पाकिस्तान ने एक बार फिर अपने वादों से पीछे हटते हुए दुनिया को चौंका दिया है। हाल ही में सऊदी अरब और तुर्की के साथ मिलकर एक बड़ा रक्षा समझौता किया गया था जिसे मक्का डिफेंस पैक्ट का नाम दिया गया। इस समझौते को मुस्लिम देशों का अपना नाटो करार दिया गया था और यह दावा किया गया था कि यदि किसी एक देश पर भी हमला होता है तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। हालांकि जब ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के शहरों और ऊर्जा संयंत्रों को निशाना बनाया तो पाकिस्तान ने मैदान में उतरने से इनकार कर दिया और इस समझौते से अपने कदम पीछे खींच लिए।
मक्का पैक्ट और बड़े-बड़े दावे
बीते महीने जब मक्का की धरती पर इस त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर मुहर लगी थी, तब इस्लामाबाद में इसे एक बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में प्रचारित किया गया था। पाकिस्तानी हुक्मरानों और मीडिया में यह बात जोरों पर कही गई थी कि अब सऊदी अरब या तुर्की की तरफ कोई आंख उठाकर नहीं देख सकता क्योंकि तीनों देश मिलकर दुश्मन का मुकाबला करेंगे। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी विभिन्न टेलीविजन साक्षात्कारों में यह दावा किया था कि यह एक साझा रक्षा समझौता है और यदि यमन की जंग सऊदी जमीन तक पहुंचती है या वहां कोई हमला होता है, तो यह पैक्ट तुरंत प्रभावी हो जाएगा। उन्होंने यह तक कहा था कि इस्लामाबाद अपनी हर शर्त को पूरा करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
हूती हमलों के बाद आया यू-टर्न
सऊदी अरब के विभिन्न हिस्सों और ऊर्जा ठिकानों पर हाल ही में हुए भीषण हूती हमलों में कम से कम 73 आम नागरिक घायल हो चुके हैं और बुनियादी ढांचे को भी गंभीर नुकसान पहुंचा है। इन हमलों के बाद जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें पाकिस्तान पर टिकीं और यह उम्मीद की गई कि वह अपनी प्रतिबद्धता निभाएगा, तो विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने एक बयान जारी कर स्पष्ट कर दिया कि मक्का पैक्ट के तहत सऊदी अरब की मदद के लिए फिलहाल किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई पर कोई विचार नहीं चल रहा है। जब उनसे यह पूछा गया कि इस्लामाबाद अपनी इस जिम्मेदारी को कब पूरा करेगा, तो उनका सीधा जवाब था कि जब सही समय आएगा तब कदम उठाया जाएगा।
समझौते में खोजा गया लूप होल
सामूहिक सुरक्षा के नाम पर साइन किए गए इस समझौते से इस तरह अचानक पीछे हटने पर रियाद भी हैरान है। पाकिस्तानी रक्षा मंत्रालय और विदेश नीति के जानकारों ने इस पैक्ट में एक ऐसा रास्ता तलाश लिया है जिसके जरिए सेना भेजने से बचा जा सके। अधिकारियों का यह तर्क सामने आया है कि यह समझौता रक्षात्मक सहयोग के लिए है न कि किसी तीसरे देश के खिलाफ आक्रामक युद्ध छेड़ने के वास्ते। हालांकि समझौते की मूल शर्त यह थी कि एक पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा, लेकिन क्रियान्वयन के तरीकों को लेकर अस्पष्टता का लाभ उठाते हुए पाकिस्तान ने इस प्रक्रिया से दूरी बना ली है।
ईरान का डर और आर्थिक संकट
पाकिस्तान के इस रवैये के पीछे कई बड़े भू-राजनीतिक और आर्थिक कारण काम कर रहे हैं। सबसे बड़ा डर ईरान का है क्योंकि हूती विद्रोहियों को तेहरान का समर्थन प्राप्त माना जाता है और पाकिस्तान की सीमाएं ईरान से मिलती हैं। जनरल असीम मुनीर के नेतृत्व वाली सेना किसी भी सूरत में ईरान के साथ सीधी दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहती है। इसके अलावा, पाकिस्तान खुद गंभीर आर्थिक बदहाली और आंतरिक आतंकवाद की समस्या से जूझ रहा है। ऐसे में किसी नए क्षेत्रीय संघर्ष में उलझना उनके लिए संभव नहीं है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अरब देशों से मिलने वाले वित्तीय सहयोग और सस्ते तेल पर निर्भर रहने वाला पाकिस्तान रियाद को इस फैसले के बाद क्या सफाई देता है।



















