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दतिया का किला और नरोत्तम मिश्रा: क्या बीजेपी की नई रणनीति ने खत्म कर दिया पुराने कद्दावर नेता का दबदबा?राजनीति
10 जुल॰ 2026, 11:47 pm (18 दिन पहले)· 1

दतिया का किला और नरोत्तम मिश्रा: क्या बीजेपी की नई रणनीति ने खत्म कर दिया पुराने कद्दावर नेता का दबदबा?

दतिया उपचुनाव में बीजेपी ने नरोत्तम मिश्रा के बजाय आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। तीन बार के विधायक और पूर्व मंत्री की अनुपस्थिति से उनके भविष्य को लेकर कयासों का दौर शुरू हो गया है।

दतिया और नरोत्तम मिश्रा का नाम लंबे समय तक एक-दूसरे का पर्याय बने रहे। दतिया को नरोत्तम मिश्रा का गढ़ माना जाता था, जहाँ से वे लगातार तीन बार विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी सत्ता का लोहा मनवा चुके थे। एक बड़ा रसूख रखने वाले इस नेता के लिए दतिया की राजनीति एकछत्र राज्य जैसी रही थी। हालांकि, साल 2023 के विधानसभा चुनावों में यह किला पूरी तरह दरक गया, जब उन्हें राजेंद्र भारती के हाथों करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। यह हार न केवल उनके समर्थकों के लिए बल्कि राजनीतिक गलियारों के लिए भी एक बड़ा चौंकाने वाला घटनाक्रम था। अब बीजेपी ने उन्हें दतिया उपचुनाव के लिए टिकट न देकर एक और बड़ा झटका दिया है, जिससे नरोत्तम मिश्रा के भविष्य पर गहरे सवाल उठ खड़े हुए हैं।

उपचुनाव की तैयारी और अचानक आया बदलाव

जैसे ही निर्वाचन आयोग ने दतिया में उपचुनाव की घोषणा की, नरोत्तम मिश्रा ने सक्रियता बढ़ा दी थी। उन्होंने अपने विधानसभा क्षेत्र में जनसंपर्क शुरू किया और लगातार सभाओं के माध्यम से जनता से समर्थन की अपील करते रहे। चर्चाओं के अनुसार, उन्होंने नामांकन के लिए जरूरी दस्तावेज और फॉर्म तक खरीद लिए थे। लेकिन ऐन वक्त पर पार्टी आलाकमान ने आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारने का निर्णय लिया, जिससे नरोत्तम मिश्रा के सारे अरमान धरे रह गए। अब यह बड़ा बदलाव पार्टी की नई कार्ययोजना की ओर इशारा कर रहा है।

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डबरा से दतिया तक का सफर

नरोत्तम मिश्रा का जन्म 15 अप्रैल 1960 को ग्वालियर में हुआ था। उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत भारतीय जनता युवा मोर्चा से जुड़ी। साल 1998 में उन्होंने ग्वालियर की जीवाजी यूनिवर्सिटी से एमए और पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। वे ग्वालियर में छात्र संघ के सचिव भी रह चुके थे। उनकी कार्यकुशलता को भांपकर बीजेपी ने उन्हें 1990 में डबरा से पहली बार चुनावी समर में उतारा और वे जीत हासिल करने में कामयाब रहे। इसके बाद 1998 और 2003 के चुनावों में भी डबरा से उनकी जीत का सिलसिला जारी रहा।

दतिया में सफलता और मंत्री पद

राजनीतिक परिसीमन के बाद जब डबरा विधानसभा सीट आरक्षित वर्ग के लिए तय हो गई, तो पार्टी ने नरोत्तम मिश्रा को दतिया भेजने का फैसला किया। वहाँ से उन्होंने 2008 से 2018 तक लगातार तीन बार जीत दर्ज की। वे एक जमीनी जुझारू नेता के रूप में पहचाने जाते रहे और अपने ओजस्वी भाषणों के लिए मशहूर थे। विधायक के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने बाबू लाल गौर से लेकर शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाईं। उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार के गृह, विधि एवं विधायी कार्य, संसदीय कार्य और जेल जैसे संवेदनशील मंत्रालय संभाले।

हार के पीछे की पटकथा

साल 2023 में जब मध्य प्रदेश में बीजेपी लहर पर सवार थी और पार्टी ने प्रचंड बहुमत प्राप्त किया, तब दतिया में स्थिति अलग थी। वहाँ नरोत्तम मिश्रा को कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने 7,000 से अधिक मतों से हराया। जानकारों का मानना है कि इस हार की नींव साल 2018 के चुनावों में ही पड़ चुकी थी, जहाँ वे राजेंद्र भारती के मुकाबले केवल 2,656 वोटों के अंतर से जीत पाए थे। भारती का क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहना काम आया। बाद में एक बैंक एफडी धोखाधड़ी मामले में दिल्ली की एमपी एमएलए कोर्ट द्वारा राजेंद्र भारती को तीन साल की सजा सुनाए जाने के कारण उनकी सदस्यता समाप्त हुई, जिसके चलते दतिया में उपचुनाव अनिवार्य हो गया।

टिकट कटने की संभावित वजहें

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दतिया में नरोत्तम मिश्रा के प्रति बढ़ती सत्ता विरोधी लहर और स्थानीय नाराजगी एक बड़ा कारण थी। उन पर बाहरी होने का आरोप भी अक्सर लगता रहा क्योंकि उनका मूल निवास स्थान डबरा था। इन तमाम स्थितियों के बीच बीजेपी किसी भी तरह का जोखिम मोल लेने के मूड में नहीं थी, इसी वजह से पार्टी ने इस बार आशुतोष तिवारी को मौका दिया है।

आगे की क्या संभावनाएं?

नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने से उनके समर्थक निराश जरूर हैं, लेकिन उनके प्रभाव को पूरी तरह खत्म मानना जल्दबाजी होगी। दिल्ली दरबार के साथ उनकी मजबूत ट्यूनिंग किसी से छिपी नहीं है। ऐसी संभावना है कि बीजेपी उन्हें राज्य की राजनीति से हटाकर संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी सौंप सकती है या उन्हें किसी राज्य के राज्यपाल के रूप में तैनात किया जा सकता है। यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि आगामी लोकसभा चुनावों में पार्टी उन्हें किसी सीट से मैदान में उतार सकती है, क्योंकि वे हिंदूवादी छवि के एक आक्रामक और मुखर नेता रहे हैं।

सवाल-जवाब

नरोत्तम मिश्रा दतिया से क्यों नहीं लड़ रहे हैं?
पार्टी ने स्थानीय एंटी-इंकंबेंसी और बाहरी होने के आरोपों के कारण इस बार दतिया से आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया है।
नरोत्तम मिश्रा ने पहली बार चुनाव कहाँ से जीता था?
उन्होंने 1990 में डबरा विधानसभा सीट से अपना पहला चुनाव जीता था।
दतिया में उपचुनाव की आवश्यकता क्यों पड़ी?
कांग्रेस के राजेंद्र भारती को बैंक एफडी धोखाधड़ी मामले में सजा मिलने के बाद उनकी सदस्यता रद्द हो गई, जिससे यह सीट खाली हो गई।
क्या नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक करियर खत्म हो गया है?
उनके पास दिल्ली के साथ मजबूत संबंध हैं और भविष्य में उन्हें संगठन में भूमिका या लोकसभा का टिकट मिल सकता है, इसलिए करियर खत्म मानना जल्दबाजी है।
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