जातीय जनगणना के संवेदनशील और राजनीतिक रूप से अहम मुद्दे पर देश की राजनीति एक बार फिर पूरी तरह गरमा गई है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए चेतावनी दी है कि पिछड़ा वर्ग अपने अधिकारों के लिए बड़े पैमाने पर लामबंद हो सकता है। नई दिल्ली में कांग्रेस पार्टी के ओबीसी विभाग द्वारा आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने हाल ही में हुए जनरेशन ज़ेड (Gen Z) के छात्र आंदोलनों का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अगर देश की विशाल ओबीसी आबादी भी युवाओं की तर्ज पर सड़कों पर उतर आई, तो सरकार के पास उनकी न्यायसंगत मांगों को स्वीकार करने के अलावा कोई अन्य रास्ता शेष नहीं रहेगा।
जनरेशन ज़ेड आंदोलनों से तुलना और ओबीसी समुदाय की ताकत
अपने विस्तृत संबोधन में राहुल गांधी ने कुछ समय पहले छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर हुए Gen Z के विरोध प्रदर्शनों का विशेष रूप से जिक्र किया। उन्होंने ध्यान दिलाया कि किस प्रकार युवाओं के संगठित और केंद्रित आंदोलन के दबाव में आकर सरकार को प्रतिक्रिया देनी पड़ी थी और कदम उठाने पड़े थे। इसी घटनाक्रम को आधार बनाते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि अगर देश का अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समाज भी अपने अधिकारों और वाजिब हिस्सेदारी के लिए उसी तरह सड़कों पर उतर आया, तो देश की स्थिति क्या होगी? कांग्रेस नेता ने तर्क दिया कि ओबीसी समुदाय की आबादी का आकार अत्यंत विशाल है। ऐसे में अगर यह समाज एकजुट होकर अपने मुद्दों को लेकर व्यापक आंदोलन की राह चुनता है, तो केंद्र सरकार पर भारी राजनीतिक दबाव बनेगा और प्रशासन को उनकी मांगों के आगे झुकना ही पड़ेगा।
शुरुआती विरोध और 'अर्बन नक्सल' जैसे आरोपों पर राहुल गांधी का दावा
राहुल गांधी ने दावा किया कि केंद्र सरकार शुरुआत में जातीय जनगणना कराने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थी। उन्होंने पुरानी घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि जब कांग्रेस और अन्य विपक्षी राजनीतिक दल जातीय गणना की मांग प्रमुखता से उठा रहे थे, तब इस मांग का समर्थन करने वालों को 'अर्बन नक्सल' तक करार दिया गया था। राहुल गांधी के अनुसार, बाद में ओबीसी आबादी के विशाल आकार और सरकारी तथा सामाजिक संस्थाओं में उनके वाजिब प्रतिनिधित्व को लेकर सामाजिक और राजनीतिक दबाव इतना बढ़ गया कि सरकार को विवश होकर आगामी जनगणना में जातीय आंकड़ों को शामिल करने का निर्णय लेना पड़ा।
गणना के तरीके पर सवाल और अलग ओबीसी कॉलम की मांग
यद्यपि सरकार ने जातीय गणना कराने की बात स्वीकार की है, लेकिन राहुल गांधी ने इसके व्यावहारिक तरीकों और नीयत पर गहरे संदेह व्यक्त किए हैं। उन्होंने सवाल खड़ा किया कि क्या यह गणना ओबीसी समाज की वास्तविक जनसंख्या और उनकी सही हिस्सेदारी को पूरी ईमानदारी से सामने ला पाएगी। राहुल गांधी ने गंभीर आरोप लगाया कि सरकार ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की गणना के लिए स्पष्ट और अलग प्रावधान रखे हैं, लेकिन ओबीसी समुदाय के लिए वैसा कोई समर्पित कॉलम नहीं बनाया गया है। उनका स्पष्ट कहना था कि केवल जातीय गणना की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि पिछड़े वर्गों की आबादी का सटीक डेटा दर्ज किया जाए। कांग्रेस लंबे समय से इस मुद्दे को सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व का मुख्य आधार मानकर केंद्र सरकार पर दबाव बनाती आ रही है।
केंद्र सरकार की समयसीमा और गृह मंत्रालय का आधिकारिक रुख
दूसरी ओर, केंद्र सरकार का रुख कांग्रेस पार्टी द्वारा लगाए जा रहे दावों से पूरी तरह अलग है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, केंद्र सरकार ने अप्रैल 2025 में ही यह आधिकारिक घोषणा कर दी थी कि 2027 में होने वाली राष्ट्रीय जनगणना में सभी समुदायों की जातीय गणना को शामिल किया जाएगा, और अगस्त 2025 में इसे औपचारिक रूप से जनगणना प्रक्रिया का हिस्सा बना लिया गया। इस संबंध में गृह मंत्रालय ने फरवरी 2026 में स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि जाति से संबंधित आंकड़े जनसंख्या गणना के दूसरे चरण में जुटाए जाएंगे। गृह मंत्रालय के मुताबिक, दूसरे चरण के प्रश्नों को पहले ही अंतिम रूप देकर अधिसूचित कर दिया जाएगा। सरकार का दावा है कि जातीय जनगणना की प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक तैयारियां सुचारू रूप से आगे बढ़ रही हैं और इसे आगामी जनगणना का प्रमुख हिस्सा बनाया जा चुका है।
भारतीय जनता पार्टी का पलटवार और गृह मंत्री अमित शाह की दलील
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और केंद्र सरकार के अधिकारियों ने कांग्रेस के दावों को खारिज करते हुए तीखा पलटवार किया है। सत्ता पक्ष का कहना है कि जनगणना 2027 में जातीय गणना शामिल करने का ऐतिहासिक फैसला मोदी सरकार ने स्वयं अपनी नीतिगत प्रतिबद्धता के तहत लिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अप्रैल 2025 में इस निर्णय का समर्थन करते हुए इसे सामाजिक समानता, संवैधानिक अधिकारों और सभी वर्गों के सशक्तीकरण के प्रति सरकार की अटूट प्रतिबद्धता बताया था। बीजेपी लगातार कांग्रेस पर आरोप लगाती रही है कि वह जातीय जनगणना के संवेदनशील मुद्दे का उपयोग केवल राजनीतिक लाभ उठाने, मतदाताओं को बांटने और चुनावी फायदे के लिए असंतोष पैदा करने के लिए कर रही है।
जनगणना 2027 से पहले गहराता राजनीतिक संघर्ष
राहुल गांधी के ताजा बयानों से यह साफ हो गया है कि आने वाले समय में जातीय जनगणना का मुद्दा कांग्रेस और बीजेपी के बीच एक बड़े सियासी संग्राम का केंद्र बना रहेगा। एक तरफ जहां कांग्रेस इसे सामाजिक न्याय, आनुपातिक प्रतिनिधित्व और जनदबाव के नजरिए से पेश कर रही है, वहीं बीजेपी इसे अपनी सरकार की प्रशासनिक उपलब्धि और सामाजिक प्रतिबद्धता के रूप में प्रस्तुत कर रही है। राहुल गांधी द्वारा 'Gen Z की राह' का हवाला दिए जाने से इस पूरी बहस में आंदोलन और जनआक्रोश का नया पहलू जुड़ गया है, जिससे 2027 की जनगणना की तैयारियों के साथ-साथ जातीय आंकड़ों पर आधारित राजनीति और अधिक तीव्र होने के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं।



















