दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों के छह वर्ष बीत जाने के बाद सेशंस कोर्ट ने इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के अधिकारी अंकित शर्मा की बर्बर हत्या के मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन और उनके चार अन्य सहयोगियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। सेशंस कोर्ट के फैसले में उस वीभत्स घटना की एक-एक कड़ी दर्ज है, जिसने पूरे देश की चेतना को हिलाकर रख दिया था। अदालत के आदेश के मुताबिक एक पूरी योजना के तहत निहत्थे अंकित शर्मा को उनके घर के समीप भीड़ ने घेरा, बेदर्दी से पीटा और जब वह अचेत होकर गिर पड़े, तब धारदार हथियारों से उनकी जान ले ली गई। इसके बाद हत्यारों ने उनके शव को जानवरों की तरह घसीटा और नाले में फेंक दिया।
अंकित शर्मा हत्याकांड: सेशंस कोर्ट का फैसला और क्रूरता का ब्योरा
अतिरिक्त सेशंस न्यायाधीश प्रवीण सिंह द्वारा सुनाए गए इस फैसले में अंकित शर्मा के साथ हुई अमानवीय बर्बरता का विस्तार से उल्लेख किया गया है। जांच और गवाहियों से स्पष्ट हुआ कि हमलावर इस बात से पूरी तरह वाकिफ थे कि अंकित शर्मा आईबी में कार्यरत अधिकारी हैं। अंकित की किसी से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी, लेकिन इलाके में खौफ और दहशत का माहौल पैदा करने के लिए इस क्रूर वारदात को अंजाम दिया गया। हत्या किए जाने के बाद भी उनके शरीर पर चाकुओं से लगातार वार किए जाते रहे, जो क्रूरता की तमाम सीमाओं को पार कर देने वाला कृत्य था। ताहिर हुसैन और उनके साथियों द्वारा किया गया यह व्यवहार मानवीयता पर कलंक की तरह था। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि ताहिर हुसैन उस समय एक जनप्रतिनिधि और चुने हुए पार्षद थे, जिससे उनके द्वारा किया गया अपराध और भी अधिक गंभीर व अक्षम्य बन जाता है। हालांकि अदालत ने उम्रकैद का दंड दिया है, लेकिन इस दरिंदगी के सामने यह सजा भी कम नजर आती है।
जंतर-मंतर पर भड़की हिंसा और घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों का दर्द
दूसरी तरफ राजधानी में जंतर-मंतर पर हुई हिंसा में घायल हुए दिल्ली पुलिस के जवानों के परिजनों ने अपनी व्यथा देश के सामने रखी। एक विशेष प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से दिल्ली पुलिस के दो एसीपी, एक सब-इंस्पेक्टर तथा एक असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर के परिजनों ने बताया कि किस प्रकार बेकाबू भीड़ ने कर्तव्य पर तैनात पुलिसकर्मियों को चुन-चुनकर अपना निशाना बनाया। आंकड़ों के अनुसार 20 जुलाई से 25 जुलाई के मध्य हुई इस हिंसा के दौरान दिल्ली पुलिस के 250 से अधिक जवान व अधिकारी घायल हुए। इस घटनाक्रम के बीच कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने विवादित बयान देते हुए पुलिस पर हुए हमलों के लिए सीधे तौर पर बीजेपी को जिम्मेदार ठहराया। अभिजीत दीपके का दावा था कि छात्रों के प्रदर्शन को बदनाम करने की नीयत से बाहरी तत्वों को घुसाया गया था और उन्हीं लोगों ने सुरक्षाकर्मियों पर हमले किए।
इन आरोपों के बीच घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों का मानसिक तनाव चरम पर है। जिस बेटी के लिए उसके पिता एक नायक हों, वह अपने पिता को भीड़ द्वारा घिरकर पिटते देखे तो उस पर क्या बीतेगी। जिस बेटे को अपने पिता के चार वीरता पुरस्कारों पर गर्व हो, वह जब पिता का लहूलुहान सिर देखता है तो उसका टूट जाना स्वाभाविक है। संसद की सुरक्षा के दौरान हमला झेलने वाले और टूटे हुए हेलमेट के साथ बाल-बाल बचे जवानों की पत्नियों के सामने भी गहरा डर खड़ा हो गया है। आज ये परिवार अपने आत्मीयों से पुलिस की नौकरी छोड़ने की गुहार लगा रहे हैं। पुलिसकर्मियों के सामने दोहरा संकट है, एक तरफ सरकार की ओर से न्यूनतम बल प्रयोग और संयम का सख्त आदेश है, तो दूसरी तरफ घर वाले सवाल कर रहे हैं कि क्या वे केवल पिटने के लिए सेवा में गए थे। आलोचकों का कहना है कि यदि यह दावा किया जा रहा है कि हमलावर राजनीतिक रूप से प्रायोजित थे, तो उन सभी चेहरों की पहचान करके तुरंत गिरफ्तारी होनी चाहिए क्योंकि पूरी घटना कैमरों में कैद है।
संसद परिसर में साधु का वेष और राम मंदिर दान चोरी का विवाद
इधर संसद परिसर में अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मुद्दे को लेकर विपक्ष का एक प्रदर्शन विवादों में घिर गया। विपक्ष की ओर से इस मुद्दे पर ध्यान आकर्षित करने के उद्देश्य से एक राजनीतिक ड्रामा रचा गया, जिसमें पप्पू यादव साधु के रूप में नजर आए। उन्होंने भगवा चोला पहन रखा था, माथे पर त्रिपुंड लगा रखा था, एक हाथ में दानपात्र और दूसरे हाथ में रामलला की तस्वीर ले रखी थी। पप्पू यादव विपक्षी सांसदों से चंदा मांग रहे थे। इसी क्रम में जब राहुल गांधी दानपात्र में पैसे डालने आए, तो पप्पू यादव ने वे पैसे दानपात्र में गिरने से पहले ही अपनी जेब में रख लिए। इसके पश्चात पप्पू यादव सपा सांसद अवधेश प्रसाद के चरणों में गिर पड़े।
इस पूरे घटनाक्रम की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही सत्ता पक्ष ने पलटवार किया। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि भगवा वस्त्र पहनकर यह स्वांग जानबूझकर रचा गया ताकि सनातन धर्म और साधु-संतों की छवि को धूमिल किया जा सके। गिरिराज सिंह ने साफ किया कि अयोध्या मंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले में जिन लोगों को पकड़ा गया है, उनमें कोई साधु नहीं था, बल्कि वे ट्रस्ट के कर्मचारी थे। वहीं अखिल भारतीय संत समिति के महासचिव स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेता को साधु का रूप देना सनातन का अपमान है। उन्होंने इस पूरे कृत्य को राहुल गांधी की योजना का हिस्सा बताया और कहा कि दूसरों का उपहास उड़ाने की यह प्रवृत्ति इस बार भारी पड़ेगी। ऐसा प्रतीत होता है कि पप्पू यादव ने यह सब केवल सोशल मीडिया रील्स बनाने और फुटेज हासिल करने के लिए किया था, लेकिन इस राजनीतिक स्टंट ने पूरे संत समाज में गहरा रोष व्याप्त कर दिया है।



















