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मेघालय सीमा विवाद: लापांगाप के किसानों की सुरक्षा और नए ठिकानों की जांच की उठी मांगराजनीति
25 अग॰ 2026, 6:28 pm (2 घंटे पहले)· 4

मेघालय सीमा विवाद: लापांगाप के किसानों की सुरक्षा और नए ठिकानों की जांच की उठी मांग

वीक्यूपी नेता आर्डेंट मिलर बसाइवामइत ने मेघालय विधानसभा में विशेष सत्र की मांग की है। उन्होंने लापांगाप, मवासीकार और लांगपीह जैसे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में किसानों को सुरक्षा देने और नए बस्तियों की जांच करने पर जोर दिया है।

मेघालय विधानसभा में सीमावर्ती क्षेत्रों के हालातों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। वॉयस ऑफ द पीपल पार्टी (वीक्यूपी) के नेता आर्डेंट मिलर बसाइवामइत ने मंगलवार को सदन में एक विशेष प्रस्ताव लाने की पुरजोर वकालत की। उन्होंने कहा कि राज्य की सीमाओं पर जीवन बिता रहे नागरिकों को ऐसी सुरक्षा और बुनियादी सहूलियतें मिलनी चाहिए जो उनकी संप्रभुता को बनाए रखने में मददगार साबित हों।

सीमा प्रहरियों की उपेक्षा और बुनियादी सुविधाओं का संकट

बसाइवामइत का मानना है कि दूरदराज के इलाकों में सीमा के पास रहने वाले लोग केवल साधारण ग्रामीण नहीं हैं, बल्कि वे राज्य की भौगोलिक अखंडता की पहली रक्षा पंक्ति के रूप में खड़े हैं। इसके बावजूद इन इलाकों में रहने वालों को सबसे अंत में बुनियादी सेवाएं नसीब होती हैं। उन्होंने इस बात पर नाराजगी जताई कि जब सड़क, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, बिजली, पानी और संचार जैसी मूलभूत सुविधाएं अधूरी रहेंगी, तो भला कोई नागरिक सीमावर्ती इलाकों में लंबे समय तक रहने के लिए कैसे प्रेरित होगा।

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लापांगाप क्षेत्र में किसानों की परेशानियां

विशेष तौर पर लापांगाप का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने बताया कि यह इलाका एक बार फिर से तनाव का केंद्र बन गया है, जहां खेती करने के दौरान किसानों को लगातार बाधाओं और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। इसी साल मई 2026 के दौरान स्थानीय निवासियों ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उन्हें अपने खेतों में फसल उगाने से रोका जा रहा है और कृषि कार्यों के मौसम में उन्हें तंग किया जा रहा है। इन घटनाओं से क्षुब्ध होकर सैकड़ों ग्रामीण अपनी सुरक्षा की मांग को लेकर मेघालय सचिवालय तक मार्च निकालने के लिए मजबूर हो गए थे।

इसके अलावा, सीमावर्ती क्षेत्र में किसानों की कृषि झोपड़ियों को जलाए जाने और फसलों को भारी नुकसान पहुँचाए जाने की खबरें भी सामने आई हैं। इन विवादों का सीधा असर किसानों की आजीविका पर पड़ रहा है। बसाइवामइत ने इस बात पर जोर दिया कि किसानों के लिए सीमा विवाद केवल नक्शों और सरहद के खंभों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का फैसला करता है कि वे अपने खेत में जा सकेंगे या नहीं, अपनी फसल बो पाएंगे या नहीं और अपने परिवार का पेट पाल पाएंगे या नहीं।

अंतरिम व्यवस्था और किसानों की शिकायतें

जून 2026 में असम और मेघालय सरकारों के बीच एक अंतरिम समझौता हुआ था, जिसके तहत लापांगाप के कुछ चुनिंदा हिस्सों में खेती की अनुमति दी गई थी। हालांकि, किसानों की तरफ से यह शिकायतें सामने आईं कि उन्हें केवल निचले पहाड़ी तलहटी वाले क्षेत्रों तक ही सीमित रखा जा रहा है, जबकि ऊपरी पहाड़ियों पर कारबी समूहों द्वारा कब्जा कर लिया गया है। आरोप है कि स्थानीय निवासियों द्वारा वर्षों से लगाए गए पेड़ों और फसलों को भी नष्ट कर दिया गया है, जिससे किसान दो प्रशासनों के बीच पिसकर रह गए हैं।

खेती पूरी तरह से मौसम के चक्र पर निर्भर होती है और यदि कोई किसान बुवाई का सही समय चूक जाए तो उसे फसल, आमदनी, कर्ज और आजीविका के नुकसान का सामना करना पड़ता है। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने मांग की कि सीमा सुरक्षा के दायरे में कृषि भूमि तक पहुंच को भी शामिल किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि जून का समझौता केवल एक तात्कालिक उपाय हो सकता है, लेकिन यह इस सीमा विवाद का स्थायी समाधान नहीं है।

मवासीकार और लांगपीह में नई बस्तियों पर चिंता

लापांगाप के अलावा मवासीकार और लांगपीह के आसपास नई बस्तियों के उभरने की रिपोर्टों पर भी वीक्यूपी नेता ने गंभीर चिंता व्यक्त की और इनकी तत्काल जांच कराए जाने की मांग रखी। उन्होंने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि पारंपरिक भूमि धारक कौन हैं, ये नई बस्तियां कब वजूद में आईं, नए मकानों या कृषि गतिविधियों वाली भूमि का मालिकाना हक किसके पास है और क्या वहां रहने वालों के पास वैध दस्तावेज या कानूनी अधिकार हैं।

उन्होंने नए रास्तों, ढांचों और स्थायी निर्माण कार्यों की भी संयुक्त रूप से जांच कराने की आवश्यकता पर बल दिया। बसाइवामइत ने आगाह किया कि विवादित क्षेत्रों में इस तरह से बस्तियों का पैटर्न बदलना भविष्य में सीमा विवाद के रुख को पूरी तरह से प्रभावित कर सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार को यह अच्छी तरह पता है कि कोई क्षेत्र विवादित और संवेदनशील है, तो सीमा का अंतिम फैसला होने से पहले जमीन पर जनसांख्यिकी और भौतिक स्थिति को क्यों बदलने दिया जा रहा है।

Langpih की संवेदनशीलता और स्थायी समाधान की मांग

लांगपीह का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र दशकों से विवादों के घेरे में है और यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो छोटे-छोटे ठिकाने धीरे-धीरे सड़कों, घरों और प्रशासनिक ढांचे के साथ स्थायी बस्तियों का रूप ले लेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि मवासीकार, लांगपीह और लापांगाप के लोग सरकार से कोई खैरात नहीं मांग रहे हैं, बल्कि वे केवल अपनी जमीन, अपनी आजीविका और शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार की सुरक्षा चाहते हैं।

अंत में उन्होंने सरकार से मांग की कि इन सभी संवेदनशील सीमाओं पर स्थायी सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, फसल व संपत्ति के नुकसान का मुआवजा दिया जाए और जिला अधिकारियों, पुलिस तथा पारंपरिक संस्थानों को मिलाकर एक विशेष सीमा निगरानी तंत्र का गठन किया जाए।

सवाल-जवाब

मेघालय विधानसभा में सीमा सुरक्षा का मुद्दा किसने उठाया?
वीक्यूपी नेता आर्डेंट मिलर बसाइवामइत ने मेघालय विधानसभा में सीमावर्ती क्षेत्रों और किसानों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रस्ताव लाने की मांग की।
किन सीमावर्ती क्षेत्रों को लेकर चिंता जताई गई है?
लापांगाप, मवासीकार और लांगपीह जैसे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों को लेकर विशेष चिंता व्यक्त की गई है।
लापांगाप के किसानों को किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है?
किसानों को खेती के दौरान बाधाओं, उत्पीड़न, कृषि झोपड़ियों में आगजनी और फसलों के नुकसान जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
असम और मेघालय सरकारों के बीच लापांगाप को लेकर क्या समझौता हुआ था?
जून 2026 में दोनों सरकारों के बीच एक अंतरिम समझ बनी थी जिसके तहत लापांगाप के चुनिंदा हिस्सों में खेती करने की अनुमति दी गई थी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

मेघालय और असम सीमा पर लापांगाप जैसे क्षेत्रों में किसानों की आजीविका और सुरक्षा का यह संकट अंतरिम समझौतों की जमीनी विफलता को उजागर करता है। जब तक प्रशासनिक स्तर पर स्थायी समाधान और खेती के अधिकार स्पष्ट नहीं होते, तब तक किसानों का उत्पीड़न और नई बस्तियों का यह विवाद क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।

Ravikash Gupta@ravikash·1 घंटे पहले

मेघालय-असम सीमा पर लापांगाप और मवासीकार जैसे क्षेत्रों में उपजाऊ जमीनों और कृषि अधिकारों को लेकर चल रहा यह गतिरोध केवल क्षेत्रीय तनाव नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा है। जब तक किसानों को निर्बाध कृषि गतिविधियों की गारंटी और नई बस्तियों पर प्रशासनिक नियंत्रण नहीं मिलता, तब तक इस भू-राजनीतिक संघर्ष का सीधा नकारात्मक असर स्थानीय आजीविका और वित्तीय स्थिरता पर पड़ता रहेगा।

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