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पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के हिंदुओं पर दिए बयान पर जावेद अख्तर का तीखा तंजराजनीति
17 अग॰ 2026, 8:03 pm (25 दिन पहले)· 0

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के हिंदुओं पर दिए बयान पर जावेद अख्तर का तीखा तंज

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के हिंदुओं को लेकर दिए गए विवादित बयान पर जावेद अख्तर ने उनपर करारा हमला बोला है।

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने अपने देश के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर एक ऐसा बयान दिया, जिस पर भारत में तीखी नाराजगी देखने को मिल रही है। आसिफ अली जरदारी ने अपने संबोधन में दावा किया था कि पाकिस्तान की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी देश के तीन से चार फीसदी हिंदू समुदाय को बर्दाश्त करती है और वहां हिंदू पूरी तरह से आजाद हैं। इस बयान के सामने आने के बाद मशहूर गीतकार और लेखक जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया के जरिए आसिफ अली जरदारी पर बड़ा तंज कसा और उन्हें मिस्टर दस परसेंट कहकर संबोधित किया। इसके अलावा इंटरनेट पर आम जनता ने भी इस बात पर सवाल उठाए कि पाकिस्तान में आधिकारिक रूप से हिंदू आबादी तीन फीसदी से भी कम है। लेकिन इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जिस देश में अल्पसंख्यकों को अहसान के तौर पर बर्दाश्त करने की बात कही जाती है, क्या वहां खुद अपने देश के तमाम मुसलमानों को भी बराबरी, न्याय और सुरक्षा मिल पा रही है, क्योंकि जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है।

जरदारी के अखंड भारत वाले आरोप और आबादी का सच

अपने भाषण के दौरान आसिफ अली जरदारी ने भारत पर निशाना साधते हुए कहा कि भारतीय लोग अखंड भारत की सोच में यकीन रखते हैं। इसके तुरंत बाद उन्होंने पाकिस्तान की मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी का जिक्र करते हुए यह अजीब तर्क दिया कि वही आबादी देश की हिंदू अल्पसंख्यकों को सहन करती है और वे वहां स्वतंत्र हैं। यहीं से पूरा विवाद शुरू हुआ। किसी भी लोकतांत्रिक ढांचे वाले देश में किसी नागरिक समुदाय को सिर्फ बर्दाश्त करने की बात करना अपने आप में गंभीर सवाल खड़े करता है। इससे ऐसा आभास होता है कि वह देश किसी संविधान या कानून से नहीं चल रहा है, बल्कि वहां नागरिकों के बुनियादी अधिकार किसी बहुसंख्यक वर्ग की दया या कृपा पर निर्भर हैं। इस पूरे मामले में एक तथ्यात्मक सुधार भी बेहद जरूरी है। पाकिस्तान की वर्ष 2023 की आधिकारिक जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि वहां हिंदू आबादी तीन या चार फीसदी नहीं, बल्कि मात्र 2.17 प्रतिशत है। इस जनगणना के मुताबिक पाकिस्तान में कुल हिंदुओं की संख्या लगभग बयावन लाख दर्ज की गई है।

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पाकिस्तान में क्या वाकई सभी मुसलमानों को मिलता है इंसाफ

पाकिस्तान में धार्मिक, वैचारिक और राजनीतिक मोर्चे पर दबाव या भेदभाव झेलने वाले लोगों का दायरा सिर्फ हिंदुओं तक ही सीमित नहीं है। देश के शिया समुदाय के लोगों को भी भीषण आतंकी हमलों का सामना करना पड़ा है। इसी साल छह फरवरी को इस्लामाबाद की खदीजा तुल कुबरा मस्जिद में हुए एक भयानक आत्मघाती हमले में कम से कम इकतीस लोगों की जान चली गई थी और एक सौ सत्तर से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उस खौफनाक हमले की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ने ली थी। इसके अलावा अहमदिया समुदाय की कानूनी और सामाजिक स्थिति तो सीधे तौर पर पाकिस्तान के संविधान से जुड़ी हुई है। वहां के संविधान के अनुच्छेद दो सौ साठ में अहमदियों को साफ तौर पर गैर-मुसलमान घोषित किया गया है। मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट्स बताती हैं कि वर्ष 2026 में भी अहमदियों के खिलाफ लगातार हिंसा हो रही है, उनकी धार्मिक गतिविधियों पर सख्त पाबंदियां हैं और उन्हें भारी भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। इसके साथ ही बलूचिस्तान प्रांत में जबरन लोगों का गायब होना और वहां के सुरक्षा बलों की तरफ से मानवाधिकारों का हनन लंबे समय से एक बहुत बड़ा और गंभीर मुद्दा बना हुआ है.

बर्दाश्त करने की इस भाषा के पीछे छिपी असली हकीकत

इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि आखिर किस आधार पर यह कहा जा रहा है कि हिंदुओं को बर्दाश्त किया जा रहा है। यह स्थिति तब है जब न तो हिंदू समुदाय किसी तरह के अत्याचार में शामिल है और न ही उसने कभी देश के खिलाफ हाथ में हथियार उठाए हैं। बल्कि सच तो यह है कि वहां का हिंदू समुदाय अपनी बहू-बेटियों की इज्जत और सुरक्षा बचाने की जद्दोजहद में लगा रहता है। हालात यह हैं कि वहां के हिंदुओं को खुद नहीं पता कि उनका जीवन कितने दिनों का सुरक्षित है। ऐसे में यदि किसी राष्ट्र का सर्वोच्च राष्ट्रपति अपने ही देश के नागरिकों के लिए हम उन्हें बर्दाश्त करते हैं जैसी अपमानजनक और गैर-जिम्मेदाराना भाषा का इस्तेमाल करे, तो बहस केवल हिंदू आबादी के दो या तीन प्रतिशत होने तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि देश के पूरे व्यवस्थागत ढांचे पर सवाल उठ खड़े होते हैं।

जावेद अख्तर का तीखा तंज और सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया

आसिफ अली जरदारी की इस विवादास्पद टिप्पणी पर जाने-माने गीतकार जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कड़ा तंज कसते हुए उन्हें मिस्टर दस परसेंट के नाम से पुकारा। उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि जरदारी अपने देश की तीन-चार फीसदी हिंदू आबादी को सहन करने की बात कर रहे हैं, जबकि वह खुद दस फीसदी से कम आबादी वाले लोगों के प्रति हमेशा से असंवेदनशील रहे हैं। जावेद अख्तर की इस बेबाक टिप्पणी ने इस पूरी बहस को सिर्फ भारत और पाकिस्तान के कूटनीतिक दायरे तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि पाकिस्तान के भीतर धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के बुनियादी सवालों को दुनिया के सामने लाकर रख दिया। जावेद अख्तर ने अपनी पोस्ट में इस बात का भी जिक्र किया कि पाकिस्तान के मिस्टर जरदारी, जो बेनजीर भुट्टो से शादी के बाद सार्वजनिक जीवन में आए थे, आज अल्पसंख्यकों को लेकर इस तरह की बातें कर रहे हैं। इस बयानबाजी ने पड़ोसी देश की आंतरिक व्यवस्था और वहां की सोच पर एक बार फिर से गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

सवाल-जवाब

आसिफ अली जरदारी ने क्या बयान दिया था?
आसिफ अली जरदारी ने कहा था कि पाकिस्तान की मुस्लिम आबादी देश के तीन से चार फीसदी हिंदू समुदाय को बर्दाश्त करती है और हिंदू वहां आजाद हैं।
पाकिस्तान की आधिकारिक जनगणना के अनुसार वहां हिंदू आबादी कितनी है?
वर्ष 2023 की आधिकारिक जनगणना के मुताबिक पाकिस्तान में हिंदू आबादी 2.17 प्रतिशत है, जो करीब 52 लाख है।
जावेद अख्तर ने जरदारी पर क्या प्रतिक्रिया दी?
गीतकार जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया पर जरदारी को मिस्टर दस परसेंट कहा और उनके अल्पसंख्यकों के प्रति रविष्य पर तंज कसा।
पाकिस्तान में किन अन्य समुदायों पर हमलों का जिक्र किया गया है?
रिपोर्ट में शिया मुसलमानों पर हुए हमलों और अहमदिया समुदाय तथा बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के हनन का उल्लेख किया गया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Rohan Gupta@rohan-gupta·24 दिन पहले

यह बयान केवल कूटनीतिक या सामाजिक मंच तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल युग में सोशल मीडिया एल्गोरिदम और एआई-संचालित सूचना तंत्र पर भी गहरा प्रभाव डालता है। जब शीर्ष नेतृत्व से ऐसी बातें आती हैं, तो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर भ्रामक आंकड़े और दुष्प्रचार तेजी से वायरल होते हैं, जिससे डिजिटल सुरक्षा और तथ्यात्मक सटीकता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन जाता है।

Rohan Verma@rohan-verma·24 दिन पहले

आसिफ अली जरदारी का यह बयान केवल एक कूटनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान के संवैधानिक और संस्थागत संकट का खुला दस्तावेज़ है। जब कोई राष्ट्र अपने नागरिकों के अधिकारों को 'सहन करने' या 'दया' के रूप में देखता है, तब अल्पसंख्यक ही नहीं बल्कि शिया और अहमदी जैसे समुदायों की सुरक्षा भी पूरी तरह ध्वस्त हो जाती है। यह वैचारिक विफलता पड़ोसी देश के आंतरिक लोकतंत्र को और गहरे संकट में धकेल रही है, जिसके दूरगामी परिणाम पूरे दक्षिण एशियाई भू-राजनीतिक समीकरण पर पड़ेंगे।

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·24 दिन पहले

रोहन का विश्लेषण बिल्कुल सटीक है। जब राज्य अपने ही संविधान के जरिए अहमदियों और बलूचिस्तान के नागरिकों को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित करता है, तो इससे क्षेत्रीय अस्थिरता का खतरा और बढ़ जाता है। दक्षिण एशिया में आर्थिक बदहाली से जूझ रहे इस देश का संस्थागत संकट न केवल आंतरिक सुरक्षा को प्रभावित कर रहा है, बल्कि इसकी नीतिगत अनिश्चितता वैश्विक ऊर्जा और व्यापार मार्गों के लिए भी एक गंभीर कूटनीतिक चुनौती बन सकती है।

Ravikash Gupta@ravikash·25 दिन पहले

पाकिस्तानी राष्ट्रपति का यह बयान केवल कूटनीतिक संवेदनहीनता नहीं, बल्कि वहां की बिगड़ती सामाजिक संरचना और कमजोर होती संवैधानिक व्यवस्था का स्पष्ट प्रमाण है। जब देश के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति अल्पसंख्यकों को 'सहन' करने की बात कहते हैं, तो यह वैश्विक निवेशकों और वित्तीय बाजारों में भी उस देश की राजनीतिक स्थिरता को लेकर गहरी चिंता पैदा करता है। ऐसे राष्ट्रों में न केवल मानवाधिकारों का हनन होता है, बल्कि आंतरिक सुरक्षा और आर्थिक सुधार के मोर्चे पर भी भारी अनिश्चितता बनी रहती है, जिसका असर दीर्घकालिक निवेश पर पड़ना तय है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·25 दिन पहले

एक क्राइम संवाददाता के रूप में मेरा मानना है कि जब राज्य के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग अल्पसंख्यकों के अधिकारों को संवैधानिक गारंटी के बजाय बहुसंख्यक वर्ग की 'कृपा' या 'सहनशीलता' के रूप में पेश करते हैं, तो इससे चरमपंथी ताकतों को वैधानिक वैधता मिलने का खतरा पैदा हो जाता है। ऐसी मानसिकता कानून-व्यवस्था के पूरे तंत्र को कमजोर करती है, जिससे पुलिस और न्यायपालिका भी आंतरिक दबावों के आगे बेबस नजर आने लगती है। इस तरह के माहौल में आपराधिक मामलों की निष्पक्ष जांच और न्याय की उम्मीद करना और भी अधिक कठिन हो जाता है, जिसका सीधा असर क्षेत्रीय सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता पर पड़ता है।

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