देश की सबसे बड़ी अदालत में महाराष्ट्र के प्रमुख राजनीतिक विवाद यानी शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न धनुष-बाण को लेकर एक बार फिर जोरदार कानूनी संग्राम छिड़ गया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने उद्धव ठाकरे समूह का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने निर्वाचन आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली और उसके अधिकार क्षेत्र की सीमाओं पर कड़े सवाल दागे। शीर्ष अदालत के कक्ष में सुनवाई के दौरान सिब्बल ने लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। उन्होंने दलबदल की बदलती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा, "दलबदल एक संवैधानिक पाप है लेकिन अब दुर्भाग्य से यह सम्मान का प्रतीक बन गया है." इसके साथ ही उन्होंने आगाह किया कि यदि देश की संवैधानिक संस्थाएं अपनी निष्पक्षता खो देंगी तो पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था में गहरा असंतोष और अराजकता पैदा हो जाएगी।
2018 के पार्टी संविधान को खारिज करने पर चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र पर सवाल
कानूनी कार्यवाही के दौरान वरिष्ठ वकील ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष घटनाक्रम की विस्तृत क्रोनोलॉजी पेश की। सिब्बल ने विशेष रूप से 26 जुलाई 2022 को हुई बैठक का ब्योरा अदालत के सामने रखा, जिसकी अध्यक्षता एकनाथ शिंदे ने की थी। उन्होंने बताया कि किस प्रकार उस बैठक की कार्यवाही के मिनट्स को आधार बनाकर शिवसेना के वर्ष 2018 के स्वीकृत पार्टी संविधान को पूरी तरह से निरस्त कर दिया गया। सिब्बल ने अदालत से सवाल किया कि जब उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे दोनों ही धड़े इस बात पर पूरी तरह सहमत थे कि वे 2018 के पार्टी संविधान के तहत ही संगठनात्मक कार्य कर रहे थे, तो चुनाव आयोग ने किस वैधानिक शक्ति का प्रयोग करते हुए उस संविधान को खारिज कर दिया?
उद्धव ठाकरे पक्ष के वकील ने 17 फरवरी 2023 को चुनाव आयोग द्वारा सुनाए गए फैसले को कानूनी दृष्टिकोण से अनुचित और दोषपूर्ण ठहराया। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व फैसलों की नजीर देते हुए स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के पास किसी दल के आंतरिक संविधान को रद्द करने या बदलने की असीमित शक्तियां नहीं हैं। सिब्बल ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के कुल 160 सदस्यों में से स्पष्ट बहुमत उद्धव ठाकरे के साथ था, जबकि विरोधी पक्ष को एक भी सदस्य का समर्थन प्राप्त नहीं था। इसके बावजूद निर्वाचन आयोग ने केवल विधायिका दल (संसद और विधानसभा) में हुए विभाजन को पूरी राजनीतिक पार्टी का विभाजन मान लिया, जो स्थापित कानूनी सिद्धांतों का सरासर उल्लंघन है। अपनी इस दलील को मजबूती देने के लिए सिब्बल ने केरल कांग्रेस तथा समाजवादी पार्टी से जुड़े पुराने ऐतिहासिक अदालती मामलों का भी उल्लेख किया।
विधायिका दल के बहुमत और असली राजनीतिक पार्टी के अंतर पर कानूनी बहस
अपनी बहस को आगे बढ़ाते हुए कपिल सिब्बल ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act) की धारा 29A और सिंबल ऑर्डर के प्रावधानों का विस्तार से विश्लेषण किया। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि भारतीय चुनावी कानून में केवल विधायकों या सांसदों की संख्या के आधार पर असली पार्टी तय करने की कोई वैधानिक अवधारणा मौजूद नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि दलबदल विरोधी कानून यानी संविधान की 10वीं अनुसूची के पैरा 3 और पैरा 4 का गलत अर्थ निकालकर बागी और असंतुष्ट धड़े को सुरक्षा प्रदान करने का प्रयास किया जा रहा है। सिब्बल ने कहा कि विधायी बहुमत को संगठन के ऊपर तरजीह देना लोकतांत्रिक ढांचे के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
अयोग्यता याचिकाओं से पहले सिंबल आवंटन पर विसंगति और 'मझधार' की स्थिति
शीर्ष अदालत में सिब्बल ने अपनी पुरानी दलीलों की याद दिलाते हुए कहा कि अयोग्यता संबंधी याचिकाओं का निपटारा होने से पहले यदि पार्टी के नाम और निशान पर निर्णय लिया जाता है, तो उससे एक गंभीर विधिक संकट उत्पन्न होना स्वाभाविक है। उन्होंने अदालत के समक्ष अपनी स्थिति बयां करते हुए कहा कि पूर्व में संविधान पीठ द्वारा उनकी इस मौलिक दलील को स्वीकार न किए जाने के कारण ही आज उनका पक्ष कानूनी रूप से अधर में लटका हुआ है। सिब्बल के अनुसार, विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अयोग्यता पर अंतिम फैसला आने से पूर्व चुनाव चिह्न का आवंटन कर देने से गैर-कानूनी तरीके से सरकार का गठन हुआ और उनकी मूल पार्टी का चुनाव चिह्न भी उनसे छीन लिया गया।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और अगली सुनवाई की तिथि
सिब्बल द्वारा उठाए गए तीखे कानूनी प्रश्नों पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के साथ पीठ में शामिल जस्टिस बागची ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। जस्टिस बागची ने स्वीकार किया कि पार्टी का चुनाव निशान और सदस्यों की अयोग्यता से जुड़े तथ्य और मुद्दे आपस में गहरे जुड़े हुए हैं। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) द्वारा की जाने वाली जांच एक पृथक कानूनी प्रक्रिया के तहत आती है। ट्रिब्यूनल के रूप में काम करते हुए अध्यक्ष को यह जांचना होता है कि क्या किसी विधायक या सांसद ने स्वेच्छा से दल की सदस्यता का परित्याग किया है अथवा नहीं।
इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी साफ किया कि स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ना और पार्टी से पूरी तरह संबंध समाप्त कर लेना दो अलग बातें हो सकती हैं, यद्यपि अदालत ने यह भी जोड़ा कि यह उसकी कोई अंतिम वैधानिक राय नहीं है। दोनों पक्षों की विस्तृत और गहन दलीलें सुनने के उपरांत मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने प्रकरण की अगली सुनवाई आगामी सप्ताह मंगलवार या बुधवार के लिए मुकर्रर कर दी है। अदालत के सख्त रुख और याचिकाकर्ता के आक्रामक रुख से स्पष्ट है कि शिवसेना के इस ऐतिहासिक विवाद में आने वाले दिनों में और भी महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ देखने को मिलेंगे।



















