कर्नाटक उच्च न्यायालय में हाल ही में एक अनोखा मामला सामने आया जहां एक साधारण सी तारीख ने पूरे मुकदमे का रुख ही बदल दिया। अदालत ने एक बुजुर्ग व्यक्ति के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्रवाई को सिरे से खारिज कर दिया क्योंकि शिकायत में बताई गई घटना का दिन और हकीकत आपस में मेल नहीं खा रहे थे। इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब संबंधित बुजुर्ग ने अपने पासपोर्ट के नवीनीकरण के लिए आवेदन किया था, लेकिन पांच साल पुराने इस पेंडिंग मामले के कारण उनका पासपोर्ट रिन्यू होने से अटक गया था। इसके बाद उन्होंने राहत पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया और अपने ऊपर दर्ज केस को चुनौती दी।
अनोखी शिकायत और कुत्तों के हमले का दावा
सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि एक वकील ने बुजुर्ग व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। वकील का आरोप था कि 28 नवंबर 2021 को वह अपनी मोटरसाइकिल से अपने दफ्तर से निकलकर अदालत की कार्यवाही में हिस्सा लेने के लिए जा रहे थे। जब वे रास्ते में एक कॉफी हाउस के पास पहुंचे, तो अचानक उन पर दस गोल्डन रिट्रीवर नस्ल के कुत्तों ने एक साथ हमला कर दिया। वकील का कहना था कि इसी कुत्ते के हमले के कारण वे उस दिन अदालत में समय पर उपस्थित नहीं हो सके। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 289 के तहत बुजुर्ग के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया था और बाद में अपनी चार्जशीट भी अदालत में पेश कर दी थी।
कैलेंडर पर नजर पड़ते ही खुला सच
याचिकाकर्ता बुजुर्ग ने अदालत को बताया कि उन्हें इस पूरे मामले की कोई जानकारी ही नहीं थी और पासपोर्ट रिन्यू कराने की प्रक्रिया के दौरान ही उन्हें इस आपराधिक केस के बारे में पता चला। जब इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना के समक्ष चल रही थी, तो अचानक जज की नजर पन्ने पलट रहे कैलेंडर पर टिक गई। अदालत ने गौर किया कि जिस 28 नवंबर 2021 की तारीख का जिक्र शिकायत में किया गया था, उस दिन वास्तव में रविवार था। रविवार का दिन होने के कारण उस रोज अदालतों में कोई कामकाज नहीं होता है। यह बात सामने आते ही न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना ने शिकायतकर्ता से तीखा सवाल किया कि जब रविवार के दिन कोर्ट बंद रहते हैं, तो आखिर कोई वकील अदालत की कार्यवाही में शामिल होने के लिए क्यों जा रहा था।
पुलिस की जांच और दस्तावेजों में विरोधाभास
अदालत के इस तीखे सवाल पर शिकायतकर्ता वकील का चेहरा बिल्कुल फीका पड़ गया। इसके बाद न्यायाधीश ने मामले की जांच करने वाली पुलिस की कार्यशैली पर भी कड़े सवाल खड़े किए। अदालत ने हैरानी जताई कि आखिर पुलिस ने बिना यह जांच किए कि उस दिन कोर्ट खुली थी या बंद, इतनी जल्दबाजी में चार्जशीट कैसे दाखिल कर दी। इसके अलावा, अदालत ने पाया कि शिकायत और पुलिस की चार्जशीट के तथ्यों में भारी विरोधाभास था। शुरुआती शिकायत में जहां दस कुत्तों के हमले की बात कही गई थी, वहीं पुलिस की चार्जशीट में केवल पांच कुत्तों का ही जिक्र किया गया था। दस्तावेजों में दर्ज बयानों और घटनाओं के ब्योरे में भी काफी अंतर पाया गया।
कार्रवाई को बताया कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रही अधिवक्ता वैशाली हेगड़े ने भी इस पूरी शिकायत को बेबुनियाद और विरोधाभासी करार दिया। उन्होंने अदालत का ध्यान इस बात की ओर भी खींचा कि पुलिस ने घटना स्थल का निरीक्षण वारदात के करीब पांच महीने बाद किया था। न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना ने पुलिस की इस जांच को रहस्यमयी और अस्पष्ट करार देते हुए कहा कि इस तरह के मामलों से न्याय प्रणाली के कीमती समय और संसाधनों की बर्बादी होती है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस तरह के मामलों को आगे जारी रखना कानून की प्रक्रिया का सीधा दुरुपयोग होगा। इन तमाम तथ्यात्मक कमियों और विरोधाभासों को आधार बनाते हुए अदालत ने बुजुर्ग व्यक्ति के खिलाफ चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।





















