शिलांग में हाल ही में हुए एक विशेष सत्र के दौरान मेघालय सरकार ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि राज्य में कोयला खनन पर लगे प्रतिबंध को समाप्त करने का कोई इरादा नहीं है। इसके बजाय, प्रशासन का मुख्य ध्यान पारंपरिक और छोटे खनिकों को कानूनी रूप से वैध, वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीकों से खनन गतिविधियों से जोड़ने पर केंद्रित है। सरकार का यह बयान वॉयस ऑफ द पीपल्स पार्टी के विधायक आर्डेंट मिलर बसैयावमोइट द्वारा उठाए गए एक अल्पकालिक चर्चा प्रस्ताव के उत्तर में सामने आया है, जिसमें स्थानीय स्तर पर आ रही आर्थिक और प्रशासनिक अड़चनों पर विस्तार से बात की गई थी।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देशों और कानूनी पृष्ठभूमि
मुख्यमंत्री कॉनराड के संगमा ने चर्चा का जवाब देते हुए विस्तार से बताया कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा वर्ष 2014 में अनियंत्रित और अवैध कोयला उत्खनन पर जो रोक लगाई गई थी, उसने उन स्थानीय समुदायों की आजीविका को बुरी तरह प्रभावित किया था जो पूरी तरह इस क्षेत्र पर निर्भर थे। हालांकि, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि पर्यावरण संरक्षण और अंसगठित खनन से पैदा होने वाले खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के सिविल अपील संख्या 10720/2019 के फैसले का हवाला देते हुए रेखांकित किया कि राज्य में होने वाले हर प्रकार के कोयला उत्खनन को खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम 1957, खान अधिनियम 1952 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के नियमों का कड़ाई से पालन करना होगा।
निजी और सामुदायिक भूमि के अधिकार
संविधान की छठी अनुसूची के तहत शासित होने वाले मेघालय राज्य में निजी और सामुदायिक भूमि मालिकों के अधिकारों का विशेष उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी यहां की स्थानीय व्यवस्था को मान्यता दी है। ट्राइबल भूमि मालिक न केवल अपनी जमीन के मालिक होते हैं बल्कि उसके नीचे मौजूद खनिजों पर भी उनका अधिकार होता है। कॉनराड के संगमा ने कहा कि ऐसे भूमि मालिक निर्धारित कानूनों, नियमों और विनियामक आवश्यकताओं के अधीन पात्र व्यक्तियों को अपनी भूमि पट्टे पर दे सकते हैं ताकि वहां नियमों के दायरे में रहकर वैध खनन कार्य किया जा सके।
कानूनी खनन की दिशा में उठाए गए कदम
अनियंत्रित उत्खनन से पूरी तरह वैध और वैज्ञानिक खनन प्रणाली की तरफ बढ़ने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा 5 मार्च 2021 को एक मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी अधिसूचित की गई थी। इस नीति के तहत कोयला खनिजों के लिए प्रॉस्पेक्टिंग लाइसेंस और माइनिंग लीज प्रदान करने के लिए एक निश्चित ढांचा तैयार किया गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, केंद्रीय कोयला मंत्रालय द्वारा अब तक 30 कोयला ब्लॉकों के लिए प्रॉस्पेक्टिंग लाइसेंस और 12 ब्लॉकों के लिए माइनिंग लीज की पूर्व स्वीकृतियां जारी की जा चुकी हैं, जिनमें से तीन ब्लॉकों में वास्तविक कोयला उत्पादन का कार्य भी आरंभ हो चुका है।
छोटे खनिकों के सामने आ रही चुनौतियां
इन तमाम प्रयासों के बावजूद सरकार ने इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार किया है कि खनन पट्टा प्राप्त करने के लिए अनिवार्य रूप से 100 हेक्टेयर जमीन होने की शर्त छोटे और स्थानीय खनिकों के लिए सबसे बड़ी बाधा साबित हो रही है। अधिकांश स्थानीय लोगों के पास इतनी बड़ी भूमि जोत उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा, केंद्रीय स्तर पर विभिन्न प्राधिकरणों से अनुमतियां हासिल करने की प्रक्रिया बेहद लंबी और जटिल है। इन सभी व्यावहारिक कठिनाइयों को दूर करने के लिए राज्य सरकार ने केंद्र सरकार के समक्ष मामला पुरजोर तरीके से उठाया है ताकि छोटे खनिकों की भागीदारी को कानूनी दायरे में आसान बनाया जा सके।
समिति का गठन और प्रस्तावित सुधार
इस पूरी समस्या के समाधान के लिए केंद्रीय कोयला मंत्रालय ने एक विशेष समिति का गठन किया है, जिसमें मंत्रालय के प्रतिनिधि, सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइन इंस्टीट्यूट, खान सुरक्षा महानिदेशालय के शिलांग क्षेत्र के अधिकारी और मेघालय सरकार के नुमाइंदे शामिल हैं। इस समिति की एक महत्वपूर्ण बैठक 31 जुलाई 2026 को आयोजित की गई थी। बैठक के दौरान राज्य प्रशासन की तरफ से एमएमडीआर अधिनियम की धारा 26 के तहत कुछ विशेष शक्तियां राज्य को हस्तांतरित करने का प्रस्ताव रखा गया, जिसमें धारा 5(1) के अंतर्गत पूर्व अनुमोदन और धारा 5(2) के तहत खनन योजना की मंजूरी के अधिकार शामिल हैं।
राज्य ने न्यूनतम रियायत क्षेत्र की सीमा को घटाने, खनन गतिविधियों पर नजर रखने के लिए एक समर्पित प्रोजेक्ट मॉनिटरिग यूनिट स्थापित करने और एक स्थानीय कोयला संघ द्वारा सुझाई गई वैकल्पिक सुरक्षा-उन्मुख खनन तकनीक का परीक्षण करने का भी प्रस्ताव रखा है। समिति ने संबंधित विभागों को इन सभी प्रस्तावों की गहराई से जांच करने के निर्देश दिए हैं और इसकी अगली बैठक बहुत जल्द आयोजित होने की संभावना है। इसके अलावा, क्षेत्र के सभी प्रमुख कोयला संघों और संबंधित हितधारकों के साथ निरंतर विचार-विमर्श किया जा रहा है ताकि मौजूदा कानूनी दायरे के भीतर ही व्यावहारिक और स्वीकार्य समाधान तलाशा जा सके।
पत्थर और रेत खनन की स्थिति
पत्थर और रेत के खनन पर प्रतिबंध हटाने की मांग को लेकर सरकार ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि मेघालय में इनमें से किसी भी गतिविधि पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। वैध उत्खनन की अनुमति पूरी तरह से दी जाती है, बशर्ते इसके लिए वैध खनन पट्टा या खदान परमिट, पर्यावरण मंजूरी हो और वन, प्रदूषण नियंत्रण तथा परिवहन से जुड़े सभी नियमों का शत-प्रतिशत पालन किया जा रहा हो। पत्थर और रेत जैसे खनिज एमएमडीआर अधिनियम 1957 के तहत गौण खनिज की श्रेणी में आते हैं और राज्य में इनका नियमन मेघालय माइनर मिनरल्स कंसेशन रूल्स 2016 के माध्यम से किया जाता है। रेत उत्खनन पर नियंत्रण के लिए सस्टेनेबल सैंड माइनिंग मैनेजमेंट गाइडलाइंस 2016 और एनफोर्समेंट एंड मॉनिटरिंग गाइडलाइंस 2020 भी लागू हैं।
पर्यावरण मंजूरी और सरकारी प्रयास
हालांकि, सरकार ने यह भी माना कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था में छोटे पैमाने या पारंपरिक उत्खनन के लिए अलग से कोई प्रावधान नहीं है, जबकि पट्टा क्षेत्रों में गौण खनिजों के खनन के लिए आकार की परवाह किए बिना पर्यावरण मंजूरी अनिवार्य है। राज्य ने उपमुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली एक समिति के माध्यम से 2016 के नियमों की समीक्षा कराई थी और केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को एक प्रस्ताव भेजकर पारंपरिक पत्थर बोल्डर खनन को पूर्व पर्यावरण मंजूरी की अनिवार्यता से छूट देने का आग्रह किया था। हालांकि, पटना उच्च न्यायालय के एक फैसले के निर्देशों का हवाला देते हुए केंद्र सरकार ने उस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।
मुख्यमंत्री ने अंत में दोहराया कि सरकार छोटे खनिकों की आजीविका की रक्षा करने और कड़े पर्यावरणीय नियमों का पालन करने के बीच एक संतुलित रास्ता निकालने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। सरकार देश के सबसे बड़े पेमेंट फॉर इकोसिस्टम सर्विसेज कार्यक्रम समेत विभिन्न जल संरक्षण और पर्यावरण पहलों के माध्यम से प्राकृतिक संतुलन और सामुदायिक आजीविका के बीच एक बेहतरीन सामंजस्य स्थापित करने की दिशा में पूरी प्रतिबद्धता के साथ जुटी हुई है।



















