जब बच्चे हर समय चिप्स, चॉकलेट, बर्गर या डिब्बाबंद स्नैक्स की मांग करते हैं, तो अक्सर माता-पिता का पहला रिएक्शन डांटना, गुस्सा करना या पूरी तरह पाबंदी लगाना होता है। लेकिन बार-बार की रोक-टोक और सख्त रवैये से बच्चों की जिद कम होने के बजाय और बढ़ सकती है। हाल ही में एक पिता ने अपनी बेटी की अस्वास्थ्यकर खाने की आदतों में सुधार लाने के लिए एक बेहद रचनात्मक और अनोखा रास्ता निकाला। उन्होंने एक मनोरंजक अल्ट्रासाउंड सिमुलेशन के माध्यम से अपनी बेटी को यह समझाया कि जंक फूड और पौष्टिक भोजन पेट के अंदर जाकर कैसा असर दिखाते हैं। इस तरह के मजेदार और दृष्टिगत प्रयोग बच्चों को बिना डराए या डांटे अपने खान-पान के प्रति जागरूक बनाने का नया नजरिया पेश करते हैं।
दृश्य माध्यमों और गेम से समझ विकसित करने का तरीका
बच्चों का मन बहुत उत्सुक और कल्पनाशील होता है। वे उपदेश या डांट-फटकार की तुलना में खेल-खेल में सिखाई गई बातों को ज्यादा आसानी से अपनाते हैं। जब किसी बच्चे के सामने पैकेज्ड स्नैक्स की रोक-टोक की जाती है, तो कई बार वह इसे अपनी आजादी पर पाबंदी मान लेता है। इसके विपरीत, यदि खान-पान के असर को किसी मजेदार गतिविधि के जरिए दिखाया जाए, तो बच्चा खुद समझने लगता है। पिता द्वारा किए गए इस अल्ट्रासाउंड गेम वाले प्रयोग का मकसद बच्चे को किसी बीमारी का डर दिखाना नहीं था, बल्कि शरीर के अंदर भोजन की भूमिका को सरल और विजुअल तरीके से समझाना था। इस तरह के सकारात्मक प्रयासों की चर्चा इंटरनेट पर भी हो रही है, जहां सोशल मीडिया यूजर केमी रिएक्ट्स द्वारा साझा किए गए कंटेंट में पेरेंटिंग के नए तरीकों पर विचार किया गया है।
बॉडी डिटेक्टिव खेल: डराने के बजाय जिज्ञासा जगाएं
पेरेंटिंग के दौरान अक्सर कई लोग बच्चों को जंक फूड से दूर रखने के लिए पेट में कीड़े होने या अस्पताल जाने जैसी डरावनी बातें कह देते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी बातें बच्चे के बाल मन में भोजन को लेकर अनावश्यक खौफ पैदा करती हैं। इसकी जगह माता-पिता अपने बच्चों के साथ बॉडी डिटेक्टिव जैसा खेल खेल सकते हैं। इस गतिविधि में खिलौनों, रंगीन ड्राइंग्स या मोबाइल और टैबलेट पर मौजूद उम्र के अनुकूल शैक्षणिक वीडियो की मदद ली जा सकती है। बच्चे को यह समझाया जा सकता है कि ताजे फल, हरी सब्जियां, दालें और घर का बना खाना शरीर को दिनभर दौड़ने-भागने और खेलने की ताकत देते हैं। जब बच्चे को यह समझ आता है कि रोजाना बहुत ज्यादा पैकेज्ड खाना खाने से शरीर सुस्त हो जाता है, तो वह खुद ही सही और गलत भोजन के बीच अंतर करने लगता है।
सख्त बैन के बजाय सीमित विकल्प और निर्णय लेने की आजादी
पेरेंटिंग एक्सपर्ट्स का मानना है कि पसंदीदा चीजों पर पूरी तरह रोक लगा देना अक्सर उल्टा असर दिखाता है। जब किसी चीज को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया जाता है, तो बच्चे की इच्छा उस चीज के प्रति और ज्यादा तीव्र हो जाती है। इसलिए चॉकलेट, पिज्जा या चिप्स को हमेशा के लिए बंद करने के बजाय उनकी मात्रा और खाने के अंतराल पर ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा, बच्चों को भोजन के चयन में शामिल करना बेहद फायदेमंद होता है। उदाहरण के लिए, बच्चे से यह पूछना कि आज शाम को वह फलों की प्लेट खाना पसंद करेगा या घर की बनी पौष्टिक चाट। जब बच्चे को दो सेहतमंद विकल्पों में से किसी एक को चुनने का मौका मिलता है, तो उसे महसूस होता है कि निर्णय उसका अपना है और वह खुशी-खुशी उसे स्वीकार कर लेता है।
माता-पिता का अपना आचरण और पारिवारिक खान-पान की आदतें
बच्चे केवल माता-पिता की बातें सुनकर नहीं, बल्कि उनके व्यवहार को देखकर सीखते हैं। यदि घर के बड़े खुद रोजाना शाम को जंक फूड और पैकेज्ड स्नैक्स खाएंगे और बच्चे को हरी सब्जियां खाने की सलाह देंगे, तो बच्चा उस बात को गंभीरता से नहीं लेगा। बच्चों में स्थायी और सकारात्मक आदतें डालने के लिए पूरे परिवार को एक साथ स्वस्थ जीवनशैली अपनानी होती है। जब परिवार के सभी सदस्य साथ बैठकर मखाना, भुना चना, फल और घर के बने स्नैक्स खाते हैं, तो बच्चे के लिए पौष्टिक भोजन ही सामान्य और आनंददायक बन जाता है। बच्चों की खान-पान की आदतों में बदलाव एक धीमी प्रक्रिया है, जिसके लिए डर के बजाय धैर्य, सही विकल्प और खुद बेहतरीन उदाहरण पेश करने की आवश्यकता होती है।



















