तेलंगाना के कृषि क्षेत्र में एक नया बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां किसान पारंपरिक फसलों के बजाय अधिक मुनाफा देने वाले विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। अक्टूबर का महीना राज्य के किसानों के लिए कसावा की खेती शुरू करने का एक शानदार अवसर लेकर आया है। इसे आमतौर पर साबूदाना या टैपियोका के नाम से भी जाना जाता है। कम पानी की जरूरत और सामान्य लागत में बेहतर रिटर्न देने वाली यह फसल क्षेत्र के किसानों के लिए बेहद फायदेमंद और सुरक्षित सौदा साबित हो रही है। यदि खेतों में हल्की सिंचाई की व्यवस्था उपलब्ध हो, तो अक्टूबर से नवंबर के बीच का समय इसकी रबी बुवाई के लिए सबसे बेहतरीन माना जाता है।
तेलंगाना की जलवायु और मिट्टी है बेहद अनुकूल
मानसून की विदाई के बाद अक्टूबर के महीने में शुरू होने वाली हल्की ठंड और धूप की जुगलबंदी कसावा की शुरुआती जड़ों के बेहतर विकास के लिए बहुत फायदेमंद होती है। तेलंगाना के खम्मम, भद्राद्री कोठागुडेम, नलगोंडा और महबूबनगर जैसे जिलों में पाई जाने वाली लाल और रेतीली दोमट मिट्टी इस कंदमूल की फसल के लिए सबसे उत्तम मानी जाती है। इस फसल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह सूखे को आसानी से सहन कर सकती है, जिससे सिंचाई की कमी वाले क्षेत्रों में भी इसे आसानी से उगाया जा सकता है।
बुवाई की तकनीक और खेत की तैयारी
कसावा की खेती बीजों से नहीं, बल्कि इसके तने की कलमों (स्टेम कटिंग्स) के जरिए की जाती है। बुवाई शुरू करने से पहले खेत को दो से तीन बार अच्छी तरह से जोतकर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए। इसके बाद, खेत में करीब 75 से 90 सेंटीमीटर की दूरी पर उचित मेड़ें तैयार की जाती हैं।
फसलों की अच्छी वृद्धि के लिए स्वस्थ तनों से लगभग 15 से 20 सेंटीमीटर लंबी कलमें काटी जाती हैं। ध्यान रहे कि प्रत्येक कलम में कम से कम 4 से 6 गांठें होनी जरूरी हैं। फफूंद जनित रोगों से सुरक्षा के लिए इन कलमों को कवकनाशी (फंगिसाइड) से उपचारित करना चाहिए और फिर मेड़ों पर करीब 5 सेंटीमीटर की गहराई में सीधा गाड़ देना चाहिए। बुवाई के समय खेत में अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद के साथ पोटाश का उपयोग करना बेहद लाभकारी होता है, क्योंकि पोटाश की मदद से कंद मोटे बनते हैं और उनमें स्टार्च की मात्रा बढ़ती है।
सिंचाई का तरीका और फसल की कटाई
कसावा की फसल में पानी का प्रबंधन बहुत ही सरल है। ड्रिप सिंचाई तकनीक का उपयोग करके हर 10 से 15 दिनों के अंतराल पर हल्की नमी बनाए रखना ही इसके लिए पर्याप्त होता है। किसानों को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि खेत में पानी का जमाव बिल्कुल न हो, क्योंकि जलभराव से जड़ें सड़ सकती हैं और पूरी मेहनत खराब हो सकती है।
यह फसल लगभग 8 से 10 महीने में पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है। उचित देखरेख के साथ, किसान एक एकड़ खेत से लगभग 10 से 15 टन तक कसावा की शानदार पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।
बाजार में मांग और कमाई के अवसर
कसावा का उपयोग कई तरह के उत्पाद बनाने में किया जाता है, जिससे बाजार में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है। इससे मुख्य रूप से स्टार्च, साबूदाना, चिप्स और पशु आहार तैयार किया जाता है। स्थानीय मंडियों के अलावा, पड़ोसी राज्यों जैसे आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की प्रोसेसिंग यूनिट्स में इसकी भारी मांग रहती है। कम मेहनत, न्यूनतम जोखिम और निश्चित बाजार के कारण अक्टूबर-नवंबर में कसावा लगाना तेलंगाना के किसानों के लिए अपनी आय बढ़ाने का एक बेहद ठोस और व्यावहारिक जरिया बन चुका है।



















