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यूपी चुनाव 2027: मायावती के दांव से क्या फिर लौटेगा 2007 का फॉर्मूला, सादाबाद से खेरागढ़ तक ब्राह्मण चेहरों पर बड़ी नजरराजनीति
17 सित॰ 2026, 12:03 pm (6 घंटे पहले)· 1

यूपी चुनाव 2027: मायावती के दांव से क्या फिर लौटेगा 2007 का फॉर्मूला, सादाबाद से खेरागढ़ तक ब्राह्मण चेहरों पर बड़ी नजर

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बहुजन समाज पार्टी ने अपनी राजनीतिक रणनीति के तहत ब्राह्मण चेहरों को मैदान में उतारना शुरू कर दिया है। मायावती के बयानों और शुरुआती टिकट वितरण से साफ संकेत मिल रहा है कि पार्टी एक बार फिर अपनी पुरानी सोशल इंजीनियरिंग को नए सिरे से आजमाने की तैयारी में जुटी है।

उत्तर प्रदेश में साल 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सियासी पारा अभी से चढ़ने लगा है। भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस समेत सभी प्रमुख दल अपने-अपने वोट बैंक को मजबूत करने और सामाजिक समीकरण साधने की जुगत में लगे हुए हैं। इसी राजनीतिक हलचल के बीच बहुजन समाज पार्टी ने भी अपने टिकट वितरण के जरिए एक बड़ा और अहम सियासी संदेश देना शुरू कर दिया है। हाथरस के बाद आगरा की खेरागढ़ सीट पर ब्राह्मण चेहरे को मैदान में उतारकर मायावती ने एक बार फिर इस समुदाय की तरफ अपने झुकाव का स्पष्ट संकेत दे दिया है। खेरागढ़ से पार्टी ने नीरज रावत को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया है, जिससे राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं।

सादाबाद से खेरागढ़ तक ब्राह्मण चेहरों को तरजीह

सामने आई जानकारी के मुताबिक, बहुजन समाज पार्टी ने हाथरस जिले की सादाबाद विधानसभा सीट से डॉक्टर अविन शर्मा को पार्टी का उम्मीदवार बनाया है। बीते 10 अगस्त को आकाश आनंद ने सादाबाद में आयोजित एक चुनावी सभा के दौरान डॉक्टर अविन शर्मा के नाम का आधिकारिक ऐलान किया था। इसके तुरंत बाद आगरा जिले की खेरागढ़ विधानसभा सीट से नीरज रावत को भी पार्टी का प्रत्याशी घोषित कर दिया गया। इन दोनों ही सीटों पर ब्राह्मण उम्मीदवारों को आगे ाराया जाना यह बताता है कि पार्टी इस वर्ग को साधने के लिए पूरी तरह गंभीर नजर आ रही है। खेरागढ़ में नीरज रावत के नाम की घोषणा 16 सितंबर को की गई, जबकि इससे पहले इस सीट पर कई अन्य नामों को लेकर भी पार्टी के भीतर लंबी चर्चाएं चल रही थीं जिनमें नीरज रावत का नाम भी प्रमुखता से शामिल था।

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मायावती के बयानों में लगातार गूंज रहा ब्राह्मण समाज

बहुजन समाज पार्टी के इन शुरुआती टिकटों को केवल स्थानीय स्तर पर उम्मीदवार के चयन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे मायावती के हालिया और तीखे बयानों के साथ जोड़कर देखना बेहद जरूरी है। साल 2026 के जून महीने में मायावती ने यह बात सार्वजनिक रूप से कही थी कि पार्टी ने सवर्ण जातियों, और विशेष तौर पर ब्राह्मण समाज को ध्यान में रखते हुए अपने उम्मीदवारों का चयन करना अब शुरू कर दिया है। इसके अलावा उन्होंने मई 2026 में भी साल 2007 के चुनावी नतीजों का हवाला देते हुए अपने पुराने सर्वसमाज वाले राजनीतिक मॉडल को याद किया था। उनके अनुसार, उस पुराने दौर में ब्राह्मणों और अन्य विभिन्न सामाजिक समूहों की सक्रिय भागीदारी के दम पर ही बहुजन समाज पार्टी ने अपनी पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी।

साल 2007 के उस ऐतिहासिक राजनीतिक फॉर्मूले को गहराई से समझना इस समय बेहद आवश्यक है। उत्तर प्रदेश की कुल 403 सीटों वाली विधानसभा में उस चुनाव के दौरान बहुजन समाज पार्टी ने अपने दम पर 206 सीटों पर शानदार जीत हासिल की थी। उस पूरे चुनाव को आज भी पार्टी की दलित और ब्राह्मण सोशल इंजीनियरिंग का सबसे बड़ा और सफल उदाहरण माना जाता है। पार्टी ने अपने पारंपरिक दलित मतदाता आधार के साथ-साथ ब्राह्मणों और अन्य पिछड़ी जातियों तक अपनी मजबूत पहुंच बनाई थी। यही अनूठा सामाजिक गठजोड़ पार्टी को भारी बहुमत तक पहुंचाने का मुख्य आधार बना था। अब आगामी 2027 के चुनाव से ठीक पहले मायावती एक बार फिर उसी पुराने दौर की याद दिला रही हैं और धरातल पर भी ब्राह्मणों को उम्मीदवार बनाकर इसकी शुरुआत कर चुकी हैं।

नया राजनीतिक माहौल और पुराना फॉर्मूला

यहीं से उत्तर प्रदेश के साल 2027 के चुनाव की असली और दिलचस्प सियासी कहानी शुरू होती है। असल सवाल यह नहीं है कि पार्टी ने केवल दो ब्राह्मण चेहरों को चुनावी मैदान में उतारा है, बल्कि मुख्य सवाल यह है कि क्या पार्टी इसके जरिए अपने पूरे सामाजिक आधार का दायरा बढ़ाना चाहती है। बहुजन समाज पार्टी का हमेशा से सबसे बड़ा पारंपरिक आधार उसका दलित मतदाता वर्ग रहा है। हालांकि, केवल एक ही सामाजिक वर्ग के सहारे किसी भी बड़े राज्य के विधानसभा चुनाव में पूर्ण विस्तार हासिल करना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। ऐसे में ब्राह्मण जातियों को टिकट देना पार्टी की उसी सोची-समझी रणनीति का अहम हिस्सा है जिसके तहत वह अपने पुराने सफल समीकरण को मौजूदा राजनीतिक माहौल में दोबारा जीवंत करना चाहती है।

अन्य दलों की रणनीति और ब्राह्मण सियासत

केवल बहुजन समाज पार्टी ही अकेले ब्राह्मण वोटों को लेकर सक्रिय नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश के अन्य प्रमुख दल भी इस प्रभावशाली समुदाय तक अपनी पकड़ मजबूत करने की पुरजोर कोशिश में जुटे हैं। समाजवादी पार्टी ने भी हाल ही में कई प्रमुख ब्राह्मण नेताओं के साथ गुप्त और खुली बैठकें की हैं, ताकि इस समुदाय के बीच अपनी स्वीकार्यता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को और अधिक बढ़ाया जा सके। ऐसे माहौल में बहुजन समाज पार्टी द्वारा शुरुआती चरणों में ही ब्राह्मण चेहरों को टिकट थमाया जाना राज्य की कुल चुनावी तस्वीर से पूरी तरह मेल खाता है। साल 2007 के चुनाव से पहले सभी दल अपने-अपने हिसाब से सियासी समीकरण दुरुस्त करने में लगे हैं।

सादाबाद सीट पर डॉक्टर अविन शर्मा को एक बार फिर उम्मीदवार बनाना पार्टी के लिए इसलिए भी बहुत मायने रखता है क्योंकि वह पहले भी इसी सीट से पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं। साल 2022 के पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान डॉक्टर अविन शर्मा बहुजन समाज पार्टी के ही आधिकारिक प्रत्याशी थे और चुनाव में उन्होंने तीसरा स्थान हासिल किया था। उपलब्ध आधिकारिक चुनावी आंकड़ों के मुताबिक, उन्हें उस चुनाव में कुल 32,555 वोट मिले थे। इसका सीधा अर्थ यह है कि पार्टी ने साल 2027 के लिए किसी बिल्कुल अनजान या नए चेहरे पर दांव लगाने के बजाय एक पुराने और अनुभवी उम्मीदवार पर दोबारा अपना भरोसा जताया है। ठीक इसी तरह खेरागढ़ सीट पर भी नीरज रावत के नाम का ऐलान चुनाव से काफी लंबे समय पहले ही कर दिया गया है।

भविष्य की रणनीति और सामाजिक समीकरण

फिलहाल सादाबाद और खेरागढ़ विधानसभा सीटों के ये टिकट बहुजन समाज पार्टी की पूरी चुनावी रणनीति का केवल एक छोटा सा हिस्सा हैं। केवल इन दो सीटों के आधार पर पार्टी की पूरी रणनीति का कोई भी पक्का निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी साबित हो सकता है। लेकिन यह बात पूरी तरह तय है कि मायावती आने वाले साल 2027 के चुनाव से पहले ब्राह्मणों को उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी देने की बात खुलकर सामने रख रही हैं। पार्टी अपने उम्मीदवारों के चयन में भी इस वर्ग को पूरा महत्व दे रही है और पुराने सामाजिक गठजोड़ की लगातार चर्चा कर रही है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि पार्टी और कितनी सीटों पर इस वर्ग के उम्मीदवारों को उतारती है।

इसके अलावा यह देखना भी उतना ही जरूरी होगा कि दलितों, पिछड़ों, मुसलमानों और अन्य सभी छोटे-बड़े समुदायों को टिकट बंटवारे में कितना और कैसा प्रतिनिधित्व मिलता है। तभी यह स्पष्ट रूप से साफ हो पाएगा कि सादाबाद और खेरागढ़ के फैसले केवल दो सीटों तक सीमित हैं या फिर यह साल 2027 के लिए बहुजन समाज पार्टी की किसी बहुत बड़ी और व्यापक सामाजिक रणनीति का हिस्सा हैं। फिलहाल यह साफ है कि चुनावी मैदान की यह कहानी अभी केवल दो उम्मीदवारों के नाम तक सीमित नहीं रहने वाली है और आने वाले समय में इसमें कई नए और बड़े सियासी मोड़ देखने को मिल सकते हैं।

सवाल-जवाब

बहुजन समाज पार्टी ने सादाबाद सीट से किसे अपना उम्मीदवार बनाया है?
पार्टी ने हाथरस जिले की सादाबाद विधानसभा सीट से डॉक्टर अविन शर्मा को अपना प्रत्याशी घोषित किया है।
खेरागढ़ विधानसभा सीट से किस उम्मीदवार के नाम का ऐलान किया गया है?
आगरा की खेरागढ़ सीट से पार्टी ने नीरज रावत को अपना उम्मीदवार बनाया है जिनकी घोषणा 16 सितंबर को हुई।
मायावती ने किस वर्ष के चुनाव को अपनी सोशल इंजीनियरिंग का उदाहरण बताया है?
मायावती ने साल 2007 के विधानसभा चुनाव का हवाला दिया है जिसमें पार्टी ने पूर्ण बहुमत हासिल किया था।
सादाबाद सीट पर डॉक्टर अविन शर्मा का पिछला चुनावी प्रदर्शन कैसा रहा था?
डॉक्टर अविन शर्मा 2022 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी के उम्मीदवार थे और 32,555 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे थे।
सादाबाद में डॉक्टर अविन शर्मा के नाम की घोषणा किसने की थी?
आकाश आनंद ने 10 अगस्त को सादाबाद में एक चुनावी सभा के दौरान डॉक्टर अविन शर्मा के नाम का ऐलान किया था।
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टिप्पणियाँ 4

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 घंटे पहले

चुनावों में उम्मीदवारों का चयन और सामाजिक समीकरण साधने की रणनीति केवल वोट बैंक तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका सीधा असर राज्य में कानून-व्यवस्था और शासन की प्राथमिकताओं पर भी पड़ता है। 2007 के फॉर्मूले को दोहराने की इस कोशिश में सर्वसमाज को जोड़ने का दावा जनता के बीच सुरक्षा, निष्पक्ष न्याय व्यवस्था और अपराध नियंत्रण जैसे अहम मुद्दों पर मंथन को बढ़ावा देगा। चुनावी हलचलों के बीच अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राजनीतिक वादों में सार्वजनिक सुरक्षा और पारदर्शी प्रशासन को कितना स्थान मिलता है।

Michael Anderson@michael-anderson·4 घंटे पहले

करन ने बिल्कुल सही रेखांकित किया है कि सामाजिक समीकरणों का असर शासन और नीतिगत प्राथमिकताओं पर पड़ता है। चुनावी रणनीति के दृष्टिकोण से देखें तो 2007 जैसे पुराने गठबंधन मॉडल को पुनर्जीवित करना केवल शुरुआती टिकट वितरण तक सीमित नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि विभिन्न सामाजिक वर्ग वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में साझा प्राथमिकताओं पर कितना भरोसा करते हैं। चुनाव से काफी पहले उम्मीदवारों का ऐलान पार्टी को जनता के रुझान को आंकने और सामाजिक ध्रुवीकरण के बीच अपने जनाधार को दोबारा परखने का मौका देता है।

Ravikash Gupta@ravikash·5 घंटे पहले

बहुजन समाज पार्टी द्वारा 2007 के दलित-ब्राह्मण सोशल इंजीनियरिंग मॉडल को 2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए पुनर्जीवित करने का प्रयास रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। हालांकि, दो दशकों में राज्य का राजनीतिक और सामाजिक समीकरण काफी बदल चुका है। वर्तमान दौर में सवर्ण मतदाताओं का रुझान केवल प्रत्याशी के चेहरे तक सीमित न होकर व्यापक राजनीतिक और विकास केंद्रित कारकों से तय होता है। ऐसे में सादाबाद और खेरागढ़ जैसी सीटों पर केवल ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने से 2007 जैसी सफलता दोहराना चुनौतीपूर्ण होगा, जब तक कि पार्टी अपने कैडर आधार को ज़मीनी स्तर पर पूरी तरह सक्रिय न कर सके।

Rohan Verma@rohan-verma·5 घंटे पहले

रविकेश की बात बिल्कुल सही है। 2007 की तुलना में आज बहुजन समाज पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती न केवल सवर्ण मतदाताओं का भरोसा जीतना है, बल्कि अपने पारंपरिक कैडर वोट बैंक को फिर से एकजुट रखना भी है। सादाबाद और खेरागढ़ जैसी सीटों पर समय से पहले प्रत्याशी घोषित करने से पार्टी की सक्रियता तो दिखती है, लेकिन आज के बहुकोणीय मुकाबले में केवल टिकट आवंटन से 2007 का मॉडल दोहराना कठिन होगा। अब देखने वाली बात यह होगी कि बसपा नेतृत्व अपने ज़मीनी सांगठनिक ढाँचे को फिर से मजबूत करने के लिए क्या रणनीति अपनाता है।

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