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वेतन और ड्राइवर की मिसाल से Shashi Tharoor ने समझाया परिसीमन का असली खेल, Naidu को दी चुनौतीनेता जी
17 जून 2026, 5:20 pm (45 दिन पहले)· 3

वेतन और ड्राइवर की मिसाल से Shashi Tharoor ने समझाया परिसीमन का असली खेल, Naidu को दी चुनौती

Shashi Tharoor ने X पर एक काल्पनिक उदाहरण के ज़रिए समझाया कि सबके लिए बराबर 50% बढ़ोतरी का दावा भले एक जैसा दिखे, लेकिन इससे असमानता और गहरी हो जाती है। उनका इशारा परिसीमन में सीटों के बंटवारे की बहस की ओर था।

Congress सांसद Shashi Tharoor ने सोशल मीडिया मंच X पर एक ऐसी पोस्ट साझा की है जिसने आनुपातिक प्रतिनिधित्व और परिसीमन को लेकर चल रही बहस को फिर से गरमा दिया है। अपने अंदाज़ में उन्होंने एक सीधा सा गणितीय उदाहरण रखकर यह दिखाने की कोशिश की कि बराबर प्रतिशत में बढ़ोतरी होने भर से दो पक्षों के बीच की खाई पटती नहीं, बल्कि और चौड़ी हो जाती है।

Tharoor का काल्पनिक उदाहरण

उन्होंने Naidu को संबोधित करते हुए एक सोच-प्रयोग पेश किया। मान लीजिए किसी की तनख़्वाह 2 लाख है और उसके ड्राइवर की 20,000। अब अगर सबके लिए 50% की बढ़ोतरी का ऐलान कर दिया जाए, तो पहले वाले की तनख़्वाह बढ़कर 3 लाख हो जाएगी और ड्राइवर की 30,000। Tharoor के मूल शब्दों में:

Naidu ji, let's try a thought experiment. Say your salary is 2 lakhs and your driver's is 20,000. You announce a 50% increase for everybody. Your salary is now 3 lakhs and your driver's is 30,000. The percentage or proportional increase is the same, but aren't you much better off

एक जैसा प्रतिशत, फिर भी बढ़ती दूरी

Tharoor का तर्क इसी अंक-गणित पर टिका है। प्रतिशत के लिहाज़ से दोनों को बराबर 50% का फ़ायदा मिला, यानी आनुपातिक बढ़ोतरी एक समान रही। लेकिन असल रकम में फ़र्क पहले 1 लाख 80 हज़ार रुपये का था और बढ़ोतरी के बाद वह बढ़कर और बड़ा हो गया। उनका इशारा साफ़ है कि जब आधार ही असमान हो, तो उस पर एक जैसा प्रतिशत लगाने से ताक़तवर पक्ष ही ज़्यादा फ़ायदे में रहता है।

परिसीमन की बहस से जुड़ाव

यह उदाहरण असल में सीधे-सीधे वेतन का नहीं, बल्कि लोकसभा सीटों के बंटवारे और परिसीमन की उस बहस का प्रतीक है जिसमें दक्षिणी राज्य लगातार आशंका जता रहे हैं। उनका डर है कि आबादी के आधार पर सीटें फिर से तय हुईं तो जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को नुक़सान होगा और ज़्यादा आबादी वाले राज्यों का पलड़ा भारी हो जाएगा। Tharoor का संदेश यही था कि बराबर प्रतिशत बढ़ोतरी का फ़ॉर्मूला सुनने में निष्पक्ष भले लगे, पर इससे मौजूदा असंतुलन कम नहीं होता।

जनता की प्रतिक्रिया

पोस्ट पर लोगों की राय बंटी हुई दिखी। कुछ ने Tharoor की दलील को सही ठहराया और बराबर प्रतिनिधित्व पर ज़ोर दिया, तो कई लोगों ने इसे आधा-अधूरा तर्क बताते हुए सवाल उठाया कि सीटें तो आख़िरकार आबादी के अनुपात में ही तय होनी चाहिए। कुछ यूज़र्स ने यह भी पूछा कि जब अनुपात वही रहता है तो असर में फ़र्क कहाँ पड़ता है, जबकि कई ने उत्तर और दक्षिण के संतुलन पर अपनी चिंता ज़ाहिर की।

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सवाल-जवाब

Shashi Tharoor ने अपनी पोस्ट में क्या उदाहरण दिया?
उन्होंने 2 लाख की तनख़्वाह और 20,000 कमाने वाले ड्राइवर का उदाहरण देकर बताया कि सबको 50% बढ़ोतरी देने पर भी दोनों के बीच की खाई कम नहीं होती।
उन्होंने यह पोस्ट किसे संबोधित करके लिखी?
उन्होंने पोस्ट में सीधे Naidu को संबोधित करते हुए यह सोच-प्रयोग रखा।
इस उदाहरण का असल मुद्दा क्या है?
यह असल में परिसीमन और लोकसभा सीटों के आनुपातिक बंटवारे की बहस से जुड़ा है, जहाँ बराबर प्रतिशत बढ़ोतरी से भी असमानता बनी रहती है।
लोगों ने पोस्ट पर कैसी प्रतिक्रिया दी?
राय बंटी रही, कुछ ने उनका तर्क सही माना तो कइयों ने इसे अधूरा बताते हुए आबादी के अनुपात में सीटें तय करने की बात कही।
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