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बच्चा स्कूल जाने से कतराए तो न समझें आलस, इसके पीछे छिपी होती हैं ये गहरी वजहेंपेरेंटिंग
24 अग॰ 2026, 10:36 am (1 घंटे पहले)· 2

बच्चा स्कूल जाने से कतराए तो न समझें आलस, इसके पीछे छिपी होती हैं ये गहरी वजहें

सुबह-सुबह स्कूल जाने में आनाकानी करने वाले बच्चों को केवल आलसी समझना भूल हो सकती है। इसके पीछे नए माहौल का डर, पढ़ाई का बढ़ता दबाव, बुलिंग या शिक्षकों का व्यवहार जैसी गंभीर वजहें हो सकती हैं।

सुबह होते ही कई घरों का नजारा एक जैसा ही नजर आने लगता है। बिस्तर से उठते ही बच्चा स्कूल जाने से बचने के लिए अलग-अलग बहाने तलाशने लगता है। कभी उसे पेट में अचानक दर्द की शिकायत होती है तो कभी वह भारी थकान का रोना रोता है। अधिकतर अभिभावक इन बातों को बच्चों का केवल आलस या पढ़ाई से जी चुराना मान लेते हैं, लेकिन हर बार मामला इतना सीधा नहीं होता। इस तरह की टालमटोल के पीछे बच्चे के कोमल मन में चल रही कोई गहरी मानसिक उलझन भी हो सकती है, जिसे समय रहते समझना बहुत जरूरी है।

नए माहौल और बदलाव का डर

छोटे बच्चों के लिए स्कूल जाने से हिचकिचाने की सबसे बड़ी वजह नए और अनजान माहौल का खौफ हो सकती है। घर की चारदीवारी और अपनों के सुरक्षित दायरे से बाहर निकलकर नए लोगों, सख्त शिक्षकों और सहपाठियों के बीच खुद को ढालना उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं होता। ऐसे संवेदनशील बच्चों को डांटने के बजाय अतिरिक्त समय और मजबूत भावनात्मक सहारे की जरूरत होती है ताकि वे सहज महसूस कर सकें।

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बढ़ती प्रतिस्पर्धा और अकादमिक दबाव

आज के दौर में शिक्षा प्रणाली के भीतर गलाकाट प्रतिस्पर्धा काफी ज्यादा बढ़ चुकी है। बेहतरीन नंबर लाने का दबाव, रोज का होमवर्क, लगातार होने वाले टेस्ट और तमाम अतिरिक्त गतिविधियों का बोझ कई बच्चों को मानसिक रूप से बुरी तरह थका देता है। जब कोई बच्चा खुद को कक्षा में बाकी साथियों से कमजोर या पीछे आंकने लगता है, तो उसके भीतर स्कूल के प्रति एक नकारात्मक छवि बनने लगती है। यही वजह है कि वह उस तनावपूर्ण जगह से दूर भागना चाहता है।

बुलिंग और साथियों का रवैया

कई बार स्कूल परिसर के भीतर कुछ बच्चे अपने ही सहपाठियों का मजाक उड़ाते हैं या उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान करते हैं, जिसे बुलिंग कहा जाता है। डर या शर्मिंदगी के कारण ज्यादातर बच्चे इस गंभीर बात का जिक्र अपने घर पर नहीं कर पाते। अगर आपका बच्चा अचानक बहुत शांत रहने लगा है, उसका आत्मविश्वास तेजी से गिर रहा है या सिर्फ स्कूल का नाम सुनते ही वह घबराहट महसूस करने लगता है, तो यह इस बात का स्पष्ट संकेत हो सकता है कि वह किसी तरह की बुलिंग का शिकार हो रहा है।

शिक्षकों का व्यवहार और अप्रिय घटनाएं

कभी-कभार किसी शिक्षक की तरफ से पड़ी डांट, कोई अपमानजनक टिप्पणी या कक्षा के भीतर घटी कोई अन्य अप्रिय घटना बच्चे के मासूम मन पर बहुत गहरा घाव छोड़ देती है। इसके बाद बच्चा स्कूल को एक सुरक्षित और सकारात्मक जगह मानने के बजाय तनाव और डर का केंद्र समझने लगता है। ऐसी परिस्थितियों में माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बिना गुस्सा किए बच्चे की बात को ध्यान से सुनें और जरूरत पड़ने पर तुरंत स्कूल प्रशासन से संवाद स्थापित करें।

शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी न करें

भरपूर नींद न मिल पाना, खानपान और उठने-बैठने की गलत दिनचर्या, मोबाइल या टीवी का अत्यधिक स्क्रीन टाइम, लगातार बनी रहने वाली चिंता या अवसाद जैसी परेशानियां भी बच्चे को स्कूल जाने से रोक सकती हैं। यदि कोई बच्चा लगातार स्कूल जाने के लिए साफ इनकार कर रहा है, तो उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की पूरी जांच करवाना काफी मददगार साबित हो सकता है।

खुली बातचीत और संवाद का महत्व

बच्चे की इस समस्या की जड़ तक पहुंचने का सबसे बेहतरीन तरीका उससे दोस्ताना माहौल में खुलकर बात करना है। उसे इस बात का पूरा भरोसा दिलाना होगा कि उसकी हर बात को पूरी गंभीरता से सुना जाएगा और उसका किसी भी सूरत में मजाक नहीं उड़ाया जाएगा। इसके अलावा माता-पिता और स्कूल के शिक्षकों के बीच लगातार बातचीत होना भी बच्चे की परेशानियों को समय रहते पहचानने में बहुत मददगार होता है।

सवाल-जवाब

बच्चा रोज सुबह स्कूल जाने से क्यों कतराता है?
इसके पीछे नए माहौल का डर, पढ़ाई का अत्यधिक दबाव, बुलिंग या शिक्षकों का सख्त रवैया जैसी कई वजहें हो सकती हैं।
क्या स्कूल जाने से बचने के पीछे बुलिंग एक कारण हो सकता है?
हां, कई बार साथी छात्रों द्वारा परेशान किए जाने के डर से बच्चे स्कूल जाने से बचने के लिए बहाने बनाते हैं।
अभिभावकों को ऐसी स्थिति में क्या कदम उठाना चाहिए?
अभिभावकों को बच्चे से खुलकर बात करनी चाहिए, उसकी बात को ध्यान से सुनना चाहिए और जरूरत पड़ने पर स्कूल प्रशासन से संपर्क करना चाहिए।
शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का स्कूल जाने से क्या संबंध है?
नींद की कमी, ज्यादा स्क्रीन टाइम, चिंता या अवसाद जैसी समस्याएं बच्चे की मानसिक ऊर्जा को प्रभावित करती हैं जिससे वे स्कूल जाने से इंकार कर सकते हैं।
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