किसी भी बच्चे की मानसिक बनावट और उसके सोचने के नजरिए को गढ़ने में पारिवारिक माहौल सबसे अहम भूमिका निभाता है। बचपन के नाजुक दौर में बच्चे अपने अभिभावकों की बातों को बहुत गहराई से महसूस करते हैं और उन्हें सच मान बैठते हैं। ऐसे में समझाइश देने या अनुशासन सिखाने के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द सीधे उनके दिल पर असर डालते हैं। खासकर बेटियों के साथ बातचीत के दौरान बार-बार दोहराई जाने वाली नकारात्मक बातें उनके आत्मसम्मान और खुद की क्षमताओं पर यकीन करने की आदत को कमजोर कर देती हैं।
कामकाज और सपनों को जेंडर के बंधन में बांधना
अक्सर अनजाने में बेटियों को यह कह दिया जाता है कि तुम लड़की हो, इसलिए तुम्हें यह काम नहीं करना चाहिए। किसी खेल, शौक, जिम्मेदारी या करियर के चुनाव से सिर्फ जेंडर के आधार पर रोकना बच्ची की सोच को सीमित कर देता है। जब किसी बच्ची को लगातार यह एहसास कराया जाए कि समाज के कुछ दायरे और काम लड़कियों के लिए नहीं बने हैं, तो वह धीरे-धीरे अपनी प्रतिभा और प्राथमिकताओं पर संदेह करने लगती है। बच्चों के किसी भी काम को लड़का या लड़की के खांचे में बांटने के बजाय उनकी व्यक्तिगत रुचि और मेहनत के अनुसार आगे बढ़ने की प्रेरणा देनी चाहिए।
स्वाभाविक मानवीय भावनाओं और गुस्से को दबाने का दबाव
यह धारणा भी काफी नुकसानदेह साबित होती है कि लड़कियों को गुस्सा नहीं करना चाहिए या उन्हें हमेशा शांत ही दिखना चाहिए। किसी भी सामान्य इंसान की तरह बेटियों के भीतर भी क्रोध, पीड़ा, भय और हताशा जैसी स्वाभाविक भावनाएं पैदा होती हैं। हर परिस्थिति में चुप रहने का निर्देश देने से बच्चे अपनी भावनाएं दबाने लगते हैं, जिससे मानसिक तनाव बढ़ता है। इसकी जगह अभिभावकों को उन्हें यह सिखाना चाहिए कि किसी भी बात पर गुस्सा या नाराजगी महसूस होना पूरी तरह स्वाभाविक है, मगर उस भावना को व्यक्त करने का तरीका संतुलित और सुरक्षित होना चाहिए।
सहेलियों या अन्य बच्चों से तुलना करने की आदत
दूसरों के बच्चों को देखकर अपनी बेटी से यह कहना कि देखो तुम्हारी सहेली कितनी अच्छी है, उसके आत्मबल पर गहरी चोट पहुंचाता है। चाहे मामला पढ़ाई का हो, बातचीत के तौर-तरीकों का हो, पहनावे का हो या शारीरिक बनावट का, किसी और से तुलना करने पर बच्ची खुद को कमतर महसूस करने लगती है। इसकी जगह बेटी द्वारा किए जा रहे व्यक्तिगत प्रयासों, उसकी मेहनत और उसमें आ रहे सुधार की सराहना करनी चाहिए। इससे उसके मन में यह भरोसा मजबूत होता है कि उसे दुनिया में किसी दूसरे जैसा बनने की बिल्कुल जरूरत नहीं है।
हर फैसले में समाज और दूसरों की राय का खौफ दिखाना
बच्चों को सामाजिक व्यवहार के नियम सिखाना जरूर जरूरी है, लेकिन उनकी हर पसंद या फैसले में लोग क्या कहेंगे का डर बैठा देना गंभीर समस्या बन जाता है। जब कोई बेटी हमेशा दूसरों के नजरिए को अपनी व्यक्तिगत पसंद और प्राथमिकताओं से बड़ा मानने लगती है, तो वह अपनी बुनियादी पहचान खोने लगती है। ऐसी परवरिश से आत्मनिर्भरता खत्म होती है। बेटियों को सही और गलत के बीच तर्कसंगत अंतर समझने देना चाहिए, ताकि वे पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने जीवन के फैसले खुद ले सकें।
गलती होने पर पूरी क्षमता पर सवाल उठाना
गुस्से या झुंझलाहट में यह बोल देना कि तुमसे कुछ नहीं हो पाएगा, बच्चे के मनोबल को बुरी तरह तोड़ देता है। जब भी कोई भूल या असफलता सामने आए, तो बच्चे की पूरी काबिलियत को कटघरे में खड़ा करने के बजाय केवल उस विशेष गलती पर चर्चा करनी चाहिए। तुमने यह काम ठीक नहीं किया कहना और तुम कभी कुछ कर ही नहीं सकती कहना, दोनों के मनोवैज्ञानिक प्रभाव बिल्कुल अलग होते हैं।
मुश्किलों से बचाने के बजाय मुकाबला करने लायक बनाना
बेटियों की सही परवरिश का अर्थ यह नहीं है कि उन्हें जीवन के हर संघर्ष और कठिनाई से बचाकर रखा जाए। असली जिम्मेदारी यह है कि उन्हें विषम परिस्थितियों को समझने और उनका मुकाबला करने के लिए मानसिक रूप से मजबूत बनाया जाए। घर में उनकी राय को तवज्जो देना, सवाल पूछने का खुला अवसर प्रदान करना, गलतियों से सीख लेने की छूट देना और छोटे-छोटे प्रयासों की तारीफ करना उनके व्यक्तित्व को संवारता है। माता-पिता के मुंह से निकलने वाले छोटे-छोटे शब्द भी आने वाले कल की मजबूत नींव तैयार करते हैं।



















