झारखंड में मात्र सौ रुपये की रिश्वत से जुड़ा तीन दशक पुराना एक मामला अपने अंतिम कानूनी नतीजे पर पहुंच गया है। झारखंड हाईकोर्ट ने 31 साल पुराने इस रिश्वत मामले में अपना अंतिम फैसला सुनाया है, जो साल 1995 में शुरू हुआ था। यह मामला तत्कालीन रेलवे कर्मचारी काली शंकर धोबी से जुड़ा है, जिनकी उम्र अब 75 वर्ष हो चुकी है। उच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत उनकी दोषसिद्धि को तो बरकरार रखा है, लेकिन उनकी जेल की सजा की अवधि को काफी कम कर दिया है। अब उन्हें कठोर कारावास की जगह कम समय के लिए साधारण कैद की सजा काटनी होगी। यह मामला दर्शाता है कि भ्रष्टाचार के मामलों में कानूनी प्रक्रिया कितनी लंबी खिंच सकती है।
साल 1995 में 100 रुपये की रिश्वत से शुरू हुआ विवाद
इस पूरे मामले की शुरुआत साल 1995 में हुई थी। उस समय काली शंकर धोबी हटिया रेलवे स्टेशन पर पार्सल क्लर्क के रूप में कार्यरत थे। उसी दौरान निर्मल कुमार नाम के एक व्यक्ति को अपनी मोटरसाइकिल हटिया से समस्तीपुर भेजने के लिए बुक करनी थी। इस काम के लिए रेलवे द्वारा निर्धारित आधिकारिक शुल्क 203 रुपये तय था। लेकिन आरोप के अनुसार, पार्सल क्लर्क काली शंकर धोबी ने इस निर्धारित सरकारी शुल्क के अलावा निर्मल कुमार से 100 रुपये की अतिरिक्त रिश्वत की मांग की।
निर्मल कुमार ने इस अवैध मांग के आगे झुकने से इनकार कर दिया और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया। उन्होंने इसकी शिकायत केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से कर दी। शिकायत मिलने के बाद, जांच एजेंसी ने पार्सल क्लर्क को रंगे हाथ पकड़ने के लिए एक जाल बिछाया। साल 1995 में ही सीबीआई ने कार्रवाई करते हुए काली शंकर धोबी को 100 रुपये की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक कानून की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई।
निचली अदालत की लंबी सुनवाई और 2004 का फैसला
गिरफ्तारी के बाद मामला निचली अदालत में पहुंचा, जहां सुनवाई की प्रक्रिया वर्षों तक चली। मुकदमे के दौरान, अभियोजन पक्ष ने काली शंकर धोबी के खिलाफ आरोपों को साबित करने के लिए कुल 11 गवाहों को अदालत के सामने पेश किया। इन गवाहों के बयानों और मामले से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्यों के आधार पर निचली अदालत ने आरोपी को दोषी पाया।
साल 2004 में निचली अदालत ने इस मामले में अपना फैसला सुनाया। अदालत ने काली शंकर धोबी को भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा 7 के तहत दोषी पाते हुए एक साल के कठोर कारावास और 4 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इसके साथ ही, धारा 13(1)(d) के तहत उन्हें डेढ़ साल के कठोर कारावास और 6 हजार रुपये जुर्माने की सजा दी गई। निचली अदालत के इस फैसले को चुनौती देते हुए काली शंकर धोबी ने झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया, जिसके बाद यह मामला उच्च न्यायालय में पहुंच गया।
झारखंड हाईकोर्ट में तीन दशक बाद आया अंतिम फैसला
हाईकोर्ट में भी इस अपील पर सुनवाई की प्रक्रिया बेहद लंबी चली और यह मामला साल 1995 से खिंचते हुए अंततः साल 2026 तक पहुंच गया। झारखंड हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 12 जून 2026 को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इसके बाद, 10 सितंबर 2026 को अदालत ने अपना अंतिम फैसला सुनाया।
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में काली शंकर धोबी की दोषसिद्धि को सही ठहराया और उसे बरकरार रखा। हालांकि, अदालत ने सजा की अवधि तय करते समय कुछ मानवीय और व्यावहारिक पहलुओं पर विचार किया। हाईकोर्ट ने आरोपी की वर्तमान उम्र यानी 75 वर्ष, उनके पहले अपराध और इस मामले के कारण उन्हें पहले ही नौकरी से बर्खास्त किए जाने जैसी परिस्थितियों को ध्यान में रखा। इन आधारों पर अदालत ने उनकी जेल की सजा को कम करने का निर्णय लिया।
सजा में कटौती और सरेंडर करने का आदेश
झारखंड हाईकोर्ट ने सजा में राहत देते हुए धारा 7 के तहत मिली एक साल की कठोर कैद को घटाकर छह महीने की साधारण कैद में बदल दिया। वहीं, धारा 13(1)(d) के तहत मिली डेढ़ साल की कठोर कैद की सजा को कम करके एक साल की साधारण कैद कर दिया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि ये दोनों सजाएं एक साथ चलेंगी, जिसका मतलब है कि उन्हें अधिकतम एक साल की जेल काटनी होगी।
हालांकि, जेल की सजा कम करने के बावजूद हाईकोर्ट ने जुर्माने की राशि में कोई बदलाव नहीं किया है। निचली अदालत द्वारा लगाए गए 4 हजार रुपये और 6 हजार रुपये के जुर्माने बरकरार रहेंगे। इसके अतिरिक्त, अदालत ने काली शंकर धोबी को दो महीने के भीतर अदालत के सामने आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है। इस प्रकार, साल 1995 में महज 100 रुपये के नोट से शुरू हुई यह कानूनी कहानी 31 साल बाद अपने अंतिम मुकाम पर पहुंच गई है, जहां एक 75 वर्षीय बुजुर्ग को अपनी तीन दशक पुरानी गलती के लिए जेल जाना होगा।


















