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बेंगलुरु में गौतम अदाणी और डी. के. शिवकुमार की मुलाकात से सियासत तेज, भाजपा ने उठाए सवालराजनीति
23 अग॰ 2026, 8:08 pm (64 दिन पहले)· 4

बेंगलुरु में गौतम अदाणी और डी. के. शिवकुमार की मुलाकात से सियासत तेज, भाजपा ने उठाए सवाल

कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार और उद्योगपति गौतम अदाणी की बंद कमरे में हुई बैठक को लेकर राज्य की राजनीति गरमा गई है। विपक्षी भाजपा ने कांग्रेस पर तीखे हमले किए हैं।

बेंगलुरु में देश के जाने-माने उद्योगपति गौतम अदाणी और कर्नाटक के उप मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार के बीच एक घंटे तक चली गोपनीय बैठक ने राज्य की राजनीतिक फिजाओं में हलचल बढ़ा दी है। इस मुलाकात के सामने आने के बाद से ही कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच जुबानी जंग छिड़ गई है, जिससे एक बार फिर कॉर्पोरेट जगत और राजनीति के संबंधों को लेकर नए सिरे से बहस शुरू हो गई है। अदाणी समूह के प्रमुख गौतम अदाणी बेंगलुरु में आर्ट ऑफ लिविंग आश्रम के एक कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए आए हुए थे। वापसी के दौरान उन्होंने सीधे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डी. के. शिवकुमार के सदाशिवनगर स्थित आवास पर पहुंचकर उनसे मुलाकात की। हालांकि मुख्यमंत्री कार्यालय और शिवकुमार के करीबियों ने इस बैठक को केवल एक शिष्टाचार भेंट बताया है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसके समय को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।

सुरंग सड़क परियोजना और टेंडर की चर्चा

यह बैठक ऐसे संवेदनशील वक्त पर हुई है जब बेंगलुरु में हेब्बाल से सिल्क बोर्ड तक बनाई जाने वाली अरबों रुपये की महत्वाकांक्षी टनल रोड परियोजना के लिए अदाणी एंटरप्राइजेज सबसे कम बोली लगाने वाली यानी L1 कंपनी के तौर पर सामने आई है। हालांकि इस टेंडर प्रक्रिया पर अभी तक अंतिम आधिकारिक मुहर नहीं लगी है, लेकिन इस मुलाकात के सामने आते ही विपक्षी दलों ने आरोप लगाना शुरू कर दिया है कि इस गुप्त बैठक का मुख्य उद्देश्य इस मेगा प्रोजेक्ट को तेजी से आगे बढ़ाना था। इस परियोजना के वित्तीय और प्रशासनिक पहलुओं को लेकर पहले से ही सुगबुगाहट चल रही थी, और इस उच्च स्तरीय मुलाकात ने उन चर्चाओं को और हवा दे दी है।

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भाजपा का तीखा हमला और राहुल गांधी पर तंज

इस मुलाकात के सार्वजनिक होते ही भारतीय जनता पार्टी ने आक्रामक रुख अपनाते हुए सत्ताधारी कांग्रेस सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक ने कड़े सवाल उठाते हुए कहा कि एक तरफ कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी दिल्ली में अदाणी समूह के खिलाफ लगातार आक्रामक तेवर अपनाए हुए हैं, तो वहीं दूसरी तरफ कर्नाटक की कांग्रेस सरकार उनके स्वागत के लिए पूरी तरह तैयार नजर आती है। आर. अशोक ने तंज कसते हुए यह भी पूछा कि क्या राहुल गांधी ने डी. के. शिवकुमार को अदाणी से मिलने की अनुमति दी थी। उन्होंने इसे कांग्रेस पार्टी का दोहरा चरित्र करार दिया और राहुल गांधी को सलाह दी कि वे बेंगलुरु आकर उन पेड़ों को गले लगाएं जो इस बहुप्रतीक्षित सुरंग सड़क परियोजना की वजह से काटे जाने की आशंका के घेरे में हैं।

अदालत तक पहुंचा टनल प्रोजेक्ट का विवाद

बेंगलुरु शहर की गंभीर ट्रैफिक समस्या के स्थायी समाधान के तौर पर पेश की जा रही इस टनल परियोजना का भाजपा शुरुआत से ही पुरजोर विरोध करती आ रही है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या पहले ही इस प्रोजेक्ट के खिलाफ कर्नाटक उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा चुके हैं। अब उद्योगपति गौतम अदाणी और डी. के. शिवकुमार की इस मुलाकात ने विपक्ष को सरकार के खिलाफ एक नया और मजबूत हथियार दे दिया है, जिससे आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति में गतिरोध और बढ़ने के पूरे आसार हैं।

सवाल-जवाब

गौतम अदाणी और डी. के. शिवकुमार की मुलाकात कहां हुई थी?
यह मुलाकात बेंगलुरु में डी. के. शिवकुमार के सदाशिवनगर स्थित आवास पर हुई थी।
इस मुलाकात के दौरान कौन सा प्रोजेक्ट चर्चा के केंद्र में था?
बेंगलुरु की हेब्बाल से सिल्क बोर्ड तक बनने वाली टनल रोड (सुरंग सड़क) परियोजना इस चर्चा के केंद्र में थी।
टनल प्रोजेक्ट के लिए सबसे कम बोली किसने लगाई है?
अदाणी एंटरप्राइजेज इस सुरंग सड़क परियोजना के लिए सबसे कम बोली लगाने वाली (L1) कंपनी बनकर उभरी है।
इस बैठक पर मुख्य राजनीतिक प्रतिक्रिया किसने दी?
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक ने इस मुलाकात को लेकर राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Ravikash Gupta@ravikash·64 दिन पहले

यह घटना कॉर्पोरेट घरानों और राजनीतिक दलों के बीच के जटिल वित्तीय संबंधों को उजागर करती है। जब बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में अरबों रुपये दांव पर हों और किसी कंपनी का नाम सबसे कम बोली लगाने वाली यानी L1 इकाई के रूप में सामने आए, तो ऐसी उच्च-स्तरीय बैठकें निवेशकों और वित्तीय बाजारों का ध्यान खींचती हैं। राजनीतिक बयानबाजी के बीच, इस तरह के घटनाक्रम टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रशासनिक गतिशीलता पर असर डालते हैं, जिससे आगामी आर्थिक और कॉरपोरेट रणनीतियों पर पैनी नजर रखनी होगी।

Rohan Verma@rohan-verma·64 दिन पहले

रविकाश गुप्ता के इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए यह ध्यान रखना होगा कि इस तरह के हाई-प्रोफाइल मेल-मिलाप का असर केवल कर्नाटक की स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका व्यापक मनोवैज्ञानिक प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों की रणनीति पर भी पड़ता है। जब बुनियादी ढांचे के बड़े प्रोजेक्ट्स और एल-वन बोली जैसे वित्तीय मामले अदालतों और जनता के बीच बहस का केंद्र हों, तब ऐसे गोपनीय संवाद पारदर्शिता के दावों को सवालों के घेरे में ला देते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि प्रशासनिक मशीनरी इस दबाव के बीच टेंडर प्रक्रिया की गरिमा और गति को कैसे संतुलित रखती है।

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