देश के राजनीतिक गलियारों में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जहां भारत निर्वाचन आयोग ने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक नाम और उसके लोकप्रिय चुनाव चिह्न पर सख्त कार्रवाई करते हुए पाबंदी लगा दी है। इस अंतरिम आदेश के बाद से राज्य की राजनीति में सुगबुगाहट तेज हो गई है क्योंकि आने वाले विधानसभा उपचुनावों में किसी भी धड़े को पुरानी पहचान के साथ मैदान में उतरने की अनुमति नहीं होगी। चुनाव आयोग के इस कड़े कदम से दोनों ही प्रतिद्वंद्वी खेमों को बड़ा झटका लगा है, जिन्हें अब अपनी चुनावी रणनीति में तुरंत बदलाव करना होगा।
उपचुनावों के मद्देनजर आयोग का कड़ा फैसला
मौजूदा समय में विभिन्न विधानसभा सीटों पर उपचुनावों की प्रक्रिया तेजी से चल रही है और निर्वाचन आयोग के पास विवाद के संपूर्ण समाधान के लिए पर्याप्त समय नहीं बचा है। इसी मजबूरी और चुनावी पारदर्शिता को बरकरार रखने के लिए आयोग ने निर्वाचन प्रतीक आदेश के पैरा 15 के तहत यह अंतरिम व्यवस्था लागू की है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि जब तक विवाद का अंतिम रूप से निपटारा नहीं हो जाता, तब तक दोनों पक्षों को समान रूप से दूर रखा जाएगा ताकि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष बनी रहे।
नए नाम और प्रतीकों के चयन के लिए कड़ा निर्देश
आयोग के सख्त निर्देशों के मुताबिक दोनों ही गुट अब अकेले ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस नाम का इस्तेमाल करने के हकदार नहीं हैं। हालांकि उम्मीदवारों के पास यह मामूली छूट जरूर रहेगी कि वे अपने नए नाम के साथ पुरानी पार्टी का संदर्भ जोड़ सकें, लेकिन मुख्य पहचान बदल जाएगी। इसके अलावा दोनों पक्षों को पार्टी के पारंपरिक और आरक्षित चुनाव चिह्न से पूरी तरह वंचित कर दिया गया है। चुनाव लड़ने के लिए दोनों धड़ों को आयोग द्वारा जारी की गई अधिसूचित फ्री सिंबल्स की सूची में से ही नया निशान चुनना होगा। इसके लिए सभी पक्षों को 18 सितंबर 2026 की सुबह 11 बजे तक अपनी पसंद के तीन नए नाम और तीन मुफ्त प्रतीकों के विकल्प लिखित रूप में सौंपने का निर्देश दिया गया है।
संगठन के भीतर बगावत और आंतरिक कलह की कहानी
इस पूरे विवाद की असली शुरुआत तब हुई जब पार्टी के भीतर से ही बगावत के सुर उठने लगे और रीतब्रत बनर्जी ने आधिकारिक रूप से निर्वाचन आयोग के सामने अपनी याचिका दायर कर दी। याचिका में यह गंभीर दावा किया गया था कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल बहुत पहले ही यानी 11 फरवरी 2025 को समाप्त हो चुका था। इसके चलते उस पुरानी कार्यसमिति के पास किसी भी प्रकार का नीतिगत निर्णय लेने का कोई कानूनी या संवैधानिक अधिकार शेष नहीं बचा था। बगावत करने वाले धड़े ने आयोग को यह भी जानकारी दी कि 22 जून 2026 को पार्टी का एक विशेष अधिवेशन बुलाया गया था जिसमें सर्वसम्मति से अरूप रॉय को राष्ट्रीय कार्यसमिति का नया अध्यक्ष चुन लिया गया।
ममता बनर्जी के खेमे ने इन तमाम दावों और बगावती तेवरों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें पूरी तरह निराधार बताया है। ममता बनर्जी की कानूनी टीम और अधिकृत प्रतिनिधियों ने आयोग के समक्ष यह पक्ष रखा कि रीतब्रत बनर्जी की ओर से आयोजित की गई वह विशेष बैठक पूरी तरह फर्जी और असंवैधानिक थी। उनका तर्क था कि उस कथित बैठक में पारित किए गए सभी प्रस्ताव और नियुक्तियां पार्टी के आंतरिक संविधान के प्रावधानों के विपरीत थीं, इसलिए उन पर विचार नहीं किया जाना चाहिए। ममता गुट ने आयोग से पुरजोर मांग की थी कि बागी नेताओं की तरफ से भेजी गई चिट्ठियों और दावों को पूरी तरह नजरअंदाज किया जाए।
दिल्ली में मैराथन सुनवाई और दोनों पक्षों के तर्क
दोनों विरोधी खेमों के बीच छिड़े इस तीव्र गतिरोध को देखते हुए निर्वाचन आयोग ने 17 सितंबर को नई दिल्ली स्थित अपने मुख्यालय में दोनों पक्षों के प्रतिनिधिमंडलों को तलब किया था। दोपहर तीन बजे के तय समय पर आयोग ने सबसे पहले अरूप रॉय और रीतब्रत बनर्जी के गुट की दलीलों को विस्तार से सुना। इसके ठीक बाद शाम चार बजे ममता बनर्जी के प्रतिनिधिमंडल को भी अपनी बात रखने का पूरा मौका दिया गया। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों ने दोनों पक्षों द्वारा सौंपे गए भारी-भरकम दस्तावेजों और कानूनी कागजातों की बारीकी से जांच की। इसके बाद यह निर्णय लिया गया कि मामला बेहद गंभीर प्रकृति का है और पैरा 15 के तहत मूल विवाद पर अंतिम फैसला विस्तृत सुनवाई के बाद ही सुनाया जाएगा, तब तक यह रोक प्रभावी रहेगी।



















