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भारत में रहकर केन्सिया कला ने बदली अपनी सोच, देसी मांओं से सीखे परवरिश के ये 4 खास तरीकेपेरेंटिंग
24 जून 2026, 1:07 pm (47 दिन पहले)· 2

भारत में रहकर केन्सिया कला ने बदली अपनी सोच, देसी मांओं से सीखे परवरिश के ये 4 खास तरीके

यूरोप में पली-बढ़ीं केन्सिया कला ने एक भारतीय से शादी के बाद भारतीय परंपराओं को अपनाया और बताया कि सह-नींद, तेल मालिश, अर्थपूर्ण नाम और जन्मदिन के रिवाजों ने उनके बच्चों के साथ रिश्ते को कैसे मजबूत बनाया।

परवरिश की कोई एक पक्की किताब नहीं होती। ज्यादातर मां-बाप अपने अनुभव, अपने परिवार और आसपास के लोगों को देखकर ही सीखते चलते हैं। और कई बार सबसे काम की सलाह किसी पैरेंटिंग गाइड से नहीं, बल्कि किसी दूसरी संस्कृति से मिल जाती है। यूरोप में पली-बढ़ीं केन्सिया कला के साथ ठीक ऐसा ही हुआ। एक भारतीय से शादी के बाद, मां बनने पर वह भारत आ गईं और यहां की रोजमर्रा की जिंदगी में रच-बस गईं।

केन्सिया कहती हैं कि उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि भारतीय परंपराएं उनके परिवार की दिनचर्या का इतना अहम हिस्सा बन जाएंगी। लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने भारतीय मांओं के कुछ तरीके अपनाए, जिन्होंने उनके और बच्चों के बीच का रिश्ता और गहरा कर दिया। इंस्टाग्राम पर बांटे गए उनके ये अनुभव अब दुनियाभर के मां-बाप के बीच चर्चा का विषय बन गए हैं। उनकी कहानी एक सीधी सी बात याद दिलाती है, कि अच्छी परवरिश किसी एक देश या संस्कृति की बपौती नहीं होती।

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भारतीय रिवाजों ने बदल दिया नजरिया

केन्सिया बताती हैं कि जब वह पहली बार भारत आईं तो यहां की कई पैरेंटिंग आदतें उन्हें नई और अलग लगीं। पर वक्त के साथ उन्हें समझ आया कि इन छोटी-छोटी परंपराओं के पीछे गहरी भावनाएं और मजबूत पारिवारिक जुड़ाव छिपा है। उनका मानना है कि बच्चों की परवरिश में यह मायने नहीं रखता कि कोई तरीका किस देश का है, असली बात यह है कि वह आपके परिवार के लिए कितना कारगर है।

1. सह-नींद से गहरा हुआ भावनात्मक रिश्ता

यूरोप में आमतौर पर बच्चे कुछ साल के होते ही अलग कमरे में सोने लगते हैं। केन्सिया भी इसी सोच के साथ बड़ी हुई थीं, लेकिन मां बनने के बाद उनकी राय बदल गई। वह बताती हैं कि बच्चे के साथ एक ही बिस्तर पर सोने से शुरुआती दिनों में स्तनपान कराना आसान रहा और रात में बच्चे की जरूरतें समझना भी सरल हो गया। सबसे बड़ी बात यह रही कि इससे मां और बच्चे के बीच का भावनात्मक जुड़ाव और गहरा हो गया। हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि सह-नींद अपनाते वक्त सुरक्षा का खास ध्यान रखना जरूरी है, ताकि बच्चे के सोने का माहौल पूरी तरह सुरक्षित रहे।

2. तेल मालिश, बच्चे की देखभाल और परिवार का जुड़ाव

भारतीय घरों में नवजात की तेल मालिश एक पुरानी परंपरा है, और केन्सिया को यह रिवाज शुरू से ही भा गया। उनका कहना है कि तेल मालिश सिर्फ बच्चे की देखभाल का जरिया नहीं, बल्कि पूरे परिवार को जोड़ने वाला अनुभव है। इसमें दादी-नानी का शामिल होना नई मां के लिए बड़ा भावनात्मक सहारा बन जाता है। केन्सिया कहती हैं कि बच्चे के साथ बिताए ये छोटे-छोटे पल आगे चलकर खूबसूरत यादों में बदल जाते हैं। आज जब संयुक्त परिवार लगातार कम हो रहे हैं, ऐसे में यह परंपरा घरवालों को एक-दूसरे के करीब लाने का काम करती है।

3. नाम में बसी पहचान और जड़ें

भारतीय परिवारों में बच्चे का नाम चुनना अपने आप में एक खास प्रक्रिया है। कई परिवार नाम तय करते वक्त उसके अर्थ, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों को ध्यान में रखते हैं। केन्सिया को यह बात बेहद पसंद आई। उन्होंने अपने बच्चों के लिए भारतीय नाम चुने, क्योंकि उन्हें लगा कि नाम सिर्फ पहचान भर नहीं होते, वे अपने साथ इतिहास, परंपरा और परिवार की कहानी भी लेकर चलते हैं। उनके मुताबिक नाम में छिपे ये अर्थ बच्चों को उनकी जड़ों से जोड़े रखते हैं।

4. जन्मदिन, बच्चे का भी और मां का भी

केन्सिया को भारतीय मांओं की एक और बात ने प्रभावित किया। उन्होंने गौर किया कि कई मांएं अपने बच्चों के जन्मदिन पर साड़ी या पारंपरिक कपड़े पहनती हैं। वह कहती हैं कि इससे यह एहसास होता है कि बच्चे का जन्मदिन सिर्फ उसके लिए नहीं, बल्कि मां के लिए भी उतना ही खास दिन है। अब वह भी अपने बच्चों के जन्मदिन पर साड़ी पहनना पसंद करती हैं। उनका मानना है कि ऐसे छोटे-छोटे रिवाज परिवार की खुशियों को और यादगार बना देते हैं।

सीखने की खुली सोच ही असली परवरिश है

केन्सिया की कहानी भारतीय और यूरोपीय परवरिश के बीच मुकाबला नहीं कराती। यह बस इतना बताती है कि हर संस्कृति में कुछ ऐसी बातें होती हैं, जिन्हें अपनाकर बच्चों की परवरिश को और बेहतर बनाया जा सकता है। एक तेल मालिश, एक अर्थपूर्ण नाम, बच्चे के साथ बिताई गई रातें या किसी खास मौके पर पारंपरिक कपड़े पहनना, ये सब भले छोटी बातें लगें, पर यही पल बच्चों की सबसे प्यारी यादों का हिस्सा बन जाते हैं। केन्सिया मानती हैं कि भारत से उधार ली गई ये परंपराएं अब उनके अपने परिवार की पहचान बन चुकी हैं।

सवाल-जवाब

केन्सिया कला कौन हैं?
वह यूरोप में पली-बढ़ीं एक मां हैं, जिनकी शादी एक भारतीय से हुई और जो मां बनने के बाद भारत आ गईं।
उन्होंने भारतीय परवरिश के कौन-कौन से तरीके अपनाए?
उन्होंने सह-नींद, नवजात की तेल मालिश, बच्चों के अर्थपूर्ण भारतीय नाम और जन्मदिन पर साड़ी पहनने जैसे चार तरीके अपनाए।
सह-नींद से उन्हें क्या फायदा हुआ?
इससे शुरुआती दिनों में स्तनपान और रात में बच्चे की जरूरतें समझना आसान हुआ और मां-बच्चे का भावनात्मक जुड़ाव गहरा हुआ।
क्या सह-नींद में कोई सावधानी जरूरी है?
हां, विशेषज्ञ कहते हैं कि सह-नींद अपनाते वक्त सुरक्षा का खास ध्यान रखना चाहिए ताकि बच्चे का सोने का माहौल सुरक्षित रहे।
उन्होंने अपने बच्चों के लिए भारतीय नाम क्यों चुने?
उन्हें लगा कि नाम सिर्फ पहचान नहीं होते, बल्कि इतिहास, परंपरा और परिवार की कहानी साथ लेकर चलते हैं और बच्चों को उनकी जड़ों से जोड़ते हैं।
उनके अनुभव कहां से चर्चा में आए?
उन्होंने अपने ये अनुभव इंस्टाग्राम पर साझा किए, जिन्होंने दुनियाभर के मां-बाप का ध्यान खींचा।
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