राष्ट्रीय राजधानी में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है क्योंकि दिल्ली पुलिस ने कांग्रेस को आगामी 1 नवंबर को ऐतिहासिक रामलीला मैदान में एक बड़ी राजनीतिक रैली आयोजित करने की औपचारिक अनुमति प्रदान कर दी है। इस सिलसिले में पुलिस विभाग की ओर से जरूरी नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट यानी एनओसी भी जारी किया जा चुका है, जिसकी पुष्टि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने शनिवार को मीडिया को दी। इस आयोजन को लेकर प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां शुरू हो गई हैं ताकि कानून और व्यवस्था की स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में रहे।
पुलिस और प्रशासन के बीच समन्वय
इस पूरे कार्यक्रम को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए पुलिस उपायुक्त मध्य रोहित राजबीर सिंह ने स्पष्ट किया कि इंडियन नेशनल कांग्रेस ने तय स्थान पर जनसभा करने के लिए आवेदन किया था। रोहित राजबीर सिंह ने कहा, "इंडियन नेशनल कांग्रेस ने 1 नवंबर को रामलीला मैदान में एक रैली करने की योजना बनाई है और इसके लिए दिल्ली पुलिस से जरूरी एनओसी मांगी थी।" प्रशासनिक व्यवस्थाओं को पुख्ता रखने के लिए 25 अक्टूबर से 3 नवंबर तक की समय अवधि के लिए यह अनुमति दी गई है। इसके अलावा ट्रैफिक व्यवस्था को दुरुस्त रखने और किसी भी प्रकार की बाधा को टालने के लिए ट्रैफिक पुलिस और अन्य संबंधित एजेंसियां लगातार आयोजकों के संपर्क में बनी हुई हैं।
INDIA ब्लॉक की बैठक और SIR विवाद की पृष्ठभूमि
यह पूरा घटनाक्रम विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक की हालिया महत्वपूर्ण बैठक के बाद सामने आया है जिसमें कई अहम मुद्दों पर गहन मंथन किया गया था। बीते 30 सितंबर को विपक्षी दलों ने एक साझा कार्य योजना तैयार की थी जिसके तहत देश भर में रैलियां और लोकतंत्र बचाओ मार्च निकाले जाने का निर्णय लिया गया था। गठबंधन की इस बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु एसआईआर विवाद था। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बैठक के दौरान इस बात पर जोर दिया था कि तमाम विपक्षी दल इस बात पर पूरी तरह एकजुट हैं कि आगामी चुनाव इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के बजाय पारंपरिक बैलेट पेपर के माध्यम से ही कराए जाने चाहिए।
चुनाव आयोग का रुख और प्रशासनिक स्पष्टीकरण
विपक्षी दलों द्वारा उठाए जा रहे इन तमाम सवालों और एसआईआर प्रक्रिया के विवाद की शुरुआत एक मीडिया रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद हुई थी। उस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों के दौरान इस प्रक्रिया से जुड़े कई फैसलों और आदेशों पर अपनी आधिकारिक आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका यह भी कहना था कि ये तमाम निर्णय उनकी जानकारी या किसी भी तरह की पूर्व सिफारिश के बिना ही लिए गए थे। इन तमाम आंतरिक असहमतियों और सवालों के घेरे में आने के बाद चुनाव आयोग ने अपनी सफाई में कहा कि किसी भी जिम्मेदार संस्थान के भीतर चर्चा के दौरान अलग-अलग विचार होना बेहद सामान्य बात है। साथ ही आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके द्वारा जारी किए गए सभी आदेश पूरी तरह कानूनी मान्यता रखते हैं और उनका क्रियान्वयन स्थापित नियमों के तहत ही किया जाता है।
























