अमेरिका की शीर्ष अदालत ने आगामी चुनावों से ठीक पहले मेल-इन वोटिंग यानी डाक द्वारा मतदान के नियमों में बदलाव की कोशिशों पर रोक लगा दी है। 7-2 के बहुमत से दिए गए इस फैसले में अदालत ने पोस्टल सर्विस के नए नियमों पर रोक लगाने वाले निचले अदालत के आदेश को बरकरार रखा है। इस फैसले को डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने पोस्टल नियमों में बदलाव पर लगाई रोक
शीर्ष अदालत का यह आदेश एक निचले कोर्ट द्वारा जारी किए गए प्रारंभिक स्थगन आदेश को जारी रखता है। इस आदेश के तहत यूनाइटेड स्टेट्स पोस्टल सर्विस (यूएसपीएस) को उन नए दिशानिर्देशों को लागू करने से रोक दिया गया था, जो बैलेट पेपर की डिलीवरी और पात्रता को प्रभावित करते। इस 7-2 के फैसले में रूढ़िवादी जज सैम्युअल अलीटो और क्लेरेंस थॉमस ने असहमति जताई।
प्रस्तावित नियमों के तहत, सभी राज्यों को योग्य मतदाताओं की पूरी सूची डाक सेवा यानी यूएसपीएस को सौंपनी थी। इसके बाद डाक विभाग यह जांच करता कि बैलेट पेपर केवल उन्हीं लोगों को भेजे जाएं जिनका नाम उस सूची में शामिल है। ऐतिहासिक रूप से डाक विभाग की ऐसी कोई भूमिका नहीं रही है, और न ही वह मतदाताओं की योग्यता जांचने का काम करता है।
अदालत का तर्क और समय की पाबंदी
न्यायमूर्ति केतंजी ब्राउन जैक्सन के साथ एक सहमति विचार में जज ब्रेट कावनाओ ने डाक प्रणाली पर संघीय अधिकार क्षेत्र के कानूनी पहलुओं को रेखांकित किया। कावनाओ ने टिप्पणी की कि इस बात की संभावना हो सकती है कि नियम बनाने का अधिकार पोस्टल सर्विस के पास हो, लेकिन 2026 के चुनावों में इसे लागू करना मनमाना और अनुचित होगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि मुख्य समस्या समय और प्रशासनिक तैयारी की है। राज्य और स्थानीय चुनाव अधिकारियों के पास चुनाव से पहले इतने बड़े प्रशासनिक बदलावों को ठीक से लागू करने के लिए पर्याप्त समय नहीं है। इसके अलावा, कई राज्यों में डाक द्वारा मतदान की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है, जिससे ऐन वक्त पर नियम बदलने से देश भर के मतदाताओं के लिए भारी भ्रम पैदा हो सकता था।
मार्च के कार्यकारी आदेश से सुप्रीम कोर्ट तक की कानूनी जंग
यह कानूनी विवाद इस साल की शुरुआत में तब शुरू हुआ था जब डोनाल्ड ट्रंप ने मार्च महीने में "इंस्योरिंग सिटीजनशिप वेरिफिकेशन एंड इंटीग्रिटी इन फेडरल इलेक्शंस" नाम से एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। इस आदेश में राज्यों से मांग की गई थी कि वे डाक से वोट देने वाले मतदाताओं की सूची पोस्टल सर्विस को भेजें।
इस निर्देश के तहत पोस्टल सर्विस को यह अधिकार दिया गया था कि वह उन मतदाताओं के बैलेट रोकने या खारिज करने का काम करे जिनका नाम सूची में नहीं है। इसके साथ ही बारकोड और लिफाफों के नए मानकों का पालन न करने वाले बैलेट भी रोके जा सकते थे। हालांकि, निचले संघीय न्यायालयों ने इस आदेश के अधिकांश प्रावधानों पर तुरंत रोक लगा दी थी, जिसके बाद प्रशासन ने जुलाई में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
बीते महीने शीर्ष अदालत ने वैचारिक आधार पर शुरुआती प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति दी थी, क्योंकि उस समय राज्यों द्वारा जताई गई आपत्तियों को समय से पहले माना गया था। लेकिन अंतिम सुनवाई के बाद अब अदालत ने स्पष्ट रोक बरकरार रखी है।
व्हिसलब्लोअर का खुलासा और तकनीकी खामियों की चेतावनी
कानूनी लड़ाई के बीच नए सॉफ्टवेयर पोर्टल की सुरक्षा और क्षमता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए थे। पोस्टल सर्विस के ही एक व्हिसलब्लोअर ने खुलासा किया कि नए नियमों के संचालन के लिए तैयार किया गया ऑनलाइन पोर्टल बेहद हड़बड़ी में बनाया गया था और इसमें आवश्यक तकनीकी बारीकियों का ध्यान नहीं रखा गया था।
सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने पोस्टमास्टर जनरल को लिखे एक पत्र में इस चेतावनी को उजागर किया। ब्लूमेंथल ने कहा कि व्हिसलब्लोअर के दावों से साफ है कि पोस्टल सर्विस के पास मतदान अधिकारों की सुरक्षा करते हुए इन प्रावधानों को लागू करने की तकनीकी क्षमता नहीं है। उन्होंने कहा कि चेतावनी के बावजूद प्रशासन इस त्रुटिपूर्ण योजना को आगे बढ़ाने पर अड़ा हुआ था।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और फैसले का असर
यह निर्णय डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ा कानूनी झटका है, जो लंबे समय से बिना सबूतों के मेल-इन वोटिंग पर चुनाव में धांधली के आरोप लगाते रहे हैं। शीर्ष अदालत का यह फैसला चुनावी विश्वसनीयता को लेकर जारी लंबी कानूनी बहस का नया पड़ाव है।
फैसले के बाद नेवादा के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट सिस्को एगुइलर ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि डोनाल्ड ट्रंप चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश में हार गए हैं और अमेरिकी जनता की जीत हुई है। उन्होंने कहा कि चुनाव जनता के हैं और राज्य के अधिकारी निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। दूसरी ओर, इस फैसले पर व्हाइट हाउस या पोस्टल सर्विस की ओर से तुरंत कोई बयान जारी नहीं किया गया।



















