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नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जुझारूपन का विश्लेषण: कैसे प्रधानमंत्री गठबंधन के दबावों, युवाओं के असंतोष और 2029 की राह को पार कर रहे हैंराजनीति
17 सित॰ 2026, 4:10 pm (49 दिन पहले)· 3

नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जुझारूपन का विश्लेषण: कैसे प्रधानमंत्री गठबंधन के दबावों, युवाओं के असंतोष और 2029 की राह को पार कर रहे हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन पर जानिए कैसे वे गठबंधन सरकार के दबावों, समान नागरिक संहिता पर मतभेदों और युवाओं की नई राजनीतिक आकांक्षाओं के बीच भविष्य की राह तैयार कर रहे हैं।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज 76 वर्ष के हो गए हैं। उनका यह जन्मदिन एक ऐसे अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक पड़ाव पर आया है, जब भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उनका शासन कई तरह की अनूठी सांगठनिक और नीतिगत चुनौतियों से रूबरू है। हालांकि प्रधानमंत्री के रूप में उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता और जनता के बीच उनकी पैठ अब भी काफी मजबूत बनी हुई है, लेकिन हाल ही के दिनों में उभरे कुछ नए जन-आंदोलनों और युवाओं से संबंधित जटिल सवालों ने सरकार के भीतर एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर दी है। प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी स्वयं को, अपनी पार्टी को और अपनी सरकार को इन कठिन परिस्थितियों से कैसे बाहर निकालते हैं, इसका वास्तविक प्रमाण आने वाले कुछ महीनों में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा में होने वाले विधानसभा चुनावों के परिणामों से मिल सकता है। ये चुनाव परिणाम न केवल भारत के भावी राजनीतिक परिदृश्य की दिशा तय करने में मदद करेंगे, बल्कि इस बात का भी एक स्पष्ट संकेत देंगे कि क्या नरेंद्र मोदी वर्ष 2029 में चौथी बार सरकार का नेतृत्व करने के लिए स्वयं को आगे बढ़ाएंगे या फिर पार्टी के भीतर किसी नए उत्तराधिकारी के नाम पर मुहर लगाएंगे। 2029 के आते-आते वे 80 वर्ष की आयु से केवल एक साल पीछे, यानी 79 वर्ष के हो जाएंगे।

2024 का जनादेश और उसके बाद विधानसभा चुनावों में वापसी

अगर इतिहास पर नजर डालें, तो ऐसी ही कठिन और बेहद पेचीदा परिस्थितियां वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान भी देखने को मिली थीं। उस समय भाजपा अपने बहुचर्चित चुनावी नारे 'अबकी बार चार सौ पार' के लक्ष्य से काफी दूर रह गई थी और अपने दम पर पूर्ण बहुमत का आंकड़ा हासिल करने से चूक गई थी। यह परिणाम पार्टी की उम्मीदों के लिए एक बड़ा रणनीतिक झटका था। हालांकि, इस शुरुआती झटके के तुरंत बाद पार्टी ने अपने संगठनात्मक कौशल और मजबूत चुनावी रणनीति के बल पर जबरदस्त वापसी की। सबसे पहले हरियाणा के बेहद चुनौतीपूर्ण माने जा रहे विधानसभा चुनावों में भाजपा ने एक अप्रत्याशित जीत हासिल की। इसके बाद, पार्टी ने एक के बाद एक महाराष्ट्र, बिहार और बंगाल जैसे रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण राज्यों के विधानसभा चुनावों में प्रचंड बहुमत के साथ विजय का परचम लहराया। इस शानदार प्रदर्शन के चलते देश के दक्षिण हिस्से को छोड़कर बाकी की तीनों दिशाओं में भगवा दल ने अपनी मजबूत पकड़ का प्रदर्शन किया।

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बंगाल में मिली इस ऐतिहासिक जीत को नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी और प्रभावशाली उपलब्धियों में से एक माना जा सकता है। उन्होंने भाजपा को एक ऐसे राज्य में चुनावी जीत दिलाई जो दशकों तक वामपंथियों का अभेद्य किला रहा था और जिसके बाद वहां तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी का एकछत्र राज स्थापित हो गया था। इस अप्रत्याशित जीत ने देश के राजनीतिक वातावरण को पूरी तरह से बदल दिया। इसके परिणामस्वरूप, भारतीय जनता ने 2024 के आम चुनावों के दौरान भाजपा द्वारा झेली गई कड़ी मशक्कत को भुला दिया। कुछ समय पहले तक तो राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम हो गई थी कि 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' और नए परिसीमन जैसे बड़े फैसलों के साथ-साथ महिला आरक्षण विधेयक का दांव खेलकर देश के संपूर्ण विपक्ष को पूरी तरह से हाशिए पर धकेल दिया जाएगा। इस राजनीतिक लहर के कारण विभिन्न राज्यों के मजबूत क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा था। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, ओडिशा में बीजू जनता दल (BJD), बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (RJD), और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ-साथ शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) जैसी बड़ी क्षेत्रीय ताकतें बिखरती हुई नजर आ रही थीं। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और दक्षिण भारत की कुछ प्रमुख द्रविड़ पार्टियों को छोड़कर पूरा देश लगभग विपक्ष विहीन होने की ओर बढ़ रहा है।

CJP का उभार और युवा संपर्क के बदलते आयाम

इस एकतरफा दिख रहे परिदृश्य में जुलाई के महीने में 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) नामक एक बिल्कुल नए और गैर-राजनीतिक संगठन के अचानक उदय ने भारतीय राजनीति की दिशा को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया। इस आंदोलन के भारी दबाव के कारण सरकार को एक अप्रत्याशित कदम उठाना पड़ा और देश के केंद्रीय शिक्षा मंत्री को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। यह पहला ऐसा अवसर था जब वर्तमान सरकार किसी बाहरी जन-आंदोलन के आगे इस तरह झुकती हुई दिखाई दी। इस घटनाक्रम के बाद अचानक ऐसा महसूस होने लगा कि हिंदुत्व और राष्ट्रवाद जैसे भाजपा के मुख्य वैचारिक मुद्दे देश के युवाओं और जेन जी (Gen Z) के बीच अपनी पहले जैसी पकड़ खो रहे हैं। इसके जवाब में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा युवाओं को सीधे 'फ्रेंड्स' कहकर संबोधित करने की कोशिश भी काफी चर्चा में रही। इस संवाद के दौरान 75 वर्ष की आयु पार कर चुके नरेंद्र मोदी पहली बार मोबाइल की स्क्रीन के माध्यम से युवा पीढ़ी के साथ सीधे जुड़ने का अनूठा प्रयास करते नजर आए। युवा वर्ग की इन अचानक उभरती हुई आकांक्षाओं के बीच प्रधानमंत्री के सामने एक नई राजनीतिक चुनौती भी खड़ी हो गई है। मोदी अब तक जिस विपक्षी नेता को 'शहजादा' कहकर देश की जमीनी वास्तविकताओं से दूर होने का दावा करते थे, अब वही नेता कॉलेज के छात्रों और युवाओं के साथ विभिन्न संवाद कार्यक्रमों के जरिए अधिक प्रभावी ढंग से जुड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। इसके साथ ही, मुख्यधारा के मीडिया में भी अब उस विपक्षी नेता को काफी गंभीरता और तवज्जो मिलने लगी है।

गठबंधन का दबाव और समान नागरिक संहिता पर असमंजस

समान नागरिक संहिता (UCC) हमेशा से ही भाजपा के वैचारिक एजेंडे के मूल स्तंभों में से एक रहा है। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में इस संवेदनशील मुद्दे को लागू करने की सरकारी रणनीति पर कई गंभीर सवाल उठने लगे हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में बयान दिया था कि वर्ष 2029 तक NDA के शासन वाले सभी 21 राज्यों में UCC को प्रभावी ढंग से लागू कर दिया जाएगा। गृह मंत्री के इस बड़े बयान ने भाजपा के सहयोगी दलों को काफी सतर्क और असहज कर दिया है। आंध्र प्रदेश में भाजपा की मुख्य सहयोगी पार्टी तेलुगू देशम पार्टी (TDP) ने इस मामले पर अपनी असहजता को खुलकर जाहिर करते हुए स्पष्ट किया है कि इस मुद्दे को लेकर उनके साथ अभी तक कोई औपचारिक या अनौपचारिक चर्चा नहीं की गई है। इसके अतिरिक्त, बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जेडीयू (JD(U)), चिराग पासवान की एलजेपी (LJP), और जयंत चौधरी की आरएलडी (RLD) जैसे प्रमुख गठबंधन सहयोगी भी इस विवादास्पद मुद्दे पर भाजपा के साथ पूरे उत्साह से खड़े होने से बचते नजर आ रहे हैं।

चौंकाने वाले बड़े फैसले: नोटबंदी, धारा 370 और राम मंदिर निर्माण

नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थक ही नहीं, बल्कि उनके धुर विरोधी भी देश के विकास और राजनीतिक कार्यों के प्रति उनकी असीम ऊर्जा और समर्पण के कायल रहे हैं। मोदी की खेल भावना क्रिकेट के उस खिलाड़ी की तरह है जो मैच की आखिरी गेंद फेंके जाने तक अपनी हार मानने को तैयार नहीं होता। वे एक अत्यंत प्रभावशाली और आक्रामक वक्ता हैं, जिनमें विपरीत और विषम परिस्थितियों को भी अपने राजनीतिक लाभ में बदल लेने की एक असाधारण क्षमता है। उदाहरण के लिए, गुजरात के दंगों ने भले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को कुछ हद तक प्रभावित किया हो, लेकिन नरेंद्र मोदी ने उस संकट को भी अपने लिए एक मजबूत हिंदुत्ववादी नेता के रूप में स्थापित होने के अवसर में बदल दिया।

मोदी की संपूर्ण राजनीतिक शैली हमेशा से ही अपने चौंकाने वाले फैसलों के लिए जानी जाती रही है। वर्ष 2014 में पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने के बाद, उनका सबसे हैरान करने वाला निर्णय वर्ष 2016 में ली गई नोटबंदी का था। यद्यपि इस फैसले से देश की अर्थव्यवस्था को शुरुआती दौर में काफी नुकसान झेलना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भाजपा को मिली अभूतपूर्व और ऐतिहासिक जीत का पूरा श्रेय इसी नोटबंदी को दिया गया। वे आम जनता के दिमाग में यह बात गहराई से बैठाने में पूरी तरह सफल रहे कि यह सख्त कदम देश के भीतर काले धन को समाप्त करने और सीमा पार से होने वाले आतंकवाद की कमर तोड़ने के लिए उठाया गया था।

इसके बाद, उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा देने वाली धारा 370 को हटाना एक और अत्यंत साहसी और चौंकाने वाला फैसला साबित हुआ। इस ऐतिहासिक कदम ने उन्हें देश के भीतर एक अत्यंत प्रखर राष्ट्रवादी नेता के रूप में स्थापित कर दिया। इसके बाद, लंबे समय से चले आ रहे अयोध्या विवाद के निपटारे के बाद वहां भव्य मंदिर के गर्भगृह का निर्माण कार्य पूरा हुआ और 22 जनवरी 2024 को भगवान श्रीराम के बाल रूप यानी रामलला की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा की गई। इस पावन समारोह में नरेंद्र मोदी ने मुख्य यजमान के तौर पर हिस्सा लिया, जिसने देश के बहुसंख्यक समाज के बीच उनकी हिंदुत्ववादी छवि को और भी अधिक मजबूत और अटूट बना दिया।

बुनियादी ढांचा, जनकल्याणकारी नीतियां और विश्लेषक का दृष्टिकोण

हालांकि, उनके आलोचकों द्वारा केवल यह कहना पूरी तरह से अनुचित और नाइंसाफी होगी कि नरेंद्र मोदी अपनी राजनीति को सिर्फ हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के सहारे ही आगे बढ़ा रहे हैं। प्रधानमंत्री के रूप में उनके 12 साल के शानदार कार्यकाल के दौरान देश ने कई अन्य क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण प्रगति की है। विशेष रूप से, पिछले एक दशक के दौरान भारत के बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) के विकास को लेकर जो युगांतरकारी कार्य किए गए हैं, वे देश के इतिहास में अभूतपूर्व हैं। उनके द्वारा शुरू किया गया 'स्वच्छता अभियान' एक ऐसा राष्ट्रव्यापी आंदोलन था, जिसकी कल्पना हमारे देश की सामाजिक परिस्थितियों में पहले कभी किसी राजनेता ने नहीं की थी। हालांकि आज भी यह दावा नहीं किया जा सकता कि देश का हर कोना पूरी तरह से साफ-सुथरा हो चुका है, लेकिन स्वच्छता के प्रति आम भारतीय नागरिकों की मानसिकता और सोच में एक बड़ा सकारात्मक बदलाव लाने का वास्तविक श्रेय निश्चित रूप से इस अभियान और प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तिगत प्रयासों को जाता है। इसके अतिरिक्त, पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने के लिए किए गए उल्लेखनीय प्रयास भी उनकी सरकार की एक बड़ी और वैश्विक उपलब्धि के रूप में दर्ज हैं।

इसके साथ ही, मोदी सरकार ने देश के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के सामाजिक कल्याण के लिए भी कई अनूठी योजनाओं का क्रियान्वयन किया है। उदाहरण के लिए, प्रधानमंत्री जन-धन योजना के तहत देश के उन करोड़ों गरीब लोगों के बैंक खाते खोले गए, जिन्होंने अपने जीवन में कभी किसी बैंक के भीतर कदम तक नहीं रखा था। इस योजना के अंतर्गत शून्य शेष (जीरो बैलेंस) वाले लगभग 31 करोड़ से अधिक नए खाते खोले गए, जिसने देश के वित्तीय समावेशन को एक नई ऊंचाई दी। इसके अलावा, प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से देश के बेघर और गरीब लोगों को पक्का मकान उपलब्ध कराने की मुहिम शुरू की गई, जिसमें लगभग एक करोड़ से अधिक घरों के निर्माण का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया गया। साथ ही, प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत देश की गरीब महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन प्रदान कर स्वच्छ रसोई ईंधन तक उनकी पहुंच सुनिश्चित की गई, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है।

इन तमाम राजनीतिक और सामाजिक पहलुओं का गहन विश्लेषण देश के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक मामलों के जानकार रशीद किदवई द्वारा प्रस्तुत किया गया है। रशीद किदवई वर्तमान में प्रतिष्ठित थिंक टैंक 'ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन' (ORF) में बतौर विजिटिंग फेलो कार्यरत हैं। भारतीय राजनीति से लेकर हिंदी सिनेमा के इतिहास और उसके सामाजिक प्रभावों पर उनकी गहरी पकड़ मानी जाती है। उन्होंने देश के राजनीतिक घटनाक्रमों पर कई प्रसिद्ध पुस्तकें भी लिखी हैं, जिनमें 'सोनिया: ए बायोग्राफी', 'बैलट: टेन एपिसोड्स दैट हैव शेप्ड इंडियाज डेमोक्रेसी', 'नेता-अभिनेता: बॉलीवुड स्टार पावर इन इंडियन पॉलिटिक्स', 'द हाउस ऑफ सिंधियाज: ए सागा ऑफ पावर, पॉलिटिक्स एंड इंट्रीग', और 'भारत के प्रधानमंत्री' जैसी बेहद चर्चित कृतियां शामिल हैं। उनके इस राजनीतिक विश्लेषण पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने या अधिक जानकारी साझा करने के लिए सुधी पाठक सीधे उनके आधिकारिक ईमेल [email protected] पर संपर्क स्थापित कर सकते हैं।

सवाल-जवाब

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 76वां जन्मदिन किस राजनीतिक संदर्भ में आया है?
यह जन्मदिन ऐसे समय में आया है जब भाजपा गठबंधन की राजनीति, युवाओं के बढ़ते असंतोष और आगामी विधानसभा चुनावों जैसी कई चुनौतियों का सामना कर रही है।
2024 के लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा ने किन राज्यों में चुनावी सफलता हासिल की?
पार्टी ने हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत दर्ज की।
CJP के उभार ने सरकार को किस प्रकार प्रभावित किया?
इस गैर-राजनीतिक युवा आंदोलन के दबाव के कारण देश के केंद्रीय शिक्षा मंत्री को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था।
समान नागरिक संहिता (UCC) पर भाजपा के किन सहयोगियों ने असहजता जताई है?
तेलुगू देशम पार्टी (TDP) ने कहा है कि इस पर चर्चा नहीं हुई है, जबकि जेडीयू (JD(U)), एलजेपी (LJP) और आरएलडी (RLD) भी इस मुद्दे पर पूरी तरह भाजपा के साथ नहीं दिख रहे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी के 12 साल के कार्यकाल की प्रमुख सामाजिक कल्याण योजनाएं कौन सी हैं?
इनमें जन-धन योजना (31 करोड़ से अधिक बैंक खाते), प्रधानमंत्री आवास योजना (1 करोड़ घर बनाने का लक्ष्य) और उज्जवला योजना शामिल हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ananya Iyer@ananya-iyer·48 दिन पहले

मनोरंजन और पॉप कल्चर की दुनिया में राजनीतिक नैरेटिव और सेलिब्रिटी ब्रांडिंग का यह गठजोड़ अब एक नया ट्रेंड बन चुका है। प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक जीवन के इस चरण और आगामी चुनावों का प्रभाव केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और वेब सीरीज की पटकथाओं को भी बड़े पैमाने पर प्रभावित करेगा। आने वाले समय में मुख्यधारा की राजनीतिक बायोपिक्स और डॉक्यूमेंटरीज के लिए बॉक्स ऑफिस का गणित पूरी तरह बदल सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·48 दिन पहले

राष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन के दबावों और आगामी विधानसभा चुनावों के नतीजों का सीधा असर कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक स्थिरता और नीतिगत फैसलों पर पड़ेगा। जैसे-जैसे राज्य चुनावों का रण नजदीक आ रहा है, न्याय व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक सरगर्मी और बढ़ेगी, जो वर्ष 2029 की राजनीतिक दिशा तय करने में निर्णायक साबित होगी।

Yuki Tanaka@yuki-tanaka·48 दिन पहले

करण मल्होत्रा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, आगामी विधानसभा चुनावों के परिणाम केवल चुनावी जीत या हार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह केंद्र सरकार की आर्थिक सुधारों की गति और दीर्घकालिक नीतिगत प्राथमिकताओं को भी गहराई से प्रभावित करेंगे। गठबंधन सरकारों की प्रकृति को देखते हुए, क्षेत्रीय दलों की आकांक्षाएं राष्ट्रीय स्तर पर प्रशासनिक निर्णयों और विधायी सुधारों में गतिरोध पैदा कर सकती हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रधानमंत्री मोदी इन राजनीतिक अंतर्विरोधों के बीच किस प्रकार संतुलन साधते हैं और वर्ष 2029 की चुनावी रणनीति को कैसे आकार देते हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·49 दिन पहले

क्षेत्रीय राजनीति और चुनावी रणनीति के दृष्टिकोण से देखें तो उत्तर प्रदेश समेत आगामी राज्यों के चुनाव यह तय करेंगे कि पार्टी युवाओं के असंतोष और गठबंधन की चुनौतियों से कैसे निपटती है। अतीत में हरियाणा, महाराष्ट्र और बंगाल जैसे राज्यों में रणनीतिक वापसी का रिकॉर्ड ज़रूर रहा है, लेकिन 2029 की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि ज़मीनी मुद्दों और नई जन-आकांक्षाओं को शासन की नीतियों में कितनी तेज़ी से ढाला जाता है।

Ravikash Gupta@ravikash·49 दिन पहले

गठबंधन के दबाव और युवाओं की बदलती आकांक्षाएँ केवल राजनीतिक चुनौतियाँ नहीं हैं, बल्कि ये भारतीय अर्थव्यवस्था के वृहद परिदृश्य और निवेशक सेंटिमेंट को भी प्रभावित करती हैं। आगामी विधानसभा चुनावों के परिणाम और नीतिगत मोर्चे पर उठाया जाने वाला हर कदम कॉर्पोरेट सेक्टर, स्टार्टअप इकोसिस्टम और वित्तीय बाज़ारों के लिए यह स्पष्ट करेगा कि सरकार सुधारों की गति को बनाए रखते हुए दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों को कैसे साधती है।

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