राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भीतर जारी संगठनात्मक विवाद एक बार फिर खुलकर सामने आ गया है, जहां पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुनेत्रा पवार के निर्वाचन को सीधी कानूनी चुनौती दी गई है। वरिष्ठ पार्टी नेता सच्चिदानंद सिंह के अधिवक्ता ने 17 अगस्त को सुनेत्रा पवार, राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल और पार्टी महासचिव बृजमोहन श्रीवास्तव को एक औपचारिक विधिक नोटिस प्रेषित किया है। इस नोटिस में चेतावनी दी गई है कि यदि 9 जुलाई को प्रेषित पूर्व नोटिस की मांगों को 15 दिनों के भीतर पूरा नहीं किया गया, तो भारत निर्वाचन आयोग और न्यायालय का रुख कर 26 फरवरी को संपन्न हुए संगठनात्मक चुनावों को पूरी तरह अमान्य घोषित कराने की कार्रवाई की जाएगी।
चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर सवाल और 15 दिनों की अंतिम चेतावनी
नोटिस में दावा किया गया है कि इस वर्ष 26 फरवरी को आयोजित किए गए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के संगठनात्मक चुनाव पूरी तरह से गैर-कानूनी और पार्टी के स्थापित विधान के विपरीत थे। सच्चिदानंद सिंह के कानूनी प्रतिनिधि द्वारा प्रेषित इस नए दस्तावेज में स्पष्ट किया गया है कि पार्टी नेतृत्व के समक्ष 9 जुलाई को पहला नोटिस भेजा गया था, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब 17 अगस्त के नोटिस के माध्यम से 15 दिनों की अंतिम समयावधि प्रदान की जा रही है। तय समय सीमा में मांगें न माने जाने की स्थिति में मामले को चुनाव आयोग और सक्षम अदालत के समक्ष ले जाकर 26 फरवरी के चुनावी नतीजों को रद्द कराने की मांग की जाएगी।
नोटिस में उठाए गए चार प्रमुख संवैधानिक और प्रशासनिक बिंदु
वरिष्ठ नेता की ओर से जारी कानूनी नोटिस में मुख्य रूप से चार गंभीर अनियमितताओं को रेखांकित किया गया है, जो इस प्रकार हैं
- केंद्रीय निर्वाचन प्राधिकरण का अभाव: आरोप लगाया गया है कि 26 फरवरी को हुए चुनाव के संचालन के लिए पार्टी के संविधान के तहत किसी आधिकारिक केंद्रीय निर्वाचन प्राधिकरण या मुख्य निर्वाचन अधिकारी की नियुक्ति ही नहीं की गई थी।
- नेताओं को अवसर से वंचित रखना: राष्ट्रीय स्तर के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं को चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने, नामांकन पत्र दाखिल करने अथवा मतदान करने का कोई मौका नहीं प्रदान किया गया।
- दस्तावेजों को वापस लेने की मांग: 26 फरवरी के चुनाव से संबंधित जितने भी पत्र और दस्तावेज निर्वाचन आयोग को 28 फरवरी, 10 मार्च तथा 29 अप्रैल को सौंपे गए थे, उन सभी को तुरंत प्रभाव से वापस लेने की मांग की गई है।
- नए सिरे से चुनाव की मांग: पदाधिकारियों की हाल में जारी ‘संशोधित अंतिम सूची’ को पूरी तरह खारिज करते हुए पार्टी संविधान के नियमों के अनुरूप निष्पक्ष रूप से पुन: चुनाव कराने का आग्रह किया गया है।
सुप्रिया सुले की तीखी प्रतिक्रिया: इसे बताया नैतिक और संवैधानिक संघर्ष
पार्टी के भीतर उभरे इस नए विवाद के बीच एनसीपी (शरदचंद्र पवार) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने भी मोर्चा खोल दिया है। मुंबई में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए सुप्रिया सुले ने विरोधी गुट के खिलाफ जारी कानूनी लड़ाई को एक नैतिक और संवैधानिक संग्राम करार दिया। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई किसी व्यक्तिगत स्वार्थ या व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं है, बल्कि देश के स्थापित कानूनों और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा निर्मित संविधान के सिद्धांतों की रक्षा के लिए लड़ी जा रही है।
सुप्रिया सुले ने चुनाव आयोग द्वारा सुनेत्रा पवार गुट को पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न आवंटित करने के निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए विश्वास जताया कि यह आदेश अदालत की सुनवाई में निरस्त हो जाएगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पार्टी के संस्थापक शरद पवार के साथ घोर अन्याय हुआ है और कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों की नजर में असली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष केवल शरद पवार ही हैं।
पार्टी का पलटवार और नेतृत्व संघर्ष की पृष्ठभूमि
कानूनी नोटिस और आरोपों पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ता उमेश पाटिल ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उमेश पाटिल ने स्पष्ट किया कि सच्चिदानंद सिंह वर्तमान में पार्टी के किसी भी पद या जिम्मेदारी पर कार्यरत नहीं हैं। प्रवक्ता ने कहा, "हमें जो भी कानूनी या प्रशासनिक जवाब देना होगा, वह हम सीधे निर्वाचन आयोग के सामने रखेंगे।" इसके साथ ही पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल ने भी स्थिति साफ करते हुए कहा था कि पार्टी के भीतर कोई मतभेद नहीं है और इस प्रकार के नोटिस का कोई संवैधानिक या विधिक औचित्य नहीं बनता।
गौरतलब है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भीतर कमान और शीर्ष नेतृत्व को लेकर यह खींचतान इस साल की शुरुआत से ही जारी है। इसी वर्ष जनवरी में हुए एक दुखद विमान हादसे में पार्टी प्रमुख और महाराष्ट्र के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री अजित पवार का असमयिक निधन हो गया था। अजित पवार के निधन के बाद से ही पार्टी के विभिन्न गुटों के बीच नेतृत्व हथियाने और सांगठनिक नियंत्रण स्थापित करने को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है।



















