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क्या अंकों की अंधी दौड़ में उबल रहा है 16 साल के किशोरों का बचपन?पेरेंटिंग
4 अग॰ 2026, 5:19 am (3 घंटे पहले)· 0

क्या अंकों की अंधी दौड़ में उबल रहा है 16 साल के किशोरों का बचपन?

भारतीय परिवारों में बच्चों पर 10वीं और 12वीं के नंबरों के लिए लगातार बढ़ता दबाव उन्हें मानसिक रूप से तनावग्रस्त कर रहा है। आइए जानें कि कैसे यह अंधी रेस बच्चों के बचपन को प्रभावित कर रही है और इससे निपटने के क्या उपाय हैं।

बेटा, 10वीं में अच्छे मार्क्स ले आओ, तुम्हारी लाइफ सेट है! या फिर 12वीं में 95 प्रतिशत अंक नहीं मिले तो अच्छे कॉलेज में दाखिला कैसे मिलेगा? ये ऐसे वाक्य हैं जो हर दूसरे भारतीय घर में सुबह की चाय के साथ दोहराए जाते हैं। लेकिन शायद ही कभी किसी ने यह गहराई से सोचा है कि जिंदगी को सेट करने की इस अंधी रेस में बच्चों की वर्तमान जिंदगी कितनी उलझती जा रही है। आज की तारीख में 16 साल की वह उम्र, जो कभी दोस्तों के साथ हंसने-खेलने, गप्पें लड़ाने और सुंदर सपने बुनने के लिए जानी जाती थी, वह अब मार्क्स, कट-ऑफ और रैंकिंग की भेंट चढ़ चुकी है। आज का 16 साल का मासूम किशोर धीरे-धीरे एक उबलते हुए प्रेशर कुकर की शक्ल अख्तियार करता जा रहा है।

बदलते पैमाने और 12 घंटे की कॉर्पोरेट शिफ्ट जैसी थकान

आजकल का दौर ऐसा आ चुका है कि बच्चों के रिपोर्ट कार्ड में 80 या 85 प्रतिशत अंक आने पर भी माता-पिता राहत की सांस लेने के बजाय मायूसी जताते हैं कि पांच प्रतिशत और आ जाते तो नब्बे प्रतिशत का आंकड़ा पार हो जाता। आज के इस दौर में 16 साल के बच्चे की दैनिक दिनचर्या किसी 12 घंटे की सख्त कॉर्पोरेट शिफ्ट से भी ज्यादा थकाऊ बन चुकी है। उनके पास न तो ढंग से खेलने का वक्त बचा है, न अपनी किसी पसंदीदा हॉबी को वक्त देने की फुर्सत है, और न ही परिवार के संग बैठकर सुकून से दो पल हंसने की मोहलत मिलती है। हमने उनसे उनका बचपन छीनकर उन्हें एक ऐसी अंतहीन रेस में झोंक दिया है जिसकी कोई फिनिश लाइन ही तय नहीं है।

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मनोवैज्ञानिकों की चेतावनी और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर

मनोवैज्ञानिकों का साफ तौर पर यह कहना है कि लगातार प्रदर्शन करते रहने का भारी दबाव बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। कई बार तो ऐसा होता है कि 15 से 16 साल की उम्र तक आते-आते बच्चा ऊपर से भले ही बिल्कुल शांत और सामान्य दिखाई दे, लेकिन अंदर ही अंदर वह किसी प्रेशर कुकर की तरह तनाव की भाप से भर चुका होता है। अगर इस छुपे हुए दबाव को समय रहते नहीं समझा गया और उचित कदम नहीं उठाए गए, तो इसका गंभीर असर पढ़ाई के अलावा उसके आत्मविश्वास, आपसी रिश्तों और संपूर्ण मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स का कहना है कि बच्चों और किशोरों में लगातार रहने वाला तनाव उनके मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार के स्वास्थ्य को कमजोर कर सकता है। इसके साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन भी किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को परिवार और समाज की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी करार देता है।

तनाव में होने पर बच्चे देते हैं ये अहम संकेत

माता-पिता को यह समझना बेहद जरूरी है कि कुछ खास संकेत यह साफ तौर पर बताते हैं कि बच्चा अंदर से भारी तनाव में गुजर रहा है। इनमें छोटी-छोटी बात पर अचानक गुस्सा होना या चिड़चिड़ापन दिखाना, नींद पूरी न होना या फिर सामान्य से बहुत ज्यादा सोना शामिल है। इसके अलावा दोस्तों और परिवार के लोगों से दूरी बना लेना, बार-बार सिरदर्द या पेट दर्द की शिकायत करना और जो चीजें पहले बहुत पसंद थीं उनमें भी अब रुचि पूरी तरह खत्म हो जाना तनाव के बड़े लक्षण हैं। यदि ये सारे संकेत लंबे समय तक लगातार बने रहें, तो इन्हें कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

क्या सिर्फ परीक्षा के अंक ही तय करते हैं सफलता?

विशेषज्ञों का मानना है कि अच्छे अंक अपनी जगह जरूरी हो सकते हैं, लेकिन वे कभी भी किसी बच्चे की पूरी क्षमता और प्रतिभा का पैमाना नहीं बन सकते। हर एक बच्चे की सीखने की गति, उसकी अपनी रुचि और कला बिल्कुल अलग होती है। जहां कुछ बच्चे पढ़ाई लिखाई में स्वाभाविक रूप से बेहतर प्रदर्शन करते हैं, वहीं कुछ अन्य बच्चे खेलकूद, संगीत, कला या तकनीक के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाते हैं। यूनिसेफ भी बच्चों के सर्वांगीण विकास पर जोर देता है। संस्था का साफ मानना है कि बच्चों को एक ऐसा स्वस्थ माहौल मिलना चाहिए जहां वे पढ़ाई के साथ खुलकर खेल सकें, अपनी बात बिना डरे कह सकें और भावनात्मक तौर पर पूरी तरह सुरक्षित महसूस कर सकें।

तनाव से उबारने के लिए माता-पिता अपनाएं ये जरूरी कदम

बच्चों को इस मानसिक दबाव से बचाने के लिए माता-पिता को अपनी सोच में कुछ बदलाव लाने होंगे। सबसे पहले मार्क्स की बजाय सीखने पर जोर देना होगा और बच्चे को समझाना होगा कि परीक्षाएं जिंदगी का केवल एक छोटा सा हिस्सा हैं, पूरी जिंदगी नहीं। 90 प्रतिशत अंक न आना किसी भी सूरत में जिंदगी का अंत नहीं होता है। इसके अलावा दूसरे बच्चों से तुलना करना पूरी तरह बंद करना होगा क्योंकि हर बच्चा अपने आप में अनूठा होता है। यदि कोई बच्चा गणित में अच्छा है, तो यह पूरी संभावना है कि आपका अपना बच्चा कला, खेल या संगीत के क्षेत्र में कोई जीनियस हो। अपने बच्चे के साथ बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रखें और उसके सच्चे दोस्त बनें। उससे स्कूल से लौटने पर यह पूछने के बजाय कि कोचिंग में कितने नंबर आए, यह पूछें कि आज तुम्हारा दिन कैसा बीता। इसके अलावा बच्चे को दिन में कम से कम एक से दो घंटे बिना किसी किताब के अपनी पसंद का कोई भी रचनात्मक काम करने की पूरी आजादी दें।

संतुलन ही बनाता है बेहतर और खुशहाल इंसान

हर माता-पिता की यह हार्दिक इच्छा होती है कि उनका बच्चा जीवन में खूब सफलता हासिल करे, लेकिन सच्ची सफलता की असली शुरुआत हमेशा एक अच्छे मानसिक स्वास्थ्य से ही होती है। यदि बच्चा हर पल किसी न किसी दबाव के साए में जीता रहेगा, तो उसकी कुछ नया सीखने की क्षमता और उसका आत्मविश्वास दोनों ही भारी रूप से प्रभावित हो जाएंगे। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि बच्चों को सिर्फ मार्क्स छापने वाली मशीन न बनाया जाए, बल्कि उन्हें खुलकर खेलने, हंसने, गलतियां करने और उनसे सीखने का पूरा अवसर दिया जाए। यही सही संतुलन उन्हें केवल एक बेहतर छात्र ही नहीं बल्कि एक खुशहाल और आत्मविश्वासी इंसान भी बनाएगा।

सवाल-जवाब

16 साल के बच्चों पर किस प्रकार का मानसिक दबाव देखा जा रहा है?
बच्चों पर अच्छे अंक लाने, कट-ऑफ पार करने और रैंक हासिल करने का भारी दबाव रहता है, जिससे वे मानसिक रूप से तनावग्रस्त हो जाते हैं।
बच्चा तनाव में है, यह किन संकेतों से पता चलता है?
छोटी-छोटी बात पर चिड़चिड़ापन, नींद पूरी न होना, दोस्तों से दूरी बनाना और सिरदर्द या पेट दर्द की शिकायत रहना तनाव के मुख्य संकेत हैं।
अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स का तनाव को लेकर क्या कहना है?
संस्था का मानना है कि बच्चों और किशोरों में लगातार रहने वाला तनाव उनके मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
माता-पिता बच्चों का तनाव कम करने के लिए क्या कर सकते हैं?
माता-पिता को अंकों के बजाय सीखने पर जोर देना चाहिए, तुलना करना बंद करना चाहिए और बच्चों से दोस्ताना बातचीत का माहौल बनाना चाहिए।
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