नागरिकता और एनआरसी का मुद्दा एक बार फिर देश की सियासत के केंद्र में आ गया है। शुरुआत हुई विदेश मंत्रालय के एक बयान से, जिसमें अधिकारियों ने साफ कहा कि पासपोर्ट एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट है और यह आपके भारतीय नागरिक होने का अंतिम सबूत नहीं है। इतना कहना था कि कांग्रेस से लेकर असदुद्दीन ओवैसी तक, पूरा इंडी गठबंधन मोदी सरकार पर टूट पड़ा। विपक्ष का आरोप है कि नरेंद्र मोदी अब एनआरसी लागू करने की जमीन तैयार कर रहे हैं। ठीक इसी बीच आम लोगों के मन में भी एक सीधा सवाल कौंध रहा है, अगर आधार, वोटर आईडी और पासपोर्ट तक नागरिकता का प्रमाण नहीं माने जाते, तो फिर भारतीय होने का असली सबूत क्या है।
इमरजेंसी की बरसी के मौके पर राहुल गांधी और कांग्रेस इस पूरे मामले को सियासी हथियार बनाने में जुट गए हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि विवाद की असल जड़ कहां है और इसमें कितना सच है, कितनी सियासत।
विदेश मंत्रालय ने आखिर कहा क्या था
देश में एक बार फिर वही माहौल बनता दिख रहा है जिसमें कहा जा रहा है कि सरकार लोगों से कागज मांगेगी और न दिखा पाने वालों को बाहर का रास्ता दिखा देगी। विपक्ष की ओर से लगातार यह नैरेटिव गढ़ा जा रहा है कि देश में सिर्फ वही लोग टिक पाएंगे जो बीजेपी को वोट देते हैं, और घुसपैठियों को निकालने की आड़ में विरोधियों को देश से बाहर किया जाएगा। विपक्ष यहां तक कह रहा है कि नरेंद्र मोदी तानाशाह बनने की राह पर हैं।
यह पूरा बवाल तब भड़का जब विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने एक अहम बात कही। उन्होंने कहा कि पासपोर्ट एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट है और यह शत प्रतिशत इस बात की गारंटी नहीं देता कि व्यक्ति भारतीय नागरिक है। इसका सीधा मतलब यह है कि सिर्फ भारतीय पासपोर्ट होने भर से नागरिकता पूरी तरह साबित नहीं हो जाती। बस इसी बयान को आधार बनाकर विपक्ष ने यह माहौल बनाना शुरू कर दिया कि सरकार कोई नया सिस्टम लाने जा रही है और अब पासपोर्ट तक को खारिज किया जा रहा है।
क्या आधार और वोटर आईडी भी नागरिकता का सबूत नहीं
इंडी गठबंधन के नेता सोशल मीडिया पर लगातार दावा कर रहे हैं कि पासपोर्ट, आधार, वोटर आईडी, पैन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस, इनमें से कोई भी नागरिकता को प्रमाणित नहीं करता। तंज कसते हुए वे कह रहे हैं कि अब तो सिर्फ बीजेपी की सदस्यता ही नागरिकता साबित करेगी। इस सियासत से अलग हटकर आम लोग भी सोशल मीडिया पर कुछ जायज सवाल उठा रहे हैं।
लोगों का पूछना है कि जिस पासपोर्ट के आधार पर पूरी दुनिया किसी की नागरिकता तय करती है, उसे भारत में प्रमाण क्यों नहीं माना जा रहा। आखिर पासपोर्ट जारी करने से पहले कई दस्तावेजों की बारीकी से जांच होती है। वोटर आईडी कार्ड भी 18 साल की उम्र पूरी होने पर बनता है और भारतीय नागरिकों को ही दिया जाता है। लेकिन कानूनी नजरिए से सिर्फ उम्र का तय होना नागरिकता का अंतिम आधार नहीं माना जाता।
आधार कार्ड की बात करें तो यह पहचान का बेहद अहम सबूत जरूर है, मगर नागरिकता का प्रमाण पत्र बिल्कुल नहीं। आधार उन लोगों को भी मिल सकता है जो भारतीय नहीं हैं लेकिन भारत में रह रहे हैं। यही बात पैन कार्ड पर भी लागू होती है, जो गैर भारतीय व्यक्ति को भी जारी हो सकता है। ये तमाम बातें इंडी गठबंधन के नेता भी बखूबी जानते हैं, फिर भी वे यही दोहरा रहे हैं कि मोदी सरकार अब पासपोर्ट तक को मानने से इनकार कर रही है।
विवाद की असली शुरुआत कहां से हुई
दरअसल विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी से एक गंभीर सवाल पूछा गया था। सवाल यह था कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं, क्या वे पासपोर्ट के सहारे इस फैसले को चुनौती दे सकते हैं। इसी के जवाब में मंत्रालय की ओर से बेहद स्पष्ट बात कही गई कि पासपोर्ट एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट है और यह नागरिकता का पक्का दस्तावेज नहीं है।
यह बात अपनी जगह सही है कि विदेश जाने पर पासपोर्ट ही आपकी नेशनलिटी तय करता है और विदेश यात्रा में मददगार होता है। लेकिन इसे नागरिकता तय करने वाले आखिरी दस्तावेज के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यह जवाब सामने आते ही विपक्ष ने हंगामा खड़ा कर दिया।
ओवैसी और कपिल सिब्बल ने क्या सवाल खड़े किए
वरिष्ठ वकील और कांग्रेस के पुराने नेता कपिल सिब्बल ने सरकार से तीखा सवाल किया कि फिर आखिर देश में नागरिकता साबित करने के लिए कौन सा दस्तावेज मान्य है। इंडी गठबंधन के नेता कहने लगे कि क्या अब बीजेपी की सदस्यता का कार्ड ही वैध नागरिकता कार्ड बन गया है। विपक्ष का सवाल है कि जब इतने तरह के कार्ड बन रहे हैं, तो आखिर उनका फायदा क्या है।
टीएमसी नेता महुआ मोइत्रा ने कहा कि अब तो हिंदू और बीजेपी का वोटर होना ही भारतीय नागरिक होने का एकमात्र सबूत बन गया है। कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने भी तंज कसा कि क्या अब मोदी का चरणवंदन ही नागरिकता का प्रमाण है। कुल मिलाकर पूरा विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार पर हमलावर है।
इस विवाद में असदुद्दीन ओवैसी भी कूद पड़े। उन्होंने कहा कि 2030 तक सिर्फ बीजेपी की सदस्यता ही नागरिकता तय करेगी। ओवैसी ने दलील दी कि पासपोर्ट एक्ट में साफ लिखा है कि पासपोर्ट सिर्फ भारतीय नागरिक को ही जारी होता है। ओवैसी ने कहा, ‘जो भारतीय नागरिक नहीं है, उसे पासपोर्ट नहीं मिल सकता, तो फिर ये नया तमाशा क्या है।’
अदालतें पहले ही दे चुकी हैं फैसला
दिलचस्प बात यह है कि ओवैसी खुद कानून के बड़े जानकार और बैरिस्टर माने जाते हैं, और इंडी गठबंधन के नेता भी हाथ में संविधान लेकर घूमते रहते हैं। इसके बावजूद वे पासपोर्ट को लेकर ऐसे प्रतिक्रिया दे रहे हैं जैसे यह नियम पहली बार सामने आया हो। हकीकत यह है कि पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण न मानने का फैसला नरेंद्र मोदी ने नहीं किया है। यह बात देश की कई अदालतें पहले ही कह चुकी हैं, और वह भी उस दौर में जब केंद्र में इंडी गठबंधन की ही सरकार थी।













