कांग्रेस सांसद राहुल गांधी देश भर के युवाओं, छात्रों और शिक्षा से जुड़ी चिंताओं को मुखरता से उठाने के लिए जाने जाते हैं। वह अक्सर अलग-अलग परिसरों का दौरा करते हैं और छात्रों की गूंज जैसे विशेष आयोजनों के जरिए युवाओं से सीधे संवाद स्थापित करते हैं। हालांकि इन आयोजनों के दौरान परिसरों में उमड़ने वाली भारी भीड़ और चुनावी मतपेटियों में पड़ने वाले वोटों के बीच एक बड़ा अंतर देखने को मिलता है। ओडिशा राज्य में हाल ही में संपन्न हुए छात्रसंघ चुनावों के नतीजे इस बात की तस्दीक करते हैं, जहां कांग्रेस के अधिकृत छात्र संगठन नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया यानी एनएसयूआई का प्रदर्शन बेहद फीका और निराशाजनक रहा है।
लंबे अंतराल के बाद चुनावों की वापसी और राजनीतिक दलों का प्रभाव
पूर्वी राज्य ओडिशा में 15 अक्टूबर को कुल 346 कॉलेजों और 13 यूनिवर्सिटीज़ में छात्रसंघ के लिए मतदान संपन्न हुआ था। दिलचस्प बात यह है कि इस राज्य में इससे पहले आखिरी बार छात्रसंघ चुनाव साल 2017 में आयोजित किए गए थे, जिसका मतलब है कि पूरे आठ साल के एक लंबे अंतराल के बाद परिसरों में छात्र राजनीति की औपचारिक रूप से वापसी हुई है। हालांकि ये चुनाव तकनीकी रूप से सीधे राजनीतिक दलों के बैनर तले नहीं लड़े जाते हैं, लेकिन इसके बावजूद राज्य के तमाम बड़े राजनीतिक दल अपने-अपने वैचारिक रूप से समर्थित संगठनों और उम्मीदवारों की जीत के लिए पूरी ताकत झोंक देते हैं। इस बार के इन चुनावों में मुख्य मुकाबला मुख्य रूप से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और बीजू जनता दल की छात्र इकाई के बीच ही सिमटा नजर आया।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का शानदार प्रदर्शन
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से वैचारिक रूप से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने इस चुनाव में अपनी ताकत का जोरदार अहसास कराया है। एबीवीपी की ओडिशा इकाई की सचिव दीप्तिमयी प्रतिहारी ने मीडिया के सामने आंकड़े रखते हुए दावा किया कि उनके संगठन ने राज्य कुल 13 विश्वविद्यालयों में से अकेले 8 पर शानदार जीत हासिल की है। संगठनात्मक दावों के मुताबिक एबीवीपी के पाले में अध्यक्ष पद के लिए 8, उपाध्यक्ष पद के लिए 8, सचिव पद के लिए 10 और सहायक महासचिव पद के लिए 11 सीटें आई हैं। इसके अलावा भुवनेश्वर स्थित प्रतिष्ठित उत्कल यूनिवर्सिटी में संगठन ने अपने पूरे पैनल के साथ क्लीन स्वीप किया है, जबकि कटक के रेवेनशॉ विश्वविद्यालय में भी अध्यक्ष पद को छोड़कर बाकी सभी महत्वपूर्ण पदों पर एबीवीपी के प्रत्याशियों ने कब्जा जमाया है।
बीजू जनता दल और एनएसयूआई के अपने दावे
दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी दल बीजू जनता दल की छात्र शाखा बीजू छात्र जनता दल ने भी इन चुनावों में अपना परचम फहराने का दावा किया है। बीसीजेडी की प्रमुख इप्सिता साहू का कहना है कि उनके संगठन ने राज्य भर के कॉलेज छात्रसंघों की कुल 55 से 60 प्रतिशत सीटों पर जीत हासिल की है। बीसीजेडी की ओर से यह भी बताया गया कि उन्होंने रमा देवी महिला विश्वविद्यालय और रेवेनशॉ यूनिवर्सिटी जैसे कई प्रमुख शिक्षण संस्थानों में जीत का स्वाद चखा है। संगठन का यह भी दावा है कि प्रदेश के अधिकांश महिला महाविद्यालयों में भी बीजेडी समर्थित छात्र नेताओं को ही भारी सफलता मिली है। वहीं कांग्रेस के खाते में आई निराशा के बीच एनएसयूआई ने अपनी ओर से सफाई देते हुए दावा किया कि उसके उम्मीदवारों ने कम से कम 30 विभिन्न कॉलेजों में अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की है, जबकि लगभग 80 अन्य संस्थानों में वे दूसरे स्थान पर रहे हैं।
शीर्ष नेताओं की प्रतिक्रियाएं और राजनीतिक मायने
इन चुनावी परिणामों के सामने आने के बाद देश के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व की तरफ से तीखी और अहम प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। देश के केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक आधिकारिक पोस्ट के जरिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को इस शानदार सफलता पर बधाई दी और इसे राष्ट्र-विरोधी ताकतों को दिया गया एक करारा जवाब करार दिया। अमित शाह ने अपने संदेश में कहा कि पंजाब यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी के बाद अब ओडिशा में एबीवीपी की यह जीत इस बात का स्पष्ट संदेश देती है कि देश का युवा वर्ग पूरी तरह से राष्ट्र प्रथम की विचारधारा के साथ खड़ा है। उन्होंने अपने बयान में उन वैचारिक ताकतों पर भी कटाक्ष किया जिन पर समाज में भ्रम, झूठ और अराजकता फैलाने का आरोप लगाया जाता है।
इसी कड़ी में ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने भी एबीवीपी की इन जीतों को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति युवाओं के अटूट भरोसे का एक बड़ा प्रमाण बताया है। मुख्यमंत्री का मानना है कि ये चुनाव परिणाम मौजूदा दौर के युवाओं यानी Gen Z के असली राजनीतिक रुझान और मूड को दर्शाते हैं। भले ही राहुल गांधी देश भर के युवाओं को अपने पाले में खींचने के लिए कई तरह के जतन कर रहे हों, लेकिन मैदानी स्तर के ये चुनावी आंकड़े दिखाते हैं कि ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। आठ साल बाद हुई इन चुनावों की वापसी ने यह साफ कर दिया है कि ओडिशा के युवा परिसरों में वैचारिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण किस दिशा में आगे बढ़ रहा है।























