भारतीय राजनीति में एक बार फिर तीखी बयानबाजी का दौर शुरू हो गया है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के आरोपों पर कड़ा पलटवार करते हुए देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल के इतिहास का पूरा ब्योरा जनता के सामने रख दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राहुल गांधी जिन आरोपों को भारतीय जनता पार्टी पर मढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, असल में वे सभी आरोप स्वयं कांग्रेस पार्टी के ऊपर पूरी तरह फिट बैठते हैं। रिजिजू ने कांग्रेस की तुलना पौराणिक काल के भस्मासुर से करते हुए कहा कि यह दल अपने सहयोगियों के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हुआ है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक संगठन के रूप में अपनी पहचान बनाई है, लेकिन यह सफलता किसी भी दल को तोड़कर हासिल नहीं की गई है।
कांग्रेस को पौराणिक पात्र भस्मासुर से क्यों जोड़ा गया
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस की राजनीतिक शैली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि इस पार्टी के पास दूसरों की नैतिकता पर बात करने का कोई अधिकार नहीं है। X पर साझा किए गए वीडियो में किरेन रिजिजू ने कहा, "कांग्रेस पार्टी वह 'भस्मासुर' है जो अपने संपर्क में आने वाले हर दल को जलाकर भस्म कर देती है।" उनका मानना है कि जो भी क्षेत्रीय पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन या चुनावी तालमेल में आती है, वह धीरे-धीरे अपनी जमीन खो देती है और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। कांग्रेस ने हमेशा अपने सहयोगी संगठनों की ताकत को सोखने और उन्हें कमजोर करने की नीति अपनाई है, जिससे आज की राजनीति में कई छोटे दल हाशिए पर चले गए हैं।
कांग्रेस की आपसी फूट से कैसे हुआ तृणमूल कांग्रेस और एनसीपी का जन्म
किरेन रिजिजू ने देश के दो बड़े क्षेत्रीय दलों का उदाहरण देते हुए कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि आज देश की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाली तृणमूल कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जैसी ताकतें किसी बाहरी विचारधारा से नहीं उपजी हैं। यह दोनों ही बड़े दल कांग्रेस के भीतर की भारी घुटन, आंतरिक लोकतंत्र की कमी और आपसी फूट के कारण अस्तित्व में आए। उन्होंने सवाल उठाया कि ममता बनर्जी और शरद पवार जैसे कद्दावर नेताओं को आखिर क्यों कांग्रेस का साथ छोड़कर अपनी नई राजनीतिक राह चुननी पड़ी। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि कांग्रेस ने कभी भी अपने भीतर उठने वाली मजबूत आवाजों और क्षेत्रीय नेतृत्व को पनपने नहीं दिया और हमेशा उन्हें दबाने का काम किया।
कर्पूरी ठाकुर के सियासी प्रभाव को दबाने की सुनियोजित कोशिशें
बिहार के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में जननायक कर्पूरी ठाकुर का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। पिछड़ों, वंचितों और गरीबों के हक की लड़ाई लड़ने वाले इस महान समाजवादी नेता के बढ़ते प्रभाव से तत्कालीन कांग्रेस आलाकमान हमेशा असहज महसूस करता था। रिजिजू ने आरोप लगाया कि कर्पूरी ठाकुर के बढ़ते राजनीतिक कद को छोटा करने के लिए कांग्रेस ने बिहार की राजनीति में लगातार गुटबाजी को बढ़ावा दिया। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने पर्दे के पीछे से ऐसी गोटियां बिछाईं जिससे गैर-कांग्रेसी ताकतें कभी एकजुट न हो सकें। इस पूरी साजिश के पीछे कांग्रेस का एकमात्र उद्देश्य यह था कि जमीनी स्तर का कोई भी लोकप्रिय समाजवादी नेता उनके एकछत्र साम्राज्य के लिए चुनौती न बन सके।
साल 1977 में कैसे गिराई गई देश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार
आपातकाल के काले दौर के बाद, साल 1977 में देश की जनता ने तानाशाही प्रवृत्तियों के खिलाफ एकजुट होकर एक ऐतिहासिक और निर्णायक जनादेश दिया था। इसके परिणामस्वरूप केंद्र में पहली बार जनता पार्टी के नेतृत्व में एक गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। हालांकि, कांग्रेस के नेतृत्व को यह लोकतांत्रिक बदलाव बिल्कुल भी पसंद नहीं आया और उन्होंने सत्ता को दोबारा हथियाने के लिए जोड़-तोड़ की अपनी पुरानी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया। इस रणनीति के तहत चौधरी चरण सिंह को देश का प्रधानमंत्री बनाने का लालच दिया गया और उनकी सरकार को बाहर से समर्थन देने का नाटक किया गया। जैसे ही सरकार का गठन हुआ, कुछ ही महीनों के भीतर कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस ले लिया। इसके चलते चौधरी चरण सिंह की सरकार बिना संसद का सामना किए ही गिर गई और देश को जबरन एक असमय मध्यावधि चुनाव के दलदल में धकेल दिया गया।
शरद पवार को कमजोर करने के लिए सुरेश कलमाड़ी का इस्तेमाल
महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार हमेशा से एक स्वतंत्र और बेहद मजबूत जनाधार वाले नेता रहे हैं। किरेन रिजिजू के अनुसार, दिल्ली के कांग्रेस हाईकमान को शरद पवार का यह बढ़ता प्रभाव कभी रास नहीं आया। उनके इस दबदबे को नियंत्रित और कमजोर करने के लिए दिल्ली दरबार ने लगातार उनके ही बेहद करीबी सहयोगियों को उनके खिलाफ खड़ा करने की चाल चली। इसी रणनीति के तहत सुरेश कलमाड़ी को पुणे और महाराष्ट्र की राजनीति में तेजी से आगे बढ़ाया गया ताकि शरद पवार के राजनीतिक प्रभाव को काटा जा सके। कांग्रेस की हमेशा से यह स्थापित शैली रही है कि राज्यों के भीतर ताकतवर नेताओं के समानांतर एक दूसरा सत्ता केंद्र खड़ा कर दिया जाए ताकि कोई भी नेता केंद्रीय नेतृत्व को चुनौती न दे सके। इसी आपसी अविश्वास और उपेक्षा के कारण अंततः शरद पवार को कांग्रेस से अपनी राहें पूरी तरह अलग करनी पड़ीं।
साल 1980 में हरियाणा में हुआ दलबदल का सबसे बड़ा खेल
साल 1980 का दौर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में दलबदल की राजनीति के एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है। केंद्र की सत्ता में इंदिरा गांधी की दोबारा वापसी होते ही राज्यों की गैर-कांग्रेसी सरकारों पर केंद्रीय एजेंसियों और राजनीतिक तौर पर भारी दबाव बनाना शुरू कर दिया गया। उस समय हरियाणा में भजन लाल के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार सुचारू रूप से चल रही थी। लेकिन सत्ता हासिल करने की होड़ में कांग्रेस ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार कर दिया। कांग्रेस ने रातों-रात पूरी की पूरी राज्य सरकार का ही अपने दल में विलय करवा लिया। मुख्यमंत्री भजन लाल अपने दर्जनों विधायकों के साथ रातों-रात पाला बदलकर कांग्रेस में शामिल हो गए। यह घटना देश की संसदीय राजनीति में सिद्धांतों और शुचिता की हत्या का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आई।
स्मृति ईरानी ने कांग्रेस के इतिहास को लेकर राहुल गांधी को घेरा
इस पूरे मामले पर बीजेपी की वरिष्ठ नेता स्मृति ईरानी ने भी राहुल गांधी के बयानों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने बीजेपी पर कीचड़ उछालने के चक्कर में अपनी ही पार्टी के काले और दमनकारी इतिहास को देश के युवाओं के सामने फिर से उजागर कर दिया है। उन्होंने याद दिलाया कि साल 1980 में कांग्रेस की केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 356 का बेरहमी से इस्तेमाल करते हुए देश की नौ लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई राज्य सरकारों को एक झटके में बर्खास्त कर दिया था। इतना ही नहीं, साल 2005 में यूपीए शासनकाल के दौरान भी बिहार विधानसभा को आनन-फानन में अलोकतांत्रिक तरीके से भंग कर दिया गया था, जिसे बाद में देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह असंवैधानिक और अवैध करार दिया था। स्मृति ईरानी ने यह गंभीर सवाल भी उठाया कि संवैधानिक संस्थाओं और चुनाव आयोग की गरिमा को लगातार ठेस पहुंचाकर राहुल गांधी देश में किसका एजेंडा पूरा करना चाहते हैं।
क्षेत्रीय दलों को कुचलने के लिए अनुच्छेद 356 का मनमाना इस्तेमाल
कांग्रेस का संपूर्ण इतिहास राज्यों की चुनी हुई सरकारों को मनमाने ढंग से और दुर्भावनापूर्ण तरीके से बर्खास्त करने के उदाहरणों से भरा पड़ा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356, जिसके तहत राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है, का इतिहास में सबसे ज्यादा दुरुपयोग करने का रिकॉर्ड कांग्रेस पार्टी के नाम दर्ज है। केरल में देश की पहली लोकतांत्रिक कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त करने से लेकर पंजाब, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में विभिन्न गैर-कांग्रेसी सरकारों को समय से पहले गिराने के लिए इस संवैधानिक प्रावधान का हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया। इन राज्यों में स्वतंत्र क्षेत्रीय आवाजों को दबाने के लिए राज्यपालों के प्रतिष्ठित पद का खुला राजनीतिक इस्तेमाल किया गया। रिजिजू ने अंत में कहा कि जिस राजनीतिक दल ने दशकों तक भारतीय लोकतंत्र का गला घोंटने का काम किया है, वह आज दूसरों को लोकतांत्रिक मूल्यों और मर्यादाओं का पाठ पढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जो बेहद हास्यास्पद है।



















