यमुना किनारे स्थित बेला एस्टेट बस्ती में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया के बाद बड़ा प्रशासनिक विवाद खड़ा हो गया है। इस इलाके में पहले दर्ज 728 मतदाताओं में से 727 लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं और अब सूची में केवल एक ही पंजीकृत मतदाता बचा है। इस स्थिति की जानकारी मिलने के बाद राहुल गांधी खुद इस इलाके में पहुंचे और प्रभावित निवासियों से मुलाकात कर पूरी स्थिति का जायजा लिया। उन्होंने मौके से ही संबंधित उप-मंडल मजिस्ट्रेट यानी एसडीएम को फोन करके इस भारी फेरबदल पर स्पष्टीकरण मांगा कि आखिर इतनी बड़ी तादाद में लोगों के नाम किस आधार पर बाहर कर दिए गए।
सालों से रह रहे लोगों के नाम सूची से गायब
इस बस्ती में रहने वाले अधिकांश परिवार कई दशकों से यहीं गुजर-बसर कर रहे हैं। इन नागरिकों ने 2024 के आम लोकसभा चुनाव और उसके बाद 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी अपने मताधिकार का सामान्य रूप से इस्तेमाल किया था। हालांकि वर्ष 2023 में प्रशासनिक कार्रवाई के तहत यहां कई निर्माण हटाए गए थे, लेकिन प्रभावित लोग इसी जगह पर लगातार रह रहे हैं। निवासियों का कहना है कि वे कहीं अन्यत्र स्थानांतरित नहीं हुए हैं, फिर भी चुनावी रिकॉर्ड के पुनरीक्षण के दौरान उनके नाम वोटर लिस्ट से पूरी तरह विलोपित कर दिए गए हैं।
राहुल गांधी ने क्या कहा
मौके पर पहुंचकर राहुल गांधी ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि दशकों से यहीं रह रहे गरीबों के लोकतांत्रिक अधिकार छीने जा रहे हैं। उन्होंने एक्स पर लिखा कि 2023 में घर तोड़े जाने के बावजूद यह लोग यहीं डटे रहे और हालिया चुनावों में नियमित मतदान भी किया, फिर भी अचानक सूची से 727 नाम हटा दिए गए। उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए एसडीएम से पूछा कि किस प्रक्रिया के तहत 728 में से केवल एक ही वोट छोड़ा गया है।
पुनरीक्षण प्रक्रिया और प्रशासनिक तर्क
मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण के दौरान बूथ स्तर के अधिकारियों यानी बीएलओ द्वारा घर-घर जाकर सत्यापन का काम किया गया था। प्रशासनिक पक्ष का मानना रहा है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान इस क्षेत्र में हुए ढांचागत बदलावों और तोड़फोड़ के बाद कई लोग अपने दर्ज पतों पर मौजूद नहीं मिले। इसी भौतिक अनुपस्थिति को आधार बनाकर कई नाम हटाए गए। हालांकि इस बड़े पैमाने पर हुई कटौती के बाद यह सवाल उठ रहा है कि जो लोग बेघर होने के बाद भी वहीं रह रहे हैं, उन्हें नियमों के तहत कैसे शामिल रखा जाना चाहिए था। विवाद गहराने के साथ ही इस पूरी प्रक्रिया की समय-सीमा को लेकर भी प्रशासनिक स्तर पर विचार शुरू हुआ है।
जनता की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर इस मामले को लेकर आम लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ लोगों ने इसे कमजोर तबके के वोटिंग अधिकार छीनने की गंभीर प्रशासनिक लापरवाही करार देते हुए विरोध जताया है, जबकि अन्य लोगों का कहना है कि पते पर न पाए जाने वाले लोगों के नाम हटाना नियमसंगत प्रक्रिया का हिस्सा है।


























