राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी समारोह के समापन अवसर पर कांग्रेस नेता शशि थरूर ने एक नए लेख के माध्यम से तीखी बहस छेड़ दी है। द हिन्दू अखबार में प्रकाशित अपने इस लेख में उन्होंने इस बात पर गहराई से विचार किया है कि क्या यह प्रमुख वैचारिक संगठन अपनी मूल मान्यताओं और बहुसंख्यकवादी छवि से बाहर निकलकर किसी अधिक समावेशी और उदार मार्ग की ओर कदम बढ़ा रहा है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया है कि यदि संगठन वास्तव में अपने भीतर किसी प्रकार के वैचारिक विकास का दावा करता है, तो उसे अपने बयानों के अलावा जमीन पर ठोस कदम उठाकर यह साबित करना होगा कि उसकी कार्यशैली में कोई वास्तविक बदलाव आया है या नहीं।
शशि थरूर के लेख के मुख्य बिंदु
शशि थरूर ने अपने इस लेख में मुख्य रूप से इस बात पर सवाल उठाया है कि क्या दशकों पुराना यह संगठन अपने पारंपरिक दायरे से ऊपर उठकर आधुनिक भारत के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की क्षमता रखता है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह जानने की कोशिश की है कि क्या संगठन के भीतर चल रही वैचारिक हलचल वास्तव में किसी बड़े बदलाव का संकेत है या यह केवल सतह पर दिखने वाला एक बदलाव मात्र है। उनके इन विचारों के सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में इस बात पर चर्चा तेज हो गई है कि क्या देश का यह सबसे बड़ा वैचारिक संगठन समय के साथ अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव कर रहा है।
सार्वजनिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
इस लेख के सामने आते ही सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया। समर्थकों और आलोचकों दोनों ने ही इस विषय पर अपनी अलग-अलग राय रखी है। जहां कुछ लोगों ने इस वैचारिक मंथन को समय की मांग बताया, वहीं कई लोगों ने इस तरह के सवालों की प्रामाणिकता और मंशा पर भी सवाल खड़े किए। जनता के बीच इस बात को लेकर भी चर्चा देखने को मिली कि क्या इस तरह के वैचारिक मंचों से देश की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।


























