एशिया की सबसे समृद्ध महानगरपालिका मानी जाने वाली बृहन्मुंबई महानगरपालिका में जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक पदाधिकारियों के लिए नई गाड़ियों की खरीद का प्रस्ताव एक बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है। मुंबई शहर में भारी बारिश के बाद जलजमाव, गड्ढों से भरी सड़कों और खुले मैनहोल जैसी गंभीर नागरिक समस्याओं से जूझ रहे आम लोगों के बीच इस प्रस्ताव ने तीखी बहस को जन्म दे दिया है। महज आधा साल पहले खरीदी गई गाड़ियों के बावजूद अब अधिक महंगी और आरामदायक गाड़ियों की मांग उठाए जाने से सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं।
नई लग्जरी गाड़ियों की खरीद का प्रस्ताव और प्रशासनिक विवरण
प्रशासनिक स्तर पर प्रस्तुत किए गए प्रस्ताव के अनुसार, मुंबई की मेयर, डिप्टी मेयर, विभिन्न राजनीतिक दलों के ग्रुप लीडर और बीएमसी की महत्वपूर्ण वैधानिक समितियों के अध्यक्षों के लिए नई गाड़ियां खरीदने की तैयारी की जा रही है। वर्तमान में उपयोग की जा रही स्कॉर्पियो गाड़ियों की जगह इनोवा क्रिस्टा और इनोवा हाईक्रॉस जैसी प्रीमियम गाड़ियां उपलब्ध कराने की बात कही गई है। बीएमसी का वार्षिक बजट 82 हजार करोड़ रुपये से अधिक है, लेकिन इसके बावजूद नागरिक सुविधाओं के मद में खर्च और जनप्रतिनिधियों की सहूलियत के बीच संतुलन को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
छह महीने पुरानी गाड़ियों के बदलाव पर विपक्ष का कड़ा ऐतराज
विपक्षी दलों ने इस प्रस्ताव को सार्वजनिक धन और करदाताओं की गाढ़ी कमाई की सीधी फिजूलखर्ची करार दिया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि मात्र 6 महीने पहले ही बीएमसी प्रशासन ने 54 स्कॉर्पियो, 9 इनोवा और कई अन्य वाहन खरीदे थे। इतनी कम अवधि के भीतर नई और अधिक महंगी गाड़ियों की आवश्यकता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। विपक्ष का तर्क है कि जब पुरानी गाड़ियां पूरी तरह चालू स्थिति में हैं, तो नई गाड़ियों के काफिले पर करोड़ों रुपये खर्च करने का कोई तर्कसंगत औचित्य नहीं बनता।
मेयर और नेता प्रतिपक्ष के बीच तीखी बयानबाजी
इस पूरे मामले में सत्ता पक्ष की ओर से सफाई देते हुए बीएमसी की मेयर ऋतु तावड़े ने कहा कि गाड़ियों के इस बदलाव पर विपक्षी नेताओं से पूर्व में चर्चा की गई थी। उनके अनुसार, बातचीत के दौरान विपक्षी प्रतिनिधियों ने भी इस कदम पर अपनी सहमति व्यक्त की थी। मेयर ने आरोप लगाया कि विपक्ष अब इस मुद्दे पर केवल राजनीतिक लाभ उठाने के उद्देश्य से अपने पिछले बयान से पलट रहा है। उन्होंने दावा किया कि नेता प्रतिपक्ष किशोरी पेडणेकर ने स्वयं यात्रा के दौरान पीठ दर्द की शिकायत करते हुए अधिक आरामदायक गाड़ियों की जरूरत बताई थी और वे सरकारी बंगले की भी मांग कर रही हैं।
दूसरी तरफ, नेता प्रतिपक्ष किशोरी पेडणेकर ने मेयर के दावों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि रास्ते में या किसी औपचारिक बैठक से इतर हुई अनौपचारिक बातचीत को किसी प्रस्ताव पर दी गई आधिकारिक सहमति नहीं माना जा सकता। किशोरी पेडणेकर ने कहा कि 6 महीने पहले ही बड़े पैमाने पर वाहन खरीदे गए थे, ऐसे में दोबारा नई गाड़ियों की खरीद पूरी तरह से अनुचित है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी आवास की मांग एक संवैधानिक पद से जुड़ी व्यवस्था है, जिसे गाड़ियों की फिजूलखर्ची से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
एमएनएस का खिलौना कार भेंट करने का अनोखा प्रदर्शन
इस प्रशासनिक और राजनीतिक गतिरोध के बीच महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना भी आक्रामक रुख अपनाते हुए मैदान में उतर आई है। एमएनएस के कार्यकर्ताओं और नेताओं ने सत्ता पक्ष के पदाधिकारियों को खिलौना कारें भेंट करके अपना विरोध दर्ज कराने का निर्णय लिया है। पार्टी के नेता और प्रवक्ता संदीप देशपांडे ने खिलौनों की दुकान पर पहुंचकर प्रतीकात्मक रूप से खिलौना इनोवा गाड़ियां खरीदीं।
मीडिया से बातचीत करते हुए संदीप देशपांडे ने कहा कि जब सत्ता पक्ष के नेताओं को अपने सफर में आराम की इतनी अधिक चिंता है, तो उन्हें जनता के पैसे से असली इनोवा दिलाने के बजाय खिलौना इनोवा से सफर करने की आदत डालनी चाहिए। उन्होंने जानकारी दी कि दुकान में उस समय 3 खिलौना इनोवा कारें उपलब्ध थीं और 3 अन्य गाड़ियां अगले दिन मंगवाई जा रही हैं। एमएनएस का कहना है कि ये खिलौना गाड़ियां बीएमसी के पदाधिकारियों को भेजी जाएंगी ताकि मुंबई की जर्जर सड़कों और जल निकासी की अनदेखी कर अपनी सुविधाओं पर ध्यान देने वाले नेताओं को संदेश दिया जा सके।
नागरिक समस्याओं और प्राथमिकताओं पर उठते गंभीर सवाल
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब मुंबई के नागरिक बुनियादी सेवाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हाल ही में हुई बारिश के दौरान शहर के कई प्रमुख इलाके जलमग्न हो गए थे। उसी दौरान जब मेयर ऋतु तावड़े स्थिति का जायजा लेने निकली थीं, तब उनके सामने ही बीएमसी का एक कर्मचारी पानी से भरे खुले नाले में गिर गया था। इसके अतिरिक्त, बीएमसी मुख्यालय स्थित कैंटीन में छाछ के गिलास में मक्खी मिलने के बाद खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) द्वारा कैंटीन को सील करने की कार्रवाई भी हाल ही में हुई है। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि 82 हजार करोड़ रुपये से अधिक के बजट वाली संस्था में प्राथमिकताओं को लेकर गंभीर मंथन की आवश्यकता है।



















