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कोटा निकाय चुनाव: आरक्षण के नए समीकरणों ने पलटा पूरा सियासी खेल, जानिए क्या बन रहे हैं समीकरणराजनीति
25 अग॰ 2026, 3:59 pm (2 घंटे पहले)· 1

कोटा निकाय चुनाव: आरक्षण के नए समीकरणों ने पलटा पूरा सियासी खेल, जानिए क्या बन रहे हैं समीकरण

कोटा में नगर निगम के पुनर्गठन और महापौर पद अन्य पिछड़ा वर्ग महिला के लिए आरक्षित होने से पूरा चुनावी गणित बदल गया है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने अब नए सिरे से अपनी रणनीति तैयार करने की चुनौती है।

कोटा में शहरी निकाय चुनाव का माहौल एक बार फिर पूरी तरह गरमा चुका है। इस बार का चुनावी मुकाबला सिर्फ सौ पार्षदों की जीत-हार तक सीमित नहीं है, बल्कि उस प्रतिष्ठित महापौर की कुर्सी के इर्द-गिर्द घूम रहा है, जो पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग महिला के लिए आरक्षित की गई है। प्रशासनिक परिसीमन के बाद कोटा में पहले से चले आ रहे दो अलग-अलग नगर निगमों को मिलाकर वापस एक ही नगर निगम बना दिया गया है। इसके साथ ही शहर के कुल वार्डों की संख्या डेढ़ सौ से कम होकर अब सौ पर सिमट गई है। इन बड़े प्रशासनिक बदलावों ने कोटा के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह उलट-पलट दिया है और पिछले चुनावों के सारे समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित कर दिया है।

भाजपा और कांग्रेस के सामने चेहरे की तलाश की चुनौती

महापौर पद के अन्य पिछड़ा वर्ग महिला के लिए आरक्षित होने की वजह से मैदान का पूरा खेल ही बदल चुका है। अब भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों के सामने एक ऐसा उपयुक्त चेहरा खोजने की गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है जो न केवल इस आरक्षित वर्ग से ताल्लुक रखता हो, बल्कि महिला भी हो। इसके साथ ही पार्टी के भीतर उस उम्मीदवार में चुनाव जीतने की मजबूत क्षमता होनी चाहिए, सांगठनिक स्तर पर उसकी स्वीकार्यता व्यापक हो, और वह शहर के अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों के जटिल राजनीतिक ताने-बाने को आसानी से साध सके। सबसे अहम बात यह है कि उस चेहरे में जीते हुए पार्षदों के बीच से बहुमत जुटाने और उन्हें एकजुट रखने की सांगठनिक कला होनी चाहिए। स्थानीय चर्चाओं के अनुसार दोनों ही दलों के भीतर संभावित महिला चेहरों को लेकर आंतरिक बैठकों और मंथन का दौर शुरू हो चुका है, हालांकि अभी तक किसी भी पार्टी ने अपने आधिकारिक उम्मीदवार के नाम का ऐलान नहीं किया है।

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विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से सौ वार्डों का नया गणित

कोटा उत्तर और कोटा दक्षिण को मिलाकर एक करने के बाद शहर का राजनीतिक भूगोल पूरी तरह बदल चुका है। नए बने नगर निगम क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सौ वार्डों का विधानसभावार ब्योरा बेहद दिलचस्प है। कोटा दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के हिस्से में अकेले चालीस वार्ड आते हैं। इस महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी के संदीप शर्मा विधायक हैं, जबकि कांग्रेस की तरफ से राखी गौतम एक बहुत बड़ा राजनीतिक चेहरा मानी जाती हैं। वहीं, कोटा उत्तर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत तीस वार्ड आते हैं। कोटा उत्तर में कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री शांति धारीवाल विधायक हैं, जिनका इस पूरे इलाके में खासा प्रभाव माना जाता है। इसके अलावा, इस क्षेत्र में उन भाजपा नेताओं का भी मजबूत सांगठनिक प्रभाव है जो पिछले विधानसभा चुनावों में प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे थे।

लाडपुरा और रामगंजमंडी क्षेत्रों की निगम में हिस्सेदारी

कोटा के नए नगर निगम क्षेत्र में केवल उत्तर और दक्षिण विधानसभाएं ही नहीं, बल्कि लाडपुरा और रामगंजमंडी के इलाके भी शामिल किए गए हैं। लाडपुरा विधानसभा क्षेत्र के चौबीस वार्ड इस निगम का हिस्सा हैं। यहाँ से भारतीय जनता पार्टी की कल्पना देवी विधायक हैं, जबकि विपक्षी दल कांग्रेस की तरफ से नईमुद्दीन गुड्डू जैसे दिग्गज नेता मैदान में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। इसके साथ ही, रामगंजमंडी विधानसभा क्षेत्र के छह वार्ड भी इसी नगर निगम क्षेत्र में शामिल किए गए हैं। यह क्षेत्र राजस्थान सरकार के शिक्षा मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ विधायक मदन दिलावर का गृह क्षेत्र माना जाता है, जहाँ उनका बहुत गहरा प्रभाव है। कांग्रेस पार्टी की ओर से इस इलाके में महेंद्र राजोरिया एक प्रमुख चेहरा रहे हैं। इस प्रकार सौ वार्डों वाले इस नए निकाय में सबसे बड़ी हिस्सेदारी कोटा दक्षिण विधानसभा क्षेत्र की है, जिसके चलते दक्षिण क्षेत्र के नवनिर्वाचित पार्षदों का समर्थन महापौर की कुर्सी के फैसले में निर्णायक भूमिका निभाएगा।

पिछली चुनावी बोर्ड संरचना और राजनीतिक सफर

अगर पिछले चुनावों के इतिहास पर नजर डालें तो वर्ष 2020 के निकाय चुनावों में कोटा उत्तर में कांग्रेस पार्टी ने प्रचंड प्रदर्शन करते हुए सैंतालीस वार्ड अपने नाम किए थे, जबकि भारतीय जनता पार्टी महज चौदह सीटों पर सिमट कर रह गई थी। बाकी बची सीटों पर निर्दलीय और अन्य दलों के उम्मीदवार विजयी हुए थे, जिससे कोटा उत्तर में कांग्रेस का बोर्ड बेहद आसानी से बन गया था। इसके विपरीत, कोटा दक्षिण नगर निगम में कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही छत्तीस-छत्तीस सीटें मिली थीं और आठ वार्ड निर्दलीय उम्मीदवारों के पाले में चले गए थे। कोटा दक्षिण में महापौर की असली चाबी पूरी तरह निर्दलियों के हाथों में चली गई थी, लेकिन जोड़तोड़ की उस राजनीति में भी सत्तारूढ़ कांग्रेस अपना बोर्ड बनाने में कामयाब रही थी। उस समय कांग्रेस पार्टी ने कोटा उत्तर में मंजू मेहरा और कोटा दक्षिण में राजीव अग्रवाल भारती को महापौर पद पर आसीन किया था, जबकि भारतीय जनता पार्टी की तरफ से दक्षिण में विवेक राजवंशी महापौर पद के आधिकारिक प्रत्याशी बनाए गए थे।

राजीव अग्रवाल भारती के दल-बदल से बदला सियासी माहौल

बीते पाँच वर्षों के दौरान कोटा की राजनीति में बड़े उलटफेर देखने को मिले हैं। वर्ष 2024 के घटनाक्रम में कोटा दक्षिण के तत्कालीन महापौर राजीव अग्रवाल भारती ने कांग्रेस पार्टी का दामन छोड़कर भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली। इस राजनीतिक झटके के बाद कोटा दक्षिण क्षेत्र के स्थानीय समीकरणों में एक बेहद असामान्य स्थिति पैदा हो गई। इसके तुरंत बाद, मार्च 2025 में राजस्थान की मौजूदा सरकार ने एक बड़ा प्रशासनिक निर्णय लेते हुए कोटा उत्तर और कोटा दक्षिण दोनों नगर निगमों को फिर से आपस में मिलाने और एक ही नगर निगम कोटा गठित करने की आधिकारिक घोषणा कर दी। इसी परिसीमन की प्रक्रिया के तहत कोटा में वार्डों की कुल संख्या डेढ़ सौ से घटाकर वापस सौ कर दी गई। इसके अलावा कैथून नगरपालिका और तीन ग्रामीण पंचायतों को भी इस नए विस्तारित नगर निगम क्षेत्र के दायरे में शामिल कर लिया गया।

चुनावी प्रक्रिया और पार्षदों की भूमिका

इस बार होने वाले निकाय चुनाव की सबसे खास विशेषता यह है कि महापौर का चयन सीधे आम जनता के वोटों से नहीं होगा, बल्कि जनता द्वारा चुने गए सौ पार्षदों के बीच आपसी मतदान के जरिए तय किया जाएगा। यही वजह है कि इस बार महापौर की उम्मीदवारी के साथ-साथ वार्डवार टिकट वितरण और चुनाव संपन्न होने के बाद पार्षदों की बाड़ेबंदी की राजनीति सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। दोनों प्रमुख दलों में अन्य पिछड़ा वर्ग की महिला दावेदारों को लेकर गहन मंथन जारी है। मीडिया गलियारों में कुछ पूर्व महिला पार्षदों और विभिन्न संगठनों से जुड़ी सक्रिय महिलाओं के नाम पर चर्चाएँ तैर रही हैं, लेकिन अभी तक किसी भी नाम पर अंतिम मुहर नहीं लगी है। यही कारण है कि इस बार का मुकाबला केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्षदों का समर्थन हासिल करने की रणनीति पर भी पूरी तरह निर्भर करेगा।

कोटा के राजनीतिक घटनाक्रम का पूरा घटनाक्रम

कोटा के शहरी निकाय के इतिहास पर नजर डालें तो साल 2019 में एक ही नगर निगम को प्रशासनिक रूप से दो अलग-अलग हिस्सों में विभाजित कर दिया गया था। इसके बाद साल 2020 में कोटा उत्तर और कोटा दक्षिण के लिए अलग-अलग चुनाव संपन्न कराए गए थे। वर्ष 2020 से 2025 के बीच के पूरे कार्यकाल में दोनों ही नगर निगमों में कांग्रेस पार्टी का बहुमत का बोर्ड अस्तित्व में रहा। इसके बाद साल 2024 में कोटा दक्षिण के महापौर राजीव अग्रवाल भारती ने पुरानी पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। साल 2025 में सरकार ने दोनों निगमों को दोबारा मिलाकर एक कर दिया और अब साल 2026 में सौ वार्डों के दायरे में नए सिरे से नगर निगम चुनाव होने जा रहे हैं, जिसमें महापौर का पद अन्य पिछड़ा वर्ग महिला के लिए आरक्षित कर दिया गया है।

भाजपा की सांगठनिक स्थिति और कांग्रेस की आंतरिक चुनौतियाँ

वर्तमान समय में राजस्थान राज्य में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में काबिज है और कोटा की चारों विधानसभा सीटों के राजनीतिक समीकरणों में भी भाजपा की स्थिति काफी मजबूत मानी जाती है। हालाँकि, यह बात भी स्पष्ट है कि नगर निगम का यह चुनाव किसी विधानसभा चुनाव की तरह सीधा मुकाबला नहीं होगा, बल्कि यहाँ टिकटों के सटीक वितरण, स्थानीय उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, वार्ड की विशेष जातीय बनावट, पुराने पार्षदों के कामकाज और बागी उम्मीदवारों की भूमिका बहुत बड़े कारक साबित होंगे। अपनी चुनावी तैयारियों को धार देते हुए भाजपा संगठन ने कोटा नगर निगम के चुनाव के लिए आनंद गर्ग को विशेष रूप से प्रभारी नियुक्त किया है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पार्टी ने चुनावी मशीनरी को पूरी तरह सक्रिय कर दिया है। इसके विपरीत, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के सामने इस समय अपने सांगठनिक कुनबे को एकजुट रखने की सबसे बड़ी और दोहरी चुनौती बनी हुई है, क्योंकि निकाय चुनावों के ठीक मुहाने पर खड़े होकर कोटा कांग्रेस संगठन के भीतर से लगातार इस्तीफे और आंतरिक कलह की खबरें सामने आ रही हैं।

सवाल-जवाब

कोटा नगर निगम चुनाव में इस बार सबसे बड़ा बदलाव क्या है?
इस बार दो अलग निगमों को मिलाकर एक कर दिया गया है, वार्डों की संख्या 150 से घटकर 100 हो गई है और महापौर का पद ओबीसी महिला के लिए आरक्षित किया गया है।
कोटा में महापौर का चुनाव किस तरह होगा?
महापौर का चुनाव सीधे जनता के वोट से नहीं बल्कि जनता द्वारा चुने गए 100 पार्षदों के आपसी मतदान के जरिए तय किया जाएगा।
कोटा नगर निगम क्षेत्र में कुल कितने वार्ड बनाए गए हैं?
प्रशासनिक परिसीमन और विलय के बाद कोटा नगर निगम में अब कुल 100 वार्ड हैं।
राजीव अग्रवाल भारती किस पार्टी में शामिल हुए थे?
कोटा दक्षिण के तत्कालीन महापौर राजीव अग्रवाल भारती वर्ष 2024 में कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे।
संपादकीय नीति सुधार नीति

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