पश्चिम बंगाल की राजनीति में विपक्षी एकता को लेकर एक तीखी बहस छिड़ गई है। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता किरणमय नंदा ने सोमवार को पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और इंडिया ब्लॉक, दोनों को कठघरे में खड़ा किया। उनका कहना है कि विपक्ष का यह गठबंधन असल में ज़मीन पर कहीं नहीं दिखता, क्योंकि जो पार्टियां एक-दूसरे की सहयोगी होने का दावा करती हैं, वही कई राज्यों में आमने-सामने चुनाव लड़ रही हैं।
इंडिया ब्लॉक पर सीधा सवाल
TrendKia से बातचीत में नंदा ने विपक्षी गठबंधन की असल हालत पर सवाल उठाए। उनके मुताबिक यह तालमेल ज़्यादातर कागज़ों तक सीमित है और ज़मीनी स्तर पर इसके पीछे कोई ठोस समझ नहीं है। उन्होंने पूछा, “इंडिया ब्लॉक असल में कागज पर बना एक राजनीतिक समझौता है. अगर सहयोगी होने का दावा करने वाली पार्टियां ही चुनावों में एक-दूसरे से लड़ रही हैं तो असल में गठबंधन कहां है?”
इस सवाल को और पुख़्ता करने के लिए उन्होंने दो राज्यों का उदाहरण दिया, जहां इंडिया ब्लॉक के घटक दलों के बीच कोई वास्तविक चुनावी तालमेल नहीं रहा। नंदा ने कहा, “क्या बंगाल में कोई गठबंधन था? नहीं. क्या केरल में कोई गठबंधन था? नहीं. असल में राज्य स्तर पर इनमें से कई पार्टियों के बीच कोई वास्तविक गठबंधन नहीं है.” उनका इशारा साफ था कि राष्ट्रीय मंच पर एकजुटता का दावा और राज्यों की ज़मीनी सच्चाई के बीच गहरी खाई है।
ममता सरकार के रिकॉर्ड पर निशाना
नंदा ने अपनी पार्टी की चुनावी हार की वजह सीधे तौर पर ममता सरकार के कामकाज और धार्मिक तुष्टिकरण की राजनीति को ठहराया। उन्होंने तृणमूल के शासनकाल को नाकाम बताते हुए कहा कि जनता की नाराज़गी का असर भाजपा को मिली बढ़त में साफ झलका। उनके शब्दों में, “पिछली सरकार के 15 साल के कार्यकाल में अच्छा नहीं, बल्कि खराब कामकाज देखने को मिला. भाजपा 208 सीटें जीतना ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ लोगों के गुस्से का नतीजा था.”
धर्म की राजनीति का दांव उल्टा पड़ा
वरिष्ठ नेता ने सबसे गंभीर आरोप यह लगाया कि राज्य में धर्म के आधार पर राजनीति की शुरुआत खुद ममता बनर्जी ने की, और यही रणनीति आख़िरकार उन्हीं के लिए नुकसानदेह साबित हुई। नंदा ने कहा, “बंगाल में पारंपरिक रूप से धर्म पर आधारित राजनीति नहीं होती थी. ममता बनर्जी ही थीं जिन्होंने राज्य में धर्म की राजनीति शुरू की और आखिरकार यह उन्हीं पर भारी पड़ी.”
बंगाल की चुनावी राजनीति को समझाते हुए उन्होंने जाति के पहलू को नकार दिया। उनका मानना है कि यहां वोट किसी जातीय समीकरण से नहीं, बल्कि जनता के मिज़ाज से तय होते हैं। उन्होंने कहा, “बंगाल में जाति की राजनीति नहीं होती. यहां वोटिंग का पैटर्न ज्यादातर लोगों के मूड से तय होता है. इस मामले में बंगाल ऐतिहासिक रूप से कई अन्य राज्यों से अलग रहा है.”
दलबदल पर चिंता
राजनेताओं के बार-बार पाला बदलने के बढ़ते चलन पर भी नंदा ने अपनी राय रखी। उन्होंने इसे लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक बताया, भले ही मौजूदा कानूनी व्यवस्था में इसकी इजाज़त हो। उन्होंने कहा, “बार-बार पार्टी बदलना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है, हालांकि दलबदल विरोधी कानून और मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के तहत इस तरह की गतिविधियां कानूनी रूप से मान्य हैं.” उनके इस बयान ने विपक्ष की एकजुटता और बंगाल की बदलती सियासत, दोनों पर नई बहस को हवा दे दी है।













