पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस में चल रही उथल-पुथल और कई दिग्गज चेहरों के पार्टी से किनारा कर लेने के बाद राज्य के सियासी गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं। हर तरफ यही सवाल उठ रहा है कि क्या इन बगावत और टूट के चलते ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर अब ढलान पर है। हालांकि, इन तमाम कयासों को पूरी तरह खारिज करते हुए जाने-माने चुनावी रणनीतिकार और अतीत में मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार रह चुके प्रशांत किशोर ने बिल्कुल अलग राय रखी है। उनका मानना है कि कुछ नेताओं के चले जाने से ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत और उनका जनाधार खत्म नहीं होने वाला है।
जनता के बीच ममता की पकड़ और प्रशांत किशोर का आकलन
एक हालिया टेलीविजन साक्षात्कार के दौरान प्रशांत किशोर ने दो टूक शब्दों में कहा कि ममता बनर्जी मौजूदा समय में भी पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी और प्रभावी जननेता बनी हुई हैं। उन्होंने विस्तार से समझाया कि पिछले विधानसभा चुनावों में पराजय का सामना करने के बाद विपक्षी दल यानी भारतीय जनता पार्टी लगातार टीएमसी के नेताओं को अपने पाले में लाने का प्रयास कर रही है और पार्टी पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रही है। इसके बावजूद इन तमाम सियासी उठापटक का ममता बनर्जी के ज़मीनी जनाधार पर कोई खास नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है।
ढाई करोड़ मतदाताओं का मजबूत समर्थन
अपनी बात को आंकड़ों के जरिए समझाते हुए प्रशांत किशोर ने याद दिलाया कि लोगों को यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि आज भी ममता बनर्जी के साथ लगभग ढाई करोड़ मतदाताओं का अटूट समर्थन जुड़ा हुआ है। कुछ विधायक या सांसद किस राजनीतिक दल में जा रहे हैं, इससे आम जनता का जमीनी समर्थन अचानक भाप बनकर नहीं उड़ जाता। जब तक ममता बनर्जी स्वयं बंगाल की सक्रिय राजनीति में डटी हुई हैं, तब तक राज्य की सियासत में उनके कद का कोई दूसरा विकल्प दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता।
पार्टी के अस्तित्व पर मंडराते संकट की खबरों को नकारा
उन सभी दावों और अटकलों को भी उन्होंने सिरे से खारिज कर दिया जिनमें यह कहा जा रहा था कि तृणमूल कांग्रेस का अस्तित्व अब समाप्ति की ओर बढ़ रहा है। प्रशांत किशोर का तर्क था कि कोई भी राजनीतिक संगठन रातों-रात या एक दिन में खड़ा नहीं होता और न ही इतने कम समय में उसका वजूद पूरी तरह समाप्त हो सकता है। पार्टी की जड़ें काफी गहरी हैं।
बड़े नेताओं के जाने से कितना असर
जब साक्षात्कार के दौरान उनसे यह तीखा सवाल पूछा गया कि इतने सारे कद्दावर नेताओं के पार्टी छोड़कर जाने से क्या टीएमसी भीतर से बेहद कमजोर नहीं हो जाएगी, तो उन्होंने इसके जवाब में एक और सवाल खड़ा कर दिया। उन्होंने जानना चाहा कि आखिर बंगाल की राजनीति में ‘बड़ा नेता’ किसे माना जा रहा है। उनके विश्लेषण के अनुसार पश्चिम बंगाल की जनता किसी विधायक या सांसद के व्यक्तिगत नाम पर वोट नहीं डालती, बल्कि वे सीधे तौर पर ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के चेहरे पर अपनी मुहर लगाते हैं।
राजनीतिक दबाव और अस्तित्व की लड़ाई
प्रशांत किशोर ने इस बात की ओर भी स्पष्ट इशारा किया कि जो नेता इस समय तृणमूल कांग्रेस का साथ छोड़ रहे हैं, वे ऐसा किसी वैचारिक मतभेद के कारण नहीं बल्कि भारी राजनीतिक दबाव के चलते कर रहे हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अपनी जान और राजनीतिक वजूद बचाने के लिए इंसान किस हद तक नहीं जाता।
संघर्ष से खड़ी की गई पार्टी
ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर का बचाव करते हुए उन्होंने स्वीकार किया कि हर राजनेता की तरह उनकी भी अपनी कुछ कमियां हो सकती हैं, लेकिन इस सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता कि तृणमूल कांग्रेस को उन्होंने अपने लंबे संघर्ष, अथक मेहनत और जीवनभर की राजनीतिक पूंजी से सींचकर खड़ा किया है। यही वजह है कि कोई भी महत्वाकांक्षी नेता इतनी आसानी से इस दल पर अपना आधिपत्य या कब्जा नहीं जमा सकता।
ऋतब्रत बनर्जी का गुट और चुनाव आयोग का मामला
प्रशांत किशोर का यह बयान ऐसे संवेदनशील वक्त पर सामने आया है जब ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई वाला राजनीतिक गुट सीधे चुनाव आयोग के दरवाजे पर पहुंच चुका है और उसने तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक नाम तथा चुनाव चिन्ह पर अपना दावा ठोक दिया है। इस नए घटनाक्रम से बंगाल के राजनीतिक पारे में उबाल और अधिक तेज हो गया है। इसके बावजूद प्रशांत किशोर का साफ तौर पर यही मानना है कि संगठनात्मक मोर्चे पर चाहे कितनी भी बड़ी चुनौतियां क्यों न खड़ी हों, ममता बनर्जी का पुराना जनाधार आज भी मजबूत है और उनकी राजनीतिक भूमिका को कम आंकना विरोधियों की एक बहुत बड़ी भूल साबित होगी।



















