जम्मू-कश्मीर की सियासत में एक बार फिर बड़ा घमासान शुरू हो गया है, जब मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल किया। इस प्रशासनिक और राजनीतिक बदलाव के सामने आते ही विपक्षी दलों के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। आलोचकों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार के मंत्रिमंडल विस्तार में क्षेत्रीय और धार्मिक संतुलन का पूरी तरह ध्यान नहीं रखा गया है, जिसके कारण कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं।
इस फेरबदल के बाद सबसे बड़ा मुद्दा यह बना है कि सरकार में अब जम्मू संभाग की नुमाइंदगी पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। राज्य के इतिहास में यह एक दुर्लभ स्थिति है जहां दस में से आठ जिलों से मंत्रिमंडल में कोई भी चेहरा शामिल नहीं है। इसके साथ ही मंत्रिमंडल में हिंदू मंत्रियों की संख्या भी सिमट कर केवल एक रह गई है, जिसे लेकर भारतीय जनता पार्टी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस पर तीखा हमला बोला है।
क्षेत्रीय असंतुलन और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इस पूरी प्रक्रिया को नेशनल कॉन्फ्रेंस की कथित तौर पर कश्मीर-केंद्रित राजनीति का जीवंत उदाहरण करार दिया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार ने राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माने जाने वाले जम्मू क्षेत्र की अनदेखी की है। जम्मू-कश्मीर की राजनीति में लंबे समय से यह परंपरा रही है कि दोनों प्रमुख क्षेत्रों यानी जम्मू और कश्मीर के बीच सत्ता और प्रतिनिधित्व में संतुलन कायम रखा जाए, ताकि हर वर्ग खुद को सरकार का हिस्सा महसूस कर सके।
राज्य की शीतकालीन राजधानी कहे जाने वाले जम्मू से किसी भी मंत्री का न होना स्थानीय नागरिकों और राजनीतिक जानकारों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। इसके विपरीत, ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर से दो मंत्रियों को मंत्रिमंडल में जगह दी गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि यदि सरकार चाहती तो क्षेत्रीय और धार्मिक विविधता को साधने के लिए कई अन्य सक्षम विधायकों को भी इस टीम में शामिल किया जा सकता था।
किन नेताओं के नामों पर हो रही है चर्चा
मंत्रिमंडल गठन के दौरान कई ऐसे विधायकों के नाम भी सामने आए जिन्हें यदि मौका मिलता तो तस्वीर कुछ और हो सकती थी। किश्तवाड़ जिले की इंदरवाल सीट से ताल्लुक रखने वाले नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता प्यारे लाल शर्मा को शामिल किए जाने से चिनाब घाटी को सीधा प्रतिनिधित्व मिल सकता था। उनके समर्थकों का मानना है कि वह इस इलाके के एक बेहद मजबूत और अनुभवी राजनीतिक स्तंभ हैं।
इसी तरह कठुआ जिले की बनी विधानसभा सीट से निर्दलीय विधायक रामेश्वर सिंह का नाम भी चर्चाओं के बाजार में गर्म रहा। जानकारों का तर्क है कि उन्हें मंत्रिमंडल में स्थान मिलने से कठुआ जिले और जम्मू संभाग के पहाड़ी इलाकों की आवाज मजबूती से उठाई जा सकती थी। रामबन से नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक अर्जुन सिंह राजू का नाम भी इसी फेरबदल के संदर्भ में प्रमुखता से लिया जा रहा था।
जम्मू जिले की अनदेखी और डोगरा भावनाओं का सवाल
इस पूरे विवाद के केंद्र में जम्मू जिले की स्थिति सबसे अहम बनी हुई है। जम्मू जिले के पास विधानसभा की कुल ग्यारह सीटें हैं, जो पूरे केंद्र शासित प्रदेश के किसी भी अन्य जिले के मुकाबले सबसे ज्यादा हैं। इतनी बड़ी संख्या में विधायक होने के बावजूद इस जिले से एक भी मंत्री का न होना लोगों के बीच नाराजगी की बड़ी वजह बन गया है।
स्थानीय स्तर पर इस बात की भी चर्चा है कि यह मामला सिर्फ कुछ राजनीतिक पदों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर डोगरा समुदाय की भावनाओं और अस्मिता से जुड़ा हुआ है। जम्मू विश्वविद्यालय से जुड़े एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए सवाल किया कि आखिर इतनी बड़ी आबादी और सबसे ज्यादा विधानसभा सीटों वाले जिले को सत्ता के मुख्य केंद्र से पूरी तरह कैसे अलग रखा जा सकता है।
ऐतिहासिक संदर्भ और पिछली सरकारों का रुख
राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो वर्ष 1953 के बाद से यह पहला मौका बताया जा रहा है जब जम्मू संभाग के इतने बड़े हिस्से को सरकार में कोई जगह नहीं मिली है। अतीत के उदाहरण देते हुए राजनीतिक समीक्षक बताते हैं कि बख्शी गुलाम मोहम्मद, जीएम सादिक और मीर कासिम के दौर से लेकर शेख अब्दुल्ला के कार्यकाल तक हमेशा जम्मू क्षेत्र के नेताओं को उचित स्थान दिया गया था।
फारूक अब्दुल्ला के मुख्यमंत्रित्व काल में भी जम्मू जिले से कई बड़े चेहरों को मंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसके अलावा, दो हजार दो से दो हजार आठ के दौरान मुफ्ती मोहम्मद सईद और गुलाम नबी आजाद के नेतृत्व वाली सरकारों में भी जम्मू के राजनेताओं की सक्रिय भागीदारी रही थी। दो हजार नौ से दो हजार चौदह के बीच उमर अब्दुल्ला की अपनी ही पिछली सरकार में भी शाम लाल शर्मा, रमन भल्ला, तारा चंद और अजय सधोत्रा जैसे नेता कैबिनेट का हिस्सा रहे थे।
आंतरिक असंतोष और विपक्ष का तीखा रुख
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने इस पूरे घटनाक्रम पर तीखी टिप्पणी करते हुए इसे क्षेत्रीय भेदभाव का प्रमाण बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी विशेष की नीतियां हमेशा से एक क्षेत्र विशेष तक सीमित रही हैं और वे आम जनता की चिंताओं को नजरअंदाज करती आ रही हैं।
विपक्ष के हमलों के साथ-साथ पार्टी के भीतर से भी सुगबुगाहट की खबरें सामने आ रही हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, पीर पंजाल संभाग के कुछ विधायकों के बीच भी इस बात को लेकर सुगबुगाहट है। इसके अलावा, कश्मीर के कुछ वरिष्ठ नेताओं को इस फेरबदल में जगह न मिलने के कारण आंतरिक नाराजगी की बातें भी राजनीतिक गलियारों में तैर रही हैं।























