नई दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से सुप्रीम कोर्ट के हालिया अंतरिम आदेश को लेकर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। संगठन ने अदालत के निर्देशों पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि इस फैसले से पूरे देश में चिंता का माहौल बनना स्वाभाविक है। विशेष तौर पर अदालत के आदेश के चौथे बिंदु पर कड़ी आपत्ति जताई गई है, जिसमें पहले से दर्ज मामलों की जांच और कानूनी कार्रवाई को जारी रखने की अनुमति दी गई है। संगठन का यह भी कहना है कि यह अंतरिम निर्देश केंद्र सरकार की ओर से 25 जुलाई 2026 को दिए गए उस भरोसे के बिल्कुल उलट है, जिसमें शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में हिस्सा लेने वाले विद्यार्थियों और आंदोलनकारियों के खिलाफ किसी भी तरह की प्रत्यक्ष या परोक्ष कार्रवाई न करने का आश्वासन दिया गया था।
चौथे निर्देश पर क्यों भड़की CJP
विभिन्न जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के बाद पारित किए गए इस अंतरिम आदेश में कई बिंदु शामिल हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा चौथे नंबर के निर्देश की हो रही है। इस प्रावधान के तहत अदालतों या संबंधित प्रशासनों को पहले से कायम मुकदमों में जांच आगे बढ़ाने से नहीं रोका गया है। इसका मतलब यह है कि न्यायिक प्रक्रिया के तहत कोई भी एफआईआर स्वतः समाप्त नहीं हुई है और अंतिम निर्णय आने तक पुलिस या जांच एजेंसियां सामान्य नियमों के मुताबिक अपनी कार्रवाई जारी रख सकती हैं। कॉकरोच जनता पार्टी ने इसी खास बिंदु को आधार बनाते हुए अपनी गहरी नाराजगी व्यक्त की है और इसे न्यायसंगत नहीं माना है।
वादे से मुकरने की आशंका
संगठन का यह तर्क है कि उनका राष्ट्रव्यापी आंदोलन केवल इस वजह से स्थगित किया गया था क्योंकि सरकार ने सार्वजनिक रूप से यह भरोसा दिलाया था कि प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएंगे और युवाओं को निशाना नहीं बनाया जाएगा। अब CJP को इस बात का डर सता रहा है कि केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी शासित राज्य इस न्यायिक आदेश की आड़ लेकर मुकदमों को जिंदा रख सकते हैं और आंदोलन से जुड़े लोगों पर नकेल कस सकते हैं। पार्टी का मानना है कि यदि ऐसा होता है तो यह सीधे तौर पर देश के युवाओं को दिए गए वचनों का खुला उल्लंघन होगा।
सरकार रखे अपना पक्ष
अपनी मांगों को प्रमुखता से रखते हुए सीजेपी ने यह मांग उठाई है कि केंद्र तथा विभिन्न राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के समक्ष 25 जुलाई को हुए कथित समझौतों और आश्वासनों की पूरी रूपरेखा प्रस्तुत करें, ताकि अदालत के सामने तमाम तथ्य स्पष्ट रहें। संगठन का दावा है कि जब यह अंतरिम आदेश दिया गया था, तब सरकार और आंदोलनकारियों के बीच हुई बातचीत के तमाम विवरण अदालत के समक्ष नहीं रखे जा सके थे। इसके अलावा पार्टी का यह भी कहना है कि इस आदेश में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि सरकारें मुकदमे वापस नहीं ले सकतीं। कानूनी जानकारों और संगठन के मुताबिक, मुकदमों को वापस लेने या अभियोजन रोकने का अधिकार आज भी कार्यपालिका के पास सुरक्षित है, इसलिए प्रशासन को इस आदेश को बहाना बनाकर कार्रवाई जारी नहीं रखनी चाहिए। असम और बिहार जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए संगठन ने कहा कि वहां की सरकारें भी चाहें तो इन मामलों में आगे की कानूनी प्रक्रिया रोक सकती हैं।
दोबारा सड़क पर उतरने की चेतावनी
संगठन के अनुसार, सरकार की तरफ से आश्वासन पर अमल करने की अंतिम समयसीमा समाप्त हो रही है। CJP ने अपनी पुरानी मांग को फिर दोहराया है कि सभी एफआईआर को तुरंत खारिज किया जाए और किसी भी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी को परेशान न किया जाए। साथ ही यह चेतावनी भी दी गई है कि यदि शासन व्यवस्था ने अपने वादों को पूरा नहीं किया, तो देश के युवाओं के पास दोबारा सड़कों पर उतरकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचेगा। लोकतांत्रिक तरीकों से अपनी बात रखने वाले छात्रों के साथ किसी भी प्रकार का अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हालांकि, इस पूरे मामले पर सरकार या संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक बयान या प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।



















