पाकिस्तान की भू-राजनीतिक परिस्थितियां लगातार एक नए संकट की ओर इशारा करती हैं। सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते के बाद, जब मक्का पैक्ट के तहत एक त्रिकोणीय गठबंधन बनाया गया, तो सऊदी अरब और हूतियों के बीच संघर्ष ने नया मोड़ ले लिया। इस बीच पाकिस्तान की स्थिति बेहद असहज हो गई है क्योंकि अगर वह ईरान कुछ कहता है तो उसे तीखी प्रतिक्रिया मिलती है, और यदि वह चुप रहता है तो समझौते के नियमों के तहत उसे युद्ध के मैदान में उतरना पड़ सकता है। यही कारण है कि इस मोर्चे पर इस्लामाबाद हर कदम बेहद सावधानी के साथ उठा रहा है। जब इस क्षेत्र में तनाव अपने चरम पर था, तब पाकिस्तान ने शांतिदूत की भूमिका निभाने की कोशिश की, लेकिन तेहरान ने इस मध्यस्थता को सिरे से खारिज कर दिया।
इस्लामाबाद की ओर से तेहरान को एक संदेश भेजा गया था जिसमें यमन के हूती विद्रोहियों पर लगाम कसने और इस तनाव को समाप्त करने में सहयोग की अपील की गई थी। यह संदेश मूल रूप से सऊदी अरब के हितों को ध्यान में रखकर पहुंचाया गया था। हालांकि इसके जवाब में पाकिस्तान को ईरान से तीखा और स्पष्ट संदेश मिला। तेहरान ने दो टूक शब्दों में यह साफ कर दिया कि उसका हूती विद्रोहियों पर किसी भी तरह का नियंत्रण नहीं है और न ही वह ऐसा कोई प्रभाव रखता है। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय जानकारों और पश्चिमी देशों का मानना है कि हूतियों को हथियारों की आपूर्ति और वैचारिक समर्थन ईरान से ही मिलता है, और तेहरान अपने रणनीतिक फायदों के लिए इन विद्रोही समूहों का इस्तेमाल करता है।
सऊदी अरब और हूतियों के बीच संघर्ष का इतिहास
ईरान के सूत्रों के हवाले से यह भी दावा सामने आया है कि तेहरान ने कथित तौर पर हूतियों को यमन में आक्रामकता बढ़ाने के लिए उकसाया है और इसके बदले उन्हें भरपूर फंडिंग तथा सैन्य सहायता दी जा रही है। यह पूरा विवाद यमन के गृहयुद्ध से गहराई से जुड़ा हुआ है। साल 2014 में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने यमन की राजधानी सना पर अपना अधिकार जमा लिया था। इसके जवाब में साल 2015 में सऊदी अरब ने यमन की वैध सरकार के समर्थन में बड़े पैमाने पर हवाई हमले शुरू कर दिए थे। लंबे संघर्ष के बाद साल 2022 में एक युद्धविराम समझौता हुआ था, लेकिन साल 2026 आते-आते यह तनाव एक बार फिर भड़क उठा। हूतियों ने लाल सागर में आवाजाही कर रहे सऊदी जहाजों को निशाना बनाया और सितंबर महीने में सऊदी के दक्षिणी शहरों पर ड्रोन तथा मिसाइल से हमले किए, जिसमें 73 लोग घायल हो गए। इस बड़ी घटना के बाद से दोनों पक्षों के बीच खटास और ज्यादा बढ़ गई है।
मक्का पैक्ट के कारण बढ़ी कूटनीतिक मुश्किलें
इस पूरे घटनाक्रम के बीच पाकिस्तान एक दोधारी तलवार पर चलने को मजबूर हो गया है। एक तरफ उसने ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने के लिए शांति मध्यस्थता की कमान संभाल रखी है, जिसकी वजह से उसे तेहरान के हितों का भी खयाल रखना पड़ रहा है। दूसरी तरफ सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हाल ही में हुए मक्का पैक्ट जैसे गठबंधन ने उसकी मजबूरी बढ़ा दी है, क्योंकि इस पैक्ट के तहत उसे जरूरत पड़ने पर सऊदी अरब का साथ देने के लिए बाध्य होना पड़ सकता है। चूंकि मौजूदा संघर्ष सऊदी अरब और हूतियों के बीच है और हूतियों के तार सीधे तौर पर ईरान से जुड़े हैं, इसलिए पाकिस्तान के सामने यह दुविधा पैदा हो गई है कि वह किस पक्ष का साथ दे। हालांकि पाकिस्तानी हलकों से यह सफाई दी जा रही है कि यदि उसकी सेनाएं इस युद्ध में उतरती भी हैं, तो उनका रुख पूरी तरह से रक्षात्मक होगा और उनका उद्देश्य केवल सऊदी अरब की क्षेत्रीय सीमाओं की रक्षा करना होगा। इन तमाम कोशिशों के बीच ईरान की बढ़ती नाराजगी ने इस्लामाबाद की नींद उड़ा रखी है।



















