक्ष भागीदारी अनिवार्य है। भविष्य में इस तरह के मामलों में याचिकाकर्ताओं को कानूनी और दस्तावेजी स्तर पर अपनी स्थिति बेहद मजबूत रखनी होगी, अन्यथा बिना पुख्ता आधार के ऐसी याचिकाएं टिक नहीं सकेंगी।

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