भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष बनने के सात महीने के लंबे इंतजार के बाद अब नितिन नवीन की नई टीम की घोषणा कर दी गई है। इस नई टीम के गठन को लेकर राजनीतिक हलकों में खासी चर्चा हो रही है, क्योंकि इसमें अनुभव और युवा जोश का अनूठा संतुलन साधने का प्रयास किया गया है। पार्टी ने अनुभवी दिग्गजों के साथ-साथ युवाओं को भी संगठन में महत्वपूर्ण पद सौंपे हैं, हालांकि इसे केवल 'नवीन' कहना पूरी तरह उचित नहीं होगा क्योंकि इसमें पार्टी के पुराने और मंजे हुए चेहरों को भी बराबर की जगह दी गई है।
अनुभवी चेहरों की वापसी और चुनावी राज्यों पर खास फोकस
इस नई टीम में सबसे बड़ा और चर्चित नाम वसुंधरा राजे सिंधिया का है, जो राजस्थान की दो बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। वसुंधरा राजे को चुनाव प्रबंधन और चुनावी समर में तालमेल बिठाने का गहरा अनुभव हासिल है। उनके अलावा केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को भी टीम में बड़ा स्थान मिला है। गोयल चुनावी रणनीति के माहिर माने जाते हैं और उन्हें पूरे 12 साल के लंबे अंतराल के बाद दोबारा पार्टी का कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। किसी भी बड़े राजनीतिक दल के लिए चुनाव के दौरान कोषाध्यक्ष का पद बेहद संवेदनशील और निर्णायक होता है। यह पूरी फेरबदल आगामी तीन वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को पूरी तरह ध्यान में रखकर की गई है।
सुनील बंसल और अन्य नेताओं को मिली राष्ट्रीय जिम्मेदारी
भाजपा के इस संगठनात्मक बदलाव से कई बड़े राजनीतिक संदेश साफ तौर पर निकलते हैं। पहला संकेत यह है कि जिन नेताओं ने अलग-अलग राज्यों में पार्टी को अपने दम पर चुनाव जिताकर दिखाया है, अब उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर कमान सौंपी गई है। इस फेहरिस्त में सुनील बंसल, विप्लव देब और विनोद तावड़े जैसे नाम सबसे आगे हैं। दूसरा अहम बदलाव सोशल मीडिया के मोर्चे पर देखने को मिला है। पार्टी ने अपने सोशल मीडिया विंग को पूरी तरह से रीवैंप यानी आधुनिक स्वरूप देते हुए नए जमाने के युवाओं को इसकी कमान सौंपी है। आज के समय में किसी भी राजनीतिक जंग का आगाज होने से पहले सोशल मीडिया पर वर्चुअल युद्ध छिड़ जाता है, और भाजपा इस मोर्चे पर थोड़ा पिछड़ती हुई नजर आ रही थी, जिसकी भरपाई अब नए और ऊर्जावान चेहरों के जरिए की जा रही है।
दूसरे दलों से आए नेताओं को खुला मंच
संगठन में एक बड़ा बदलाव यह भी देखने को मिला है कि अन्य राजनीतिक दलों से आए नेताओं को भी अब संगठन के भीतर मुख्यधारा की जिम्मेदारियां दी जाने लगी हैं। कांग्रेस पार्टी का दामन छोड़कर भाजपा में शामिल हुए अनिल एंटनी, रोहण गुप्ता, मनप्रीत सिंह बादल और आम आदमी पार्टी छोड़कर आए संदीप पाठक जैसे नेताओं को संगठन में पद सौंपे जाने से यह स्पष्ट हो गया है कि अब पार्टी के दरवाजे दूसरे दलों से आने वाले योग्य लोगों के लिए पूरी तरह बंद नहीं हैं। इसके अलावा, एक और उल्लेखनीय बात यह है कि पिछले दौर की तुलना में युवा नेताओं और महिलाओं को पार्टी ढांचे में अपेक्षाकृत अधिक बड़ी जिम्मेदारियां दी गई हैं। पिछले 12 वर्षों से नरेंद्र मोदी की सरकार का मुख्य फोकस हमेशा से महिलाओं और युवाओं के सशक्तिकरण पर रहा है, और अब उसकी एक साफ झलक पार्टी संगठन के भीतर भी दिखाई देने लगी है।
शहरी और वैचारिक मोर्चे पर 'दिमागी नक्सल' की बहस
राजनीतिक गलियारों में इन दिनों 'दिमागी नक्सल' शब्द को लेकर भी जबरदस्त घमासान मचा हुआ है। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने सार्वजनिक तौर पर यह बयान दिया है कि उन्हें 'दिमागी नक्सल' होने पर गर्व है। इसके अलावा, जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जैसे विपक्षी नेता भी खुद को इसी श्रेणी में बता चुके हैं। अब स्थिति यह हो गई है कि विपक्ष के तमाम बड़े नेता 'दिमागी नक्सल' शब्द का इस्तेमाल एक तमगे की तरह कर रहे हैं और इसके जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगातार घेरने की कोशिश में जुटे हुए हैं।
लाल किले से पीएम मोदी की चेतावनी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से अपने संबोधन में देश को आगाह करते हुए कहा था कि कुछ दिमागी नक्सली देश को अराजकता की आग में झोंकने की साजिश रच रहे हैं और वे हमेशा किसी ना किसी मौके की तलाश में रहते हैं। प्रधानमंत्री ने देशवासियों से इन दिमागी नक्सलियों के प्रति पूरी तरह सतर्क और सावधान रहने की अपील की थी। जंगल में सक्रिय रहने वाले नक्सलियों और शहरों में बैठकर वैचारिक रूप से सक्रिय नक्सलियों के तौर-तरीकों में एक बुनियादी अंतर होता है।
जंगली और शहरी नक्सलियों के काम करने का तरीका
जंगल वाला नक्सली अपनी बात मनवाने के लिए बम, बारूद और बंदूक के बल पर हिंसा और अराजकता फैलाता है, जबकि शहर वाला नक्सली आधुनिक टूल्स का इस्तेमाल करके अपने दिमाग के बल पर वैचारिक दंगे और मतभेद पैदा करता है। जंगल का नक्सली बैलट यानी मतपत्र के स्थान पर बंदूक के सहारे सरकारें और सत्ता बदलने की कोशिश में जुटा रहा, लेकिन वह कभी सफल नहीं हो पाया। इसके विपरीत, अब ये दिमागी नक्सली ईवीएम के बजाय सड़कों पर उथल-पुथल और दंगा-फसाद करवाकर सरकारें पलटने का नापाक सपना देखते हैं।
संस्थानों को बदनाम करने की साजिश
ये तथाकथित दिमागी नक्सली अपनी वैचारिक असहमतियों की आड़ में दूसरों को अपमानित करने का खुद को लाइसेंस प्राप्त मानते हैं। ये लोग संविधान का मुखौटा पहनकर संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग और मीडिया जैसी देश की हर प्रतिष्ठित संस्था को सुनियोजित तरीके से बदनाम करने में अपना दिमाग खपाते रहते हैं। हकीकत में ऐसे लोग समाज के किसी भी व्यक्ति का सम्मान नहीं करते। समाज जिस भी शख्स को अपनी मेहनत के बल पर हीरो मानता है, उसकी साफ-सुथरी छवि को धूमिल करने में ये अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं। इस तरह के लोग अब हर राजनीतिक दल के भीतर भी अपनी पैठ बना चुके हैं, और यही वजह है कि हर राजनीतिक दल को ऐसे तत्वों पर पैनी नजर रखने की जरूरत है। देश किसी भी कीमत पर इन दिमागी नक्सलियों को इस बात की अनुमति नहीं दे सकता कि वे हमारे किसी भी शहर को एक बार फिर जंगल में तब्दील कर दें।
वंदे मातरम् के अपमान का नया विवाद
स्वतंत्रता दिवस के पावन पर्व पर राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के कथित अपमान का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है, जिससे कांग्रेस नेताओं सोनिया गांधी और राहुल गांधी की मुश्किलें आने वाले दिनों में काफी बढ़ सकती हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों यानी दिल्ली, भुवनेश्वर, मंगलुरू और मुंबई के थानों में पुलिस के पास सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ औपचारिक शिकायतें दर्ज कराई गई हैं। इन शिकायतों में मांग की गई है कि दोनों नेताओं के खिलाफ देश के नए कानूनों के प्रावधानों के मुताबिक राष्ट्रगीत के अपमान का आपराधिक मामला दर्ज किया जाना चाहिए। फिलहाल स्थानीय पुलिस इन सभी शिकायतों की गहराई से जांच-पड़ताल कर रही है।
कांग्रेस दफ्तर की घटना और कैमरे में कैद इशारे
यह पूरा विवाद 15 अगस्त के दिन उस समय शुरू हुआ जब दिल्ली स्थित कांग्रेस पार्टी के मुख्य कार्यालय में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान राष्ट्रगीत वंदे मातरम् गाया जा रहा था। इसी दौरान सोनिया गांधी अपने आस-पास खड़े लोगों को कुछ खास इशारे करती हुई कैमरे में साफ दिखाई दीं। आरोप लगाया गया कि सोनिया गांधी ने जानबूझकर राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को बीच में ही रोकने की कोशिश की थी। उनके साथ-साथ राहुल गांधी भी इस दौरान कुछ कहते हुए नजर आए। जब इस घटना के वीडियो फुटेज सोशल मीडिया पर सार्वजनिक हुए, तो भाजपा के तमाम दिग्गज नेताओं ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर तीखे राजनीतिक हमले शुरू कर दिए। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कड़े शब्दों में कहा कि वंदे मातरम् जैसे राष्ट्रीय गौरव के अपमान के लिए सोनिया गांधी को पूरे देश से बिना शर्त माफी मांगनी चाहिए।
कांग्रेस की सफाई और बचाव के तरीके
दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी की ओर से इस मामले में सफाई देते हुए कहा गया कि सोनिया गांधी के ठीक बगल में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे खड़े हुए थे। खरगे की उम्र काफी ज्यादा है और उन्हें इतनी लंबी समयावधि तक लगातार खड़े रहने में शारीरिक परेशानी महसूस हो रही थी, इसलिए सोनिया गांधी असल में उनके बैठने के लिए कुर्सी मंगवाने की बात कह रही थीं। कांग्रेस का तर्क है कि इस पूरी स्थिति का राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के अपमान से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है।
गांधी परिवार की दो बड़ी राजनीतिक गलतियां
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पिछले एक हफ्ते के भीतर गांधी परिवार से दो बड़ी रणनीतिक चूक हुईं। पहली गलती यह थी कि राहुल गांधी ने एक सार्वजनिक मंच से स्टैंड-अप कॉमेडी जैसा अंदाज अपनाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेशी नेताओं के साथ गर्मजोशी से गले मिलने के तरीके का मजाक उड़ाया था, और इसी दौरान उन्होंने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी का नाम भी इसमें घसीट लिया था। इस तरह की हरकतों की भरपाई या डैमेज कंट्रोल दुनिया की कोई भी बड़ी पीआर एजेंसी नहीं कर सकती।
सोनिया गांधी का आपा खोना और असहज स्थिति
दूसरी बड़ी गलती तब हुई जब सोनिया गांधी ने वंदे मातरम् का चौथा छंद गाए जाने और उसमें मां दुर्गा का नाम आने के ठीक वक्त पर अचानक अपना आपा खो दिया। कैमरों के सामने सोनिया गांधी का इस तरह राष्ट्रगीत को बीच में रोकने का इशारा करना और कांग्रेस अध्यक्ष को टोकना उनकी वर्षों से गढ़ी गई राजनीतिक छवि को भारी नुकसान पहुंचा गया। इसके बाद जब पार्टी नेताओं जयराम रमेश और पवन खेड़ा ने इस पूरे प्रकरण पर पर्दा डालने की कोशिश की, तो स्थिति और भी ज्यादा बिगड़ गई।
बहानेबाजी और वंदे मातरम् से बेचैनी
किसी नेता ने यह दलील दी कि सोनिया जी दरअसल मल्लिकार्जुन खरगे के लिए कुर्सी मांग रही थीं, तो किसी अन्य नेता ने रविंद्रनाथ टैगोर का हवाला देते हुए यह तर्क दे डाला कि कांग्रेस पार्टी को तो राष्ट्रगीत के केवल शुरुआती दो छंद ही गाने चाहिए। लेकिन इस तरह के तर्क देने वाले खुद भी अच्छी तरह जानते हैं कि ये सब केवल सियासी बहानेबाजी के सिवा कुछ नहीं है। सवाल यह है कि सत्ता में रहते हुए और सत्ता से बाहर रहने के दौरान भी जिन सोनिया गांधी ने कभी अपनी शालीनता नहीं छोड़ी, आखिर उन्हें वंदे मातरम् ने इस हद तक बेचैन क्यों कर दिया? इस सवाल का जवाब तलाशना और इसे समझना आज के राजनीतिक परिदृश्य में बेहद मुश्किल काम बन गया है। इस पूरे घटनाक्रम और राजनीतिक विश्लेषण से जुड़े हर पहलू को गहराई से समझने के लिए आज की बात कार्यक्रम के तहत प्रसारित होने वाले शो को देखा जा सकता है।



















