कांग्रेस नेता राहुल गांधी से जुड़े आपराधिक मानहानि के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट में त्वरित सुनवाई की गुहार लगाई गई। इस पर सुनवाई करते हुए देश के मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्याय व्यवस्था के समक्ष सभी याचिकाकर्ता और पक्षकार पूरी तरह समान हैं। अदालत ने शिकायतकर्ता के पक्ष से कहा कि यदि वे इस मामले को प्राथमिकता के आधार पर सुनना चाहते हैं, तो उन्हें बिना किसी जल्दबाजी के अदालत की निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा और जल्द सुनवाई के लिए एक औपचारिक आवेदन दाखिल करना होगा।
पीठ की सुनवाई और वकीलों की दलीलें
इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ कर रही थी, जिसमें सीजेआई सूर्यकांत के अलावा जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे। सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने पीठ के समक्ष अपना पक्ष रखा। गौरव भाटिया ने अदालत से आग्रह किया कि इस मामले को जल्द से जल्द सुनवाई की सूची में शामिल किया जाए। उन्होंने तर्क दिया कि लखनऊ की अदालत द्वारा जारी समन पर संज्ञान लिए जाने के फैसले के खिलाफ राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, लेकिन पिछले पांच महीनों से यह अपील सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हो पाई है।
अदालत के भीतर अपनी दलील को आगे बढ़ाते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि कानून के समक्ष कोई भी व्यक्ति विशेष या VVIP नहीं होता है। उन्होंने टिप्पणी की कि किसी मामले का पांच महीने तक सूचीबद्ध न होना और सुनवाई न हो पाना न्यायिक प्रक्रिया के लिहाज से उचित संदेश नहीं देता है। गौरव भाटिया की इन दलीलों को सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत ने बेहद संतुलित और सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के लिए हर नागरिक और हर पक्ष समान दर्जा रखता है। सीजेआई ने वकील को सलाह दी कि वे जल्द सुनवाई के लिए विधिवत अर्जी दाखिल करें, जिसके बाद अदालत उस पर विचार करेगी और मामले को सुनवाई के लिए प्रस्तुत करेगी।
मानहानि केस की पृष्ठभूमि और विवादित बयान
राहुल गांधी के खिलाफ यह आपराधिक मानहानि का मामला वर्ष 2022 में दिए गए उनके एक बयान से उपजा है। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर भारत और चीन के बीच जारी तनाव के मुद्दे पर केंद्र सरकार पर हमला बोलते हुए राहुल गांधी ने एक जनसभा में टिप्पणी की थी। 16 दिसंबर 2022 को अपनी बात रखते हुए राहुल गांधी ने दावा किया था कि 9 दिसंबर 2022 को अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती इलाके में चीनी सैनिकों ने भारतीय सेना के जवानों की पिटाई की है। इस बयान को लेकर देशभर में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर काफी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली थीं।
इस बयान के सार्वजनिक होने के बाद बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइज़ेशन के पूर्व डायरेक्टर उदय शंकर श्रीवास्तव ने इसे सेना का अपमान माना। उदय शंकर श्रीवास्तव, जो भारतीय सेना में कर्नल के समकक्ष रैंक पर सेवा दे चुके हैं, के लिए यह टिप्पणी अत्यंत पीड़ादायक थी। उन्होंने अपने अधिवक्ता विवेक तिवारी के माध्यम से लखनऊ की अदालत में राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि की शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि सीमा पर तैनात देश के वीर सैनिकों के संबंध में इस तरह की बयानबाजी से भारतीय सेना की छवि धूमिल हुई है और इससे रक्षा बलों का मनोबल गिरा है।
निचली अदालत और हाई कोर्ट के कानूनी फैसले
शिकायत पर सुनवाई करते हुए लखनऊ के एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट आलोक वर्मा ने मामले को गंभीरता से लिया। मजिस्ट्रेट आलोक वर्मा ने राहुल गांधी को मानहानि के इस मामले में 24 मार्च को अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश जारी किया। इस समन आदेश को चुनौती देने के लिए राहुल गांधी ने तुरंत इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया और समन को रद्द करने की याचिका दायर की। हालांकि, इलाहाबाद हाई कोर्ट से उन्हें कोई राहत नहीं मिली और अदालत ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 199(1) की व्यापक व्याख्या की। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि "पीड़ित व्यक्ति" की परिभाषा केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं है जिस पर सीधे टिप्पणी की गई हो। यदि किसी अपराध या बयान से किसी अन्य व्यक्ति के सम्मान, स्वाभिमान या भावनाओं को गहरा आघात पहुंचता है, तो वह भी कानून की नजर में पीड़ित माना जाएगा। चूंकि शिकायतकर्ता उदय शंकर श्रीवास्तव ने एक पूर्व सैन्य अधिकारी के रूप में भारतीय सेना के प्रति अपना गहरा सम्मान व्यक्त किया था और वे इस बयान से व्यक्तिगत रूप से आहत हुए थे, इसलिए कोर्ट ने माना कि वे धारा 199 के तहत शिकायत दर्ज कराने का पूरा अधिकार रखते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की पूर्व सुनवाई और वर्तमान स्थिति
इलाहाबाद हाई कोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इससे पहले जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया था, तो जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की दो जजों की पीठ ने इस पर सुनवाई की थी। उस समय पीठ ने निचली अदालत में चल रही आपराधिक मानहानि की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी थी। इसके साथ ही अदालत ने राहुल गांधी के वकील से कुछ बेहद तीखे सवाल भी पूछे थे।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने पूछा था कि देश की सुरक्षा और सेना से जुड़े इतने संवेदनशील मुद्दों को संसद के पटल पर उठाने के बजाय सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर इस तरह क्यों बयानबाजी की जा रही है। पीठ ने यह भी जानना चाहा था कि क्या राहुल गांधी के पास अपने इस दावे की पुष्टि के लिए कोई विश्वसनीय दस्तावेज या पुख्ता जानकारी मौजूद थी। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई अंतरिम रोक की वजह से निचली अदालत में मामला रुका हुआ है। बुधवार को शिकायतकर्ता पक्ष द्वारा मामले को तुरंत सूचीबद्ध करने की मांग पर सीजेआई सूर्यकांत ने साफ कर दिया कि नियमित प्रक्रिया के तहत आवेदन आने के बाद ही इस पर आगे की सुनवाई की तारीख तय की जाएगी।



















