पाकिस्तान के अशांत प्रांत बलूचिस्तान में 11 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाए जाने के बाद वैश्विक और कूटनीतिक गलियारों में नई हलचल देखने को मिली है। इस मौके पर प्रमुख बलूच नेता मीर यार बलूच ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र और संप्रभु देश के रूप में मान्यता देने की मांग दोहराई। आंदोलन के इस मोड़ पर बलूच नेताओं ने नई दिल्ली की ओर आभार व्यक्त किया, क्योंकि भारत के विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में मानवाधिकारों की स्थिति पर अपनी बात रखी थी। बलूच प्रतिनिधियों ने भारतीय विदेश मंत्रालय की टिप्पणियों का स्वागत किया, हालांकि भारत ने अब तक बलूचिस्तान को एक अलग देश के रूप में आधिकारिक मान्यता नहीं दी है।
वैश्विक संगठनों से मान्यता की अपील
सोशल मीडिया पर जारी एक विस्तृत संदेश में मीर यार बलूच ने संयुक्त राष्ट्र, आसियान, अफ्रीकी संघ, इस्लामिक सहयोग संगठन और कई यूरोपीय देशों का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने इन वैश्विक निकायों से आग्रह किया कि वे बलूचिस्तान के स्वतंत्रता के दावे को अपना समर्थन दें। बलूच नेतृत्व का कहना है कि दुनिया को बलूचिस्तान को पाकिस्तान के केवल एक प्रशासनिक प्रांत के रूप में देखना बंद करना चाहिए और इसे एक स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा देना चाहिए।
लंबे समय से अपने राजनीतिक अधिकारों और आजादी के लिए संघर्ष कर रहे बलूच नेता अब इस आंदोलन को राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर वैश्विक समर्थन दिलाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इस पूरे प्रयास में पड़ोसी देश भारत की भूमिका हमेशा चर्चा में रहती है। बलूच लोग भारत से नैतिक और कूटनीतिक समर्थन की अपेक्षा रखते हैं। हालांकि भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बलूच समुदाय के संघर्ष और उनकी चिंताओं का सम्मान किया है, लेकिन रणनीतिक और कूटनीतिक तौर पर बलूचिस्तान को एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं दी है।
भारतीय विदेश मंत्रालय की ब्रीफिंग पर बलूच प्रतिक्रिया
ताज़ा घटनाक्रम 11 अगस्त को भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) की नियमित प्रेस ब्रीफिंग से जुड़ा है। ब्रीफिंग के दौरान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर और बलूचिस्तान से संबंधित सवाल पूछे गए थे। अपने जवाब में प्रवक्ता ने पाकिस्तान के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन और जवाबदेही के मुद्दे को रेखांकित किया था।
मीर यार बलूच ने भारतीय विदेश मंत्रालय के इस रुख का पुरजोर स्वागत किया। उन्होंने पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर और अन्य इलाकों में मानवाधिकारों के हनन पर भारत द्वारा उठाई गई आवाज की सराहना की। इसके साथ ही उन्होंने भारतीय मीडिया द्वारा बलूचिस्तान के मुद्दे और स्वतंत्रता दिवस आयोजनों को प्रमुखता से दिखाए जाने पर भी खुशी जताई। हालांकि विदेश नीति विशेषज्ञों का कहना है कि मानवाधिकारों पर भारत की टिप्पणी और बलूचिस्तान को आधिकारिक देश मानना दो अलग-अलग विषय हैं। बलूच नेताओं द्वारा इसे अपने आंदोलन के समर्थन के रूप में देखना उनका अपना राजनीतिक दृष्टिकोण है।
भावी गणराज्य का ढांचा और संविधान
बलूच अलगाववादी नेताओं का दावा है कि उनके क्षेत्र के लोगों को दशकों से राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा गया है और वहां गंभीर मानवाधिकार समस्याएं बनी हुई हैं। 11 अगस्त की तारीख को ऐतिहासिक स्वतंत्रता के दावे से जोड़ते हुए दुनिया भर में मौजूद बलूच समुदाय के लोगों ने स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाया और इसकी तस्वीरें व वीडियो साझा किए।
एक भावी स्वतंत्र 'रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान' का खाका पेश करते हुए मीर यार बलूच ने कहा कि स्वतंत्र होने पर वहां अपनी स्वायत्त सरकार, राष्ट्रीय मुद्रा, पासपोर्ट, विदेश नीति, रक्षा तंत्र और कूटनीतिक मिशन स्थापित किए जाएंगे। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि प्रस्तावित देश के संचालन के लिए संविधान पहले ही तैयार किया जा चुका है।
पाकिस्तान का रुख और कूटनीतिक धरातल
दूसरी ओर पाकिस्तान सरकार बलूच नेताओं के इन तमाम दावों को सिरे से खारिज करती है। इस्लामाबाद का स्पष्ट कहना है कि बलूचिस्तान पाकिस्तान का एक अभिन्न अंग है। पाकिस्तान की सरकार बलूच सशस्त्र समूहों और अलगाववादी संगठनों को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा मानती है।
अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकारों का मानना है कि किसी क्षेत्र द्वारा खुद को स्वतंत्र घोषित कर देना और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से संप्रभु राष्ट्र की मान्यता मिलना दो पूरी तरह से भिन्न स्थितियां हैं। बलूच नेताओं द्वारा रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान की बात कहे जाने के बावजूद फिलहाल दुनिया के किसी भी देश ने इसे मान्यता नहीं दी है, इसलिए इसे एक राजनीतिक और अलगाववादी दावे के रूप में ही देखा जा रहा है। यह पूरा मामला ऐसे समय में गरमाया है जब पाकिस्तान पहले से ही आंतरिक सुरक्षा, राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक व क्षेत्रीय तनावों का सामना कर रहा है। आने वाले समय में इस आंदोलन को वैश्विक मंचों पर कितनी कूटनीतिक सफलता मिलती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।



















