कांग्रेस इन दिनों राजनीतिक गलियारों में अपनी बदली हुई कार्यशैली और बढ़ते उत्साह को लेकर चर्चा का केंद्र बनी हुई है। देश के विभिन्न हिस्सों में क्षेत्रीय दलों के साथ उसका पुराना तालमेल अब कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। लोकसभा चुनावों में निन्यानवे सीटें हासिल करने के बाद पार्टी का मनोबल काफी ऊंचा हुआ है और इसके साथ ही उसका राजनीतिक रुख भी अधिक मुखर हो गया है। कई राज्यों में स्थानीय स्तर के चुनाव परिणामों से भी पार्टी को अतिरिक्त ऊर्जा मिली है। सहयोगी दलों के साथ तालमेल बिठाकर चलने के बजाय पार्टी अब कई मामलों में अपनी स्वतंत्र शर्तों पर आगे बढ़ने का प्रयास करती नजर आ रही है, जिससे राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों पर असर पड़ रहा है। आने वाले समय में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह रुख और अधिक स्पष्ट होता जा रहा है।
क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल में आ दरार
दशकों से क्षेत्रीय ताकतों के साथ गठबंधन कर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने वाली कांग्रेस के तेवर अब कुछ अलग ही दिशा पकड़ रहे हैं। साल छब्बीस के दौरान देश के कई प्रमुख राज्यों में उसके पुराने सहयोगियों के साथ मतभेद खुलकर सतह पर आ गए हैं। तमिलनाडु के राजनीतिक परिदृश्य में द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम के साथ दशकों पुराना नाता कमजोर पड़ता दिखा है, जबकि अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेट्ट्रि कषगम के साथ नए समीकरण बनते नजर आए हैं। इसी तरह जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ वंदे मातरम के गायन को लेकर वैचारिक असहमति सामने आई है। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के साथ विधान परिषद चुनावों को लेकर तनातनी बढ़ गई है। इन सभी घटनाओं को एक साथ रखकर देखने पर यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह महज कुछ समय का चुनावी तनाव है या फिर कांग्रेस किसी बड़ी रणनीति के तहत अकेले अपने दम पर आगे बढ़ने की तैयारी कर रही है।
लोकसभा चुनाव के बाद बढ़ा राजनीतिक आत्मविश्वास
वर्ष चौबीस के लोकसभा चुनावों में निन्यानवे सीटें जीतने और निर्दलीय सांसद पप्पू यादव के समर्थन से कांग्रेस की कुल संख्या सौ तक पहुंचने ने पार्टी के भीतर नया जोश भर दिया है। लंबे समय से कमजोर और दिशाहीन माने जाने वाले संगठन के लिए यह परिणाम एक बड़े बदलाव की तरह आया। संसद में नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल गांधी की स्थिति भी इसके बाद काफी मजबूत हुई है और विपक्षी मोर्चे पर पार्टी की केंद्रीय भूमिका फिर से स्थापित हुई है। राहुल गांधी का यह बार-बार कहना कि वे पिछले चुनाव में हारे नहीं थे और आने वाले समय में भी बेहतर प्रदर्शन करेंगे, पार्टी कार्यकर्ताओं में लगातार उत्साह का संचार कर रहा है। कई स्थानीय चुनावों और उपचुनावों में पार्टी के अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन ने नेतृत्व को यह विश्वास दिलाया है कि अब क्षेत्रीय सहयोगियों पर अत्यधिक निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है।
राहुल गांधी की आक्रामक शैली और नई राजनीतिक ऊर्जा
राहुल गांधी इन दिनों पहले की तुलना में कहीं अधिक आक्रामक तेवर के साथ राजनीतिक मैदान में नजर आ रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार के खिलाफ उनके हमले लगातार तीखे होते जा रहे हैं। संसद के मंच से लेकर जनसभाओं और सोशल मीडिया तक उनकी भाषा शैली में एक नया आक्रामकपन दिखाई दे रहा है। विभिन्न संवाद कार्यक्रमों के माध्यम से वे सीधे तौर पर युवाओं और आम जनता से जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं। आर्थिक अनिश्चितताओं, संस्थाओं की स्वायत्तता, बेरोजगारी और महंगाई जैसे विषयों को उठाकर वे लगातार सरकार को घेर रहे हैं। कई अवसरों पर उन्होंने वर्तमान सरकार के कार्यकाल को लेकर भी तीखे बयान दिए हैं। इस आक्रामक रवैये के कारण पार्टी के भीतर भी एक नई ऊर्जा का संचार हुआ है और कार्यकर्ताओं का मानना है कि नेतृत्व अब केवल रक्षात्मक मुद्रा में रहने के बजाय सीधे मुकाबले के लिए तैयार है।
तमिलनाडु में डीएमके से दूरी और टीवीके का समर्थन
तमिलनाडु की राजनीति में कांग्रेस और डीएमके का गठबंधन कई दशकों पुराना रहा है। हालांकि आने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर यह तालमेल प्रभावित हुआ है। अभिनेता विजय के नेतृत्व वाली पार्टी तमिलगा वेट्ट्रि कषगम राज्य की एक बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में उभरी है। पूर्ण बहुमत न होने की स्थिति में कांग्रेस ने डीएमके से वर्षों पुराने संबंधों को पीछे छोड़ते हुए टीवीके के समर्थन का रास्ता चुना। इस कदम को डीएमके खेमे में एक बड़े झटके के रूप रूप में देखा गया और उन्होंने इस फैसले पर अपनी नाराजगी जताते हुए विपक्षी गठबंधन से भी दूरी बना ली। कांग्रेस का तर्क था कि यह निर्णय जनमत के सम्मान और राजनीतिक स्थिरता के लिए आवश्यक था, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे कांग्रेस की बदली हुई रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं, जहां दीर्घकालिक गठबंधनों की तुलना में वर्तमान राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता दी जा रही है।
बिहार में आरजेडी के साथ सीटों पर बढ़ा टकराव
बिहार के राजनीतिक गलियारों में कांग्रेस और आरजेडी का संबंध हमेशा से जटिल और तनावपूर्ण रहा है। पिछले विधानसभा चुनावों में दोनों ने मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन सीटों के बंटवारे और चुनावी रणनीति को लेकर आपसी खींचतान हमेशा बनी रही। अब विधान परिषद की स्नातक और शिक्षक कोटे की आठ सीटों के चुनाव को लेकर दोनों दलों के बीच एक बार फिर अनबन खुलकर सामने आ गई है। आरजेडी की ओर से छह सीटों पर एकतरफा उम्मीदवारों की घोषणा किए जाने के बाद कांग्रेस ने इसे गठबंधन के नियमों का खुला उल्लंघन करार दिया है। कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने इस स्थिति पर सवाल उठाते हुए यहां तक कह दिया कि अब गठबंधन का स्वरूप कहां बचा है। पार्टी अब सभी आठ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रही है, जिससे आपसी अविश्वास की खाई और गहरी होती दिख रही है।
जम्मू-कश्मीर में वंदे मातरम पर वैचारिक मतभेद
जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस मिलकर सरकार चला रहे हैं, लेकिन वंदे मातरम के गायन के मुद्दे पर दोनों दलों के रुख में साफ अंतर दिखाई दिया है। श्रीनगर के एक आधिकारिक कार्यक्रम के दौरान पूरे राष्ट्रगीत के गायन पर कांग्रेस ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई। पार्टी का पारंपरिक रुख यह रहा है कि सन उन्नीस सौ सैंतीस के प्रस्ताव के अनुसार केवल शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाने चाहिए। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने इस आपत्ति को अपने ऊपर किसी प्रकार का निर्णय थोपने के प्रयास के रूप में लिया। उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला की उपस्थिति में जब पूरा गीत गाया गया, तो कांग्रेस के केंद्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल ने सहयोगियों को पार्टी के स्थापित रुख का सम्मान करने की बात कही। इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्षी मोर्चे के भीतर मौजूद वैचारिक असहमतियों को एक बार फिर सतह पर ला दिया है, जिसके दीर्घकालिक परिणाम आने वाले समय में स्पष्ट होंगे।



















