राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के अपने फैसले के पीछे के रणनीतिक और सांगठनिक कारणों का विस्तार से खुलासा किया है। तृणमूल कांग्रेस और अपनी राज्यसभा सदस्यता से त्यागपत्र देने के बाद वह दोबारा भारतीय जनता पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में उच्च सदन में पहुंची हैं। उन्होंने बताया कि प्राथमिक स्तर पर अलग-अलग राजनीतिक विकल्पों पर विचार करने के बाद शीर्ष नेतृत्व के साथ हुई बातचीत ने उनके निर्णय को अंतिम रूप दिया।
राजनीतिक विकल्प और भारतीय जनता पार्टी का चयन
तृणमूल कांग्रेस से अलग होने की पृष्ठभूमि समझाते हुए सुष्मिता देव ने कहा कि उनकी स्थिति पश्चिम बंगाल में काम कर रहे अन्य नेताओं से अलग थी। वह राज्य के भीतर ज़मीनी राजनीति में सीधे तौर पर सक्रिय नहीं थीं, जिसके कारण उन्हें महसूस हुआ कि पश्चिम बंगाल के बाहर तृणमूल कांग्रेस का विस्तार करना एक कठिन चुनौती है। इस स्थिति में उन्होंने माना कि पार्टी के लिए अपने गृह राज्य से बाहर पहचान बनाना आसान नहीं था, जिससे उन्हें नए राजनीतिक मंच की तलाश करनी पड़ी।
पार्टी छोड़ने के बाद उनके पास मुख्य रूप से कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में से किसी एक को चुनने का विकल्प मौजूद था। उन्होंने पूर्वोत्तर के राज्यों में भारतीय जनता पार्टी के बढ़ते प्रभाव और जनाधार का बारीक अवलोकन किया। इस दौरान असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और गृह मंत्री अमित शाह के साथ उनकी विस्तृत चर्चा हुई। इन बातचीत से उनके सामने आगे का मार्ग स्पष्ट हो गया। उन्होंने कहा, “अगर मुझे अगले 10 से 15 साल अपने लोगों के लिए काम करना है, तो भाजपा ही सही पार्टी है।” इसके बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली पार्टी में शामिल होने का निर्णय लिया।
छात्र राजनीति की पृष्ठभूमि और पाठ्यक्रम पर वैचारिक दृष्टिकोण
सुष्मिता देव ने अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन का ज़िक्र करते हुए स्वीकार किया कि समय के साथ उनके दृष्टिकोण में बदलाव आया है। छात्र राजनीति के शुरुआती दिनों में वह एबीवीपी के विरोध में थीं और भगवा विचारधारा को लेकर उनके मन में झिझक रहती थी। हालांकि, राजनीतिक अनुभव बढ़ने के साथ ही शिक्षा प्रणाली और इतिहास के अध्ययन को लेकर उनके विचारों में नया परिप्रेक्ष्य विकसित हुआ।
पाठ्यक्रम में बदलाव से जुड़ी समकालीन बहसों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने से पहले स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को इस तरह प्रस्तुत किया जाता था कि मुख्य रूप से कांग्रेस नेताओं के योगदान को ही प्रमुखता मिले। जब विपक्षी दल यह आरोप लगाते हैं कि संघ परिवार शिक्षा प्रणाली को प्रभावित कर रहा है, तो उनका तर्क है कि गांधी परिवार ने भी जवाहरलाल नेहरू के योगदान को ही आगे बढ़ाया। उनके अनुसार एक संतुलित पाठ्यक्रम वह है जो समाज में मौजूद सभी अलग-अलग विचारधाराओं को स्थान दे। उन्होंने इस बात का उल्लेख भी किया कि इतिहास में दर्ज है कि कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने आरएसएस संस्थापक केबी हेडगेवार से शाखाओं में मुलाकात की थी, जिसे स्वीकार करने में कांग्रेस झिझकती रही है।
दलों का आंतरिक ढांचा और संगठन प्रबंधन की तुलना
विभिन्न राजनीतिक संगठनों की कार्यप्रणाली पर तुलनात्मक विचार रखते हुए सुष्मिता देव ने कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार के अंदरूनी लोकतंत्र का विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस हर चुनाव के बाद समीक्षा बैठकें आयोजित करके लोकतांत्रिक होने का संदेश देने का प्रयास करती है, लेकिन वास्तविक निर्णयों को लागू करते समय वहां आंतरिक सहमति का अभाव दिखाई देता है। वहीं तृणमूल कांग्रेस के संदर्भ में उनका मानना है कि वहां संस्थागत चर्चा के अवसर सीमित हैं और निर्णय लेने की मुख्य शक्ति पार्टी संस्थापक ममता बनर्जी के पास ही केंद्रित रहती है।
दूसरी ओर, उन्होंने इस धारणा को खारिज किया कि भारतीय जनता पार्टी में केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की ही आवाज चलती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी के सभी सांसदों के लिए एक गार्डियन मंत्री की व्यवस्था होती है, जिनके सामने राज्य से जुड़ी समस्याओं को खुलकर रखा जा सकता है। इसके अलावा सांसदों के पास संगठन और शीर्ष नेतृत्व तक सीधी पहुंच का विकल्प रहता है। उन्होंने कहा कि संघ परिवार के पास ज़मीनी स्तर पर जानकारी प्राप्त करने का सशक्त तंत्र मौजूद है। एक परिवार के प्रभुत्व वाले राजनीतिक दलों की तुलना में आरएसएस को एक बड़ा संस्थान बताते हुए उन्होंने कहा कि जहां विभिन्न दिशाओं से अलग-अलग विचार आते हैं, वह व्यवस्था किसी एक परिवार द्वारा संचालित पार्टी की तुलना में अधिक लोकतांत्रिक होती है।



















