पाकिस्तान के 14 अगस्त को आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान देश के शीर्ष नेतृत्व ने घरेलू चुनौतियों से ध्यान भटकाने के लिए पुरानी राजनीतिक बयानबाजी का सहारा लिया। राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने अपने औपचारिक संबोधन में भारत और अखंड भारत की अवधारणा का जिक्र करते हुए देश में मौजूद हिंदू अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर बड़े दावे किए। उसी कार्यक्रम में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सिंधु जल समझौते के निलंबन और कश्मीर मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। दोनों नेताओं के बयानों ने पाकिस्तान की आंतरिक आर्थिक बदहाली, बिगड़ती सुरक्षा स्थिति और मानवाधिकारों के रिकॉर्ड को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जारी बहस को फिर से तेज कर दिया है।
राष्ट्रपति जरदारी का अखंड भारत पर बयान और अल्पसंख्यकों पर दावा
अपने भाषण के दौरान राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने दावा किया कि भारत के लोग अखंड भारत की सोच में विश्वास रखते हैं। इसके साथ ही उन्होंने पाकिस्तान के समाज को सहिष्णु बताते हुए कहा कि मुस्लिम समुदाय सहिष्णुता की सोच रखता है। जरदारी ने दावा किया कि पाकिस्तान में रहने वाली 4 प्रतिशत हिंदू आबादी पूरी तरह से स्वतंत्र है और वे भारत जाने के बजाय पाकिस्तान में ही रहना पसंद करेंगे। अपने इस वक्तव्य के माध्यम से जरदारी ने यह दिखाने का प्रयास किया कि देश में अल्पसंख्यक पूरी तरह सुरक्षित और संतुष्ट हैं, हालांकि यह बयान वास्तविक जमीनी परिस्थितियों के ठीक विपरीत नजर आता है।
पाकिस्तान में हिंदू आबादी का गिरता आंकड़ा और जमीनी हकीकत
ऐतिहासिक जनगणना के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्वतंत्रता के समय वर्ष 1947 में पाकिस्तान में हिंदू आबादी लगभग 20 से 25 प्रतिशत के आसपास थी। हालांकि पिछले कई दशकों में यह संख्या लगातार घटती गई और वर्तमान में सिमटकर केवल 4 प्रतिशत रह गई है। यह तीव्र गिरावट दर्शाती है कि वहां माइनॉरिटी समुदाय को किस प्रकार के हालातों का सामना करना पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने बार-बार पाकिस्तान में होने वाले जबरन धर्म परिवर्तन, अत्याचारों और पूजा स्थलों पर हमलों की घटनाओं को रेखांकित किया है। वैश्विक मंचों पर अपनी छवि सुधारने की जरदारी की कोशिश इन जमीनी तथ्यों के सामने कमजोर साबित होती है।
आंतरिक संकट के समय अल्पसंख्यकों के नाम पर राजनीति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब भी पाकिस्तान के भीतर आर्थिक संकट गहराता है, राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न होती है या सुरक्षा स्थिति बिगड़ती है, तो वहां का नेतृत्व भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने का प्रयास करता है। ऐसे समय में 4 फीसदी हिंदू आबादी को अपनी कथित सहिष्णुता के प्रमाण के रूप में पेश किया जाता है। असलियत यह है कि देश के अल्पसंख्यक नागरिक अपनी सुरक्षा और मौलिक अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। 15 अगस्त 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा की गई जनगणना रिपोर्ट और वीडियो क्लिप ने भी राष्ट्रपति जरदारी के दावों और आधिकारिक आंकड़ों के बीच के अंतर को स्पष्ट उजागर किया है।
सिंधु जल समझौते पर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का आक्रामक रुख
स्वतंत्रता दिवस के उसी मंच से बोलते हुए प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भारत के खिलाफ आक्रामक तेवर अपनाए। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत ने सिंधु जल समझौते को एकतरफा और अवैध तरीके से निलंबित कर दिया है। शरीफ ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि पाकिस्तान के पानी की एक-एक बूंद देश के लिए रेड लाइन है। उल्लेखनीय है कि पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में भारत द्वारा की गई सख्त सैन्य कार्रवाई और ऑपरेशन के बाद नई दिल्ली ने पाकिस्तान के खिलाफ कदम उठाते हुए सिंधु जल समझौते को स्थगित करने का फैसला लिया था। शहबाज शरीफ ने इस फैसले को पाकिस्तान के जल अधिकारों का हनन बताया।
अफगानिस्तान के साथ बढ़ते तनाव पर भारत को घेरने की कोशिश
सिंधु जल समझौते के अलावा प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अफगानिस्तान के साथ जारी सीमावर्ती विवाद को भी भारत से जोड़ने का प्रयास किया। एक तरफ जहां पाकिस्तानी सेना खुद अफगान सीमावर्ती इलाकों में हवाई हमले कर रही है, वहीं दूसरी तरफ शहबाज शरीफ ने आरोप लगाया कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ आतंकवाद फैलाने के लिए किया जा रहा है। अफगान पक्ष की ओर से मिल रही जवाबी कार्रवाई के बाद पाकिस्तानी नेतृत्व इस सीमा तनाव का ठीकरा बाहरी कारकों पर फोड़ने में लगा हुआ है। दोनों नेताओं के भाषणों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि पाकिस्तान का शीर्ष नेतृत्व अपनी प्रशासनिक और कूटनीतिक विफलताओं को छिपाने के लिए पुरानी बयानबाजी का ही सहारा ले रहा है।



















