नई दिल्ली के प्रगति मैदान में स्थित भारत मंडपम एक बार फिर वैश्विक कूटनीति और भारतीय सांस्कृतिक धरोहर के ऐतिहासिक मिलन का साक्षी बना है। 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करते हुए जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया के सबसे प्रभावशाली नेताओं का स्वागत किया, तो उनके पीछे सजी एक अत्यंत विशाल और भव्य पृष्ठभूमि ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। यह विहंगम तस्वीर तमिलनाडु के पवित्र रामेश्वरम द्वीप पर स्थित ऐतिहासिक रामनाथस्वामी मंदिर की थी। इस प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की प्राचीन सनातन परंपरा, अद्वितीय वास्तुकला और गहरे आध्यात्मिक इतिहास की जीवंत प्रस्तुति ने शिखर सम्मेलन की शुरुआत को एक अद्भुत गरिमा प्रदान की। इस विशेष बैकग्राउंड के जरिए भारत ने दुनिया के सामने अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को बहुत ही गर्व के साथ पेश किया है।
वैश्विक नेताओं का स्वागत और पीएम मोदी की कूटनीतिक बातचीत
शनिवार और रविवार, यानी 12 और 13 सितंबर को आयोजित हो रहे इस दो दिवसीय 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में दुनिया भर के कई प्रमुख देशों के राष्ट्राध्यक्ष और राजनयिक हिस्सा लेने पहुंचे हैं। भारत मंडपम के विशेष स्वागत कक्ष में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत रूप से सभी वैश्विक नेताओं का गर्मजोशी से स्वागत किया। इस दौरान उनके पीछे तमिलनाडु के रामनाथस्वामी मंदिर के विशाल गलियारे और अद्वितीय मंदिर परिसर की बेहद सुंदर और भव्य तस्वीर सजी हुई थी। जब प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, इंडोनेशिया के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा का स्वागत किया, तो उन्होंने इस पावन धरोहर के महत्व को भी उनके साथ साझा किया। इसके अलावा मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान का स्वागत करते हुए भी प्रधानमंत्री ने इस पृष्ठभूमि के बारे में चर्चा की। विशेष रूप से, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री मोदी उन्हें इस पवित्र मंदिर के ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भ को संक्षेप में समझाते हुए देखे गए। उन्होंने वहां मौजूद अन्य वैश्विक नेताओं से भी संवाद किया और उन्हें भारत की इस ऐतिहासिक धरोहर के महत्व से रूबरू कराया, जिससे सभी मेहमानों को भारतीय सभ्यता की गहराई को करीब से महसूस करने का मौका मिला।
12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल रामनाथस्वामी मंदिर की धार्मिक महत्ता
तमिलनाडु राज्य के पंबन द्वीप पर स्थित रामनाथस्वामी मंदिर हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और श्रद्धेय स्थलों में से एक माना जाता है। यह पावन धाम भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल है, जिसके कारण देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु हर साल यहां दर्शन और आशीर्वाद लेने के लिए आते हैं। धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण यह मंदिर न केवल गहरी आस्था का केंद्र है, बल्कि यह सदियों पुराने इतिहास और भारतीय वास्तुकला का एक बेजोड़ प्रतीक भी है। इस तीर्थ स्थल का संबंध सीधे तौर पर रामायण काल से जोड़ा जाता है, जो इसे और भी दिव्य बनाता है। हिंदू परंपराओं के अनुसार, यह वही पवित्र स्थान है जहां लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए अपनी सेना के साथ प्रस्थान करने से पहले भगवान श्रीराम ने स्वयं अपने हाथों से स्थापित शिवलिंग की पूजा की थी और भगवान शिव की आराधना की थी। इस वजह से इसे वैष्णव और शैव संप्रदायों के बीच एक अद्भुत सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सेतु माना जाता है, जो भारतीय उपमहाद्वीप में राष्ट्रीय एकता और श्रद्धा को सुदृढ़ करता है।
अद्भुत वास्तुकला और 22 पवित्र कुंडों से जुड़ी रहस्यमयी मान्यताएं
रामनाथस्वामी मंदिर की वास्तुकला, इसके निर्माण की शैली और इसका भौगोलिक स्थान अपने आप में बेहद अनोखा और आकर्षक है। समुद्र के बीचोबीच स्थित पंबन द्वीप पर बसा यह मंदिर अपने विशालकाय और बेहद लंबे गलियारों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इस मंदिर के भीतर स्थित सैकड़ों अलंकृत स्तंभ और उन पर की गई बारीक व जटिल नक्काशी प्राचीन भारतीय शिल्प कौशल का एक जीवंत प्रमाण पेश करती है। मंदिर की एक अन्य रहस्यमयी और बेहद महत्वपूर्ण विशेषता यहां परिसर में मौजूद 22 पवित्र कुंड हैं। इन सभी कुंडों के जल को लेकर श्रद्धालुओं के बीच गहरी धार्मिक मान्यताएं हैं। माना जाता है कि इन कुंडों में मौजूद पानी में आध्यात्मिक और शुद्धिकरण के विशेष गुण होते हैं। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए इन सभी 22 कुंडों के पवित्र जल में स्नान करना एक अनिवार्य अनुष्ठान का हिस्सा माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि इन पवित्र कुंडों में स्नान करने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है और उसे आंतरिक शांति तथा आध्यात्मिक परिवर्तन का अनुभव होता है। नई दिल्ली में आयोजित हो रहे इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक शिखर सम्मेलन में इस प्राचीन और पावन धरोहर की तस्वीर को मुख्य पृष्ठभूमि के रूप में प्रदर्शित कर भारत ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक पटल पर एक बार फिर मजबूती से स्थापित किया है।



















