प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की युवा शक्ति को सफलता और आंतरिक विकास का मार्ग दिखाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक प्रेरक संदेश साझा किया है। अपने इस विचार में उन्होंने स्पष्ट किया कि निरंतर कोशिशों और कठिन साधना से ही किसी भी व्यक्ति की प्रतिभा पूरी तरह से निखरती है। उन्होंने इस बात पर गर्व जताया कि आज के भारतीय युवा इन्हीं जीवन मूल्यों को आत्मसात करके वैश्विक मंचों पर देश का नाम रोशन कर रहे हैं।
भगवद्गीता के पावन श्लोक से दिया ज्ञान का संदेश
अपने विचार को आध्यात्मिक गहराई देने के लिए नरेंद्र मोदी ने श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय से एक प्रसिद्ध श्लोक उद्धृत किया। उन्होंने लिखा, न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विन्दति ॥ इस संस्कृत श्लोक का अर्थ है कि इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाली कोई दूसरी वस्तु या शक्ति नहीं है। जो मनुष्य योग, निष्काम कर्म और अनुशासन के माध्यम से योग्य बनता है, वह समय आने पर उस ज्ञान को अपने अंतर्मन में स्वयं प्राप्त कर लेता है।
कठिन परिश्रम और साधना से निखरती है प्रतिभा
इस संदेश के जरिए यह बात रेखांकित की गई है कि प्रतिभा केवल प्राकृतिक देन नहीं होती, बल्कि उसे लगातार अभ्यास और समर्पण से तराशना पड़ता है। खेल, विज्ञान, नवाचार, कला और उद्यमिता जैसे विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय युवा जिस तरह से नए आयाम स्थापित कर रहे हैं, उसके पीछे उनका निरंतर प्रयास ही सबसे मुख्य कारक है। जब कोई युवा अपनी प्रतिभा को अनुशासन और ज्ञान से जोड़ता है, तो उसकी सफलता केवल उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं रहती, बल्कि वह पूरे राष्ट्र के गौरव का कारण बन जाती है।
जनता की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया पर इस संदेश के आते ही लोगों की ओर से व्यापक प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। बड़ी संख्या में नागरिकों और युवाओं ने इस आध्यात्मिक विचार का स्वागत करते हुए इसे प्रेरणादायक बताया। लोगों का मानना था कि गीता का यह श्लोक आज की युवा पीढ़ी को सही दिशा दिखाने में बेहद प्रासंगिक है। वहीं, कुछ उपयोगकर्ताओं ने कमेंट सेक्शन में सामान्य वर्ग के छात्रों की समस्याओं, यूजीसी के नियमों और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी अपनी चिंताओं को भी सामने रखा।



























